पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पिछले साल महामुख्यमंत्री की सूची में तीसरे नंबर पर थीं. लेकिन इस बार वे इसमें पहले नंबर पर हैं. इसकी वजहों को विस्तार से समझने से पहले यह समझना जरूरी है कि पिछले साल नंबर एक पर नीतीश कुमार और नंबर दो पर चंद्रबाबू नायडू थे. पिछले एक साल की सियासी घटनाओं से ये दोनों ही कमजोर हुए हैं. नीतीश कुमार जहां केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के साथ रहकर लाचार नजर आ रहे हैं तो चंद्रबाबू नायडू भाजपा से दूर होकर विपक्ष में अपने लिए जगह तलाश रहे हैं. ऐसे में ममता बनर्जी का पहले स्थान पर रहना स्वाभाविक ही है.

कई राजनीतिक विश्लेषकों को यह लगता है कि विपक्षी खेमे से नीतीश कुमार के निकलकर सत्ताधारी खेमे में आ जाने के बाद विपक्ष के पास अगर सबसे विश्वसनीय कोई चेहरा है तो वह ममता बनर्जी ही हैं. केंद्र सरकार को घेरने वाले मुद्दों पर जिस तरह से पहले नीतीश कुमार विपक्ष की गोलबंदी करते दिखते थे, उसी भूमिका में आज ममता बनर्जी दिखती हैं. इसका एक उदाहरण दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपराज्यपाल के बीच टकराव का है. ममता बनर्जी की अगुवाई में ही चार मुख्यमंत्री न सिर्फ केजरीवाल के समर्थन में उतरे बल्कि इन चारों ने साझा प्रेस वार्ता की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भी यह मुद्दा उठाया.

ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में लगातार ताकतवर होती जा रही हैं. न तो उन्होंने 2014 के लोकसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल में नरेंद्र मोदी की लहर को घुसने दिया और न ही पूरी ताकत लगाने के बावजूद 2016 के विधानसभा चुनावों में ही भाजपा उनका कोई नुकसान कर पाई. आज भले ही पश्चिम बंगाल में उनके मुख्य विरोधी वाम दल हों लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने वाम दलों को भी साधकर खुद को और मजबूत किया है. अरविंद केजरीवाल और दिल्ली के उपराज्यपाल के बीच टकराव के मुद्दे पर उनके साथ केरल के वामपंथी मुख्यमंत्री पी विजयन भी थे.

विकास और गवर्नेंस के मोर्चे पर ममता बनर्जी का काम अच्छा माना जाता है. हालांकि, इसमें और सुधार की गुंजाइश दिखती है. क्योंकि अब भी पश्चिम बंगाल औद्योगिक विकास और मानव विकास के कई संकेतकों पर बुरी स्थिति में है. लेकिन फिर भी लड़कियों की शिक्षा के लिए उन्होंने जो ‘कन्या प्रकल्प’ योजना चलाई है, उसकी हर तरफ तारीफ हो रही है. संयुक्त राष्ट्र भी ममता बनर्जी सरकार को इस योजना के लिए सम्मानित कर चुका है.

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल पार्टी की जड़ें समय के साथ और गहरी होती जा रही हैं. यही ममता बनर्जी की असली ताकत है और इसी ताकत के बूते वे राष्ट्रीय राजनीति में पहले के मुकाबले कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई हैं. पश्चिम बंगाल से सटे पूर्वोत्तर के राज्यों के चुनावों में भी उनका प्रभाव रहता है. लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनकी सियासी हैसियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के उपचुनावों में धुर विरोधी दो पार्टियों - समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी - को एक साथ लाने में भी उनकी भूमिका रही थी.

यही भूमिका वे दूसरे राज्यों में भी निभाती दिख रही हैं. चाहे वह कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल सेकुलर के सरकार बनाने का मसला हो या फिर दिल्ली में केजरीवाल और केंद्र सरकार के बीच चल रहा टकराव. हर जगह ममता बनर्जी प्रभावी सियासी हस्तक्षेप करते दिखती हैं. इन सबसे राष्ट्रीय स्तर पर उनका एक प्रभाव बन रहा है. पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें और इनमें से अधिकांश पर उनकी जीत की संभावना भी उन्हें राष्ट्रीय राजनीति का बेहद अहम चेहरा बना रहे हैं.

अगर 2019 में कोई ऐसी स्थिति बनती है कि नरेंद्र मोदी की सरकार नहीं बन पाती है और कांग्रेस की अगुवाई में भी सरकार बनने की स्थिति नहीं बन रही हो तो ममता बनर्जी के लिए राष्ट्रीय राजनीति में बड़े सियासी अवसर के द्वारा खुल सकते हैं. इसकी एक वजह यह भी है कि गठबंधन की राजनीति में उनकी स्वीकार्यता आज पहले से और सबसे ज्यादा है. पहले जहां लोग उन्हें तुनकमिजाज मानते थे, वहीं अब ममता बनर्जी इस छवि से बाहर निकलती दिख रही हैं. अगर कांग्रेस की अगुवाई में भी सरकार बनती है तो भी ममता बनर्जी का राष्ट्रीय राजनीति में सियासी दखल और बढ़ सकता है. उनके बगैर कांग्रेस के लिए लोकसभा में जादुई आंकड़े तक पहुंचना मुश्किल है.

कुल मिलाकर कहा जाए तो कमजोर मुख्यमंत्रियों के इस दौर में ममता बनर्जी निर्विवाद तौर पर सबसे ताकतवर दिख रही हैं. और ऐसे में उनका इस साल सत्याग्रह का महामुख्यमंत्री बनना बेहद स्वाभाविक है.


महामुख्यमंत्री-2018 : देश के सबसे ताकतवर और प्रभावी 10 मुख्यमंत्री

#1 कमजोर मुख्यमंत्रियों वाले इस दौर में ममता बनर्जी अपवाद हैं

#2 नीतीश कुमार अभी भले कमजोर हैं लेकिन भविष्य में क्या होगा, कहा नहीं जा सकता

#3 विकास और गवर्नेंस के पैमाने पर चंद्रबाबू नायडू अभी भी बाकी मुख्यमंत्रियों से मीलों आगे हैं

#4 उपचुनावों में हार के बाद योगी आदित्यनाथ कमजोर होने के बजाय मजबूत हो गये हैं

#5 नवीन पटनायक और उनकी पार्टी की प्रकृति गठबंधन राजनीति से पूरी तरह मेल खाती है

#6-10 इनमें से दो मुख्यमंत्रियों के नाम शीर्ष पांच में भी हो सकते थे

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