इस साल अप्रैल में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में 400 मीटर की दौड़ में भारतीय एथलीट हिमा दास छठवें स्थान पर रही थीं. इसके बाद मीडिया से बातचीत में उनका कहना था, ‘यहां मैं दुनिया के बेहतरीन धावकों के साथ दौड़ी हूं. इस दौरान मैंने बहुत सी जरूरी बातें सीखी हैं. मैं आपसे कहना चाहती हूं कि मैं अगले जिस भी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में हिस्सा लूंगी स्वर्ण पदक ही जीतूंगी.’ तब ज्यादातर लोगों ने इस बात को कोई खास तवज्जो नहीं दी थी और इसकी वजह भी थी. एक तो यह एथलीट कोई जाना-पहचाना चेहरा नहीं थी, वहीं दूसरी बात यह भी थी कि हिमा को अगली जिस अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लेना था वह अंडर-20 की विश्व चैंपियनशिप थी जिसमें अब तक कोई भारतीय धावक पदक हासिल नहीं कर सका था.

बहरहाल, इस घटना के बाद लोग हिमा दास का नाम भूल गए. लेकिन, असम के ग्रामीण इलाके से निकली यह लड़की अपना वादा नहीं भूली और उसने करीब दो महीने बाद अंडर-20 की विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 400 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया. हिमा ने 51.46 सेकेंड के रिकॉर्ड समय में अपनी दौड़ पूरी की.

हिमा दास की यह सफलता कई मायनों में ऐतिहासिक कही जा सकती है. वे विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला एथलीट हैं. इससे पहले 2002 में विश्व जूनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप में सीमा पूनिया और 2014 में नवजीत कौर ढिल्लन ने डिस्कस थ्रो में कांस्य पदक जीता था. महिला और पुरुष दोनों वर्गों में मिलाकर देखें तो हिमा दास से पहले तक अंडर-20 की इस चैंपियनशिप में केवल दिल्ली के नीरज चोपड़ा ने ही स्वर्णिम सफलता हासिल की थी. नीरज को यह सफलता जेवलिन थ्रो में मिली थी.

अगर ट्रैक स्पर्धा की बात करें तो हिमा दास से पहले किसी भी भारतीय ने जूनियर या सीनियर किसी भी विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड नहीं जीता है. फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह और पीटी ऊषा भी ये कमाल नहीं कर पाए थे.

हिमा की यह सफलता तब और भी बड़ी लगने लगती है जब यह पता चलता है कि उन्होंने मात्र दो साल पहले ही धावक बनने के बारे में सोचा था. दरअसल, हिमा का अब तक का जीवन किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं है. असम के नगांव जिले के एक छोटे से गांव धींग में जन्मीं हिमा अपने छह भाई बहनों में सबसे छोटी हैं. उनके पिता रोंजीत दास एक साधारण किसान हैं, जो धान की खेती करते हैं.

पूर्वोत्तर भारत में फुटबॉल काफी लोकप्रिय है. यहां के ग्रामीण इलाकों तक में फुटबॉल के क्लब मिल जाते हैं. हिमा भी बचपन से ही फुटबॉल के रंग में रंगी हुई थीं. कुछ साल पहले तक अपने खेतों के बीच खाली मैदानों में उन्हें लड़कों को छकाते देखना एक आम बात थी. एक साक्षात्कार में हिमा बताती भी हैं, ‘मेरा शुरु से फुटबॉल से जुड़ाव था. मेरे पिता भी एक अच्छे खिलाड़ी रहे हैं. पहले मैंने गांव में फुटबॉल खेली फिर स्कूल में और फिर कुछ स्थानीय क्लबों में भी. हालांकि मुझे यह पता था कि पिता की आर्थिक स्थिति के चलते मैं इससे आगे नहीं जा पाउंगी.’

यह साल 2016 की बात है जब फुटबॉल में हिमा की तेजी देखकर उनके स्कूल के कोच शमशुल शेख ने उन्हें धावक बनने की सलाह दी. शमशुल एक स्थानीय अखबार को बताते हैं, ‘उसकी तेजी ने मेरा ध्यान खींचा, वह बेहतर पुरुष खिलाड़ियों को छकाते हुए गोल कर देती थी. मेरे दिमाग में यह भी था कि दौड़ में उसके लिए ज्यादा मौके होंगे इसीलिए मैंने उसे यह सलाह दी.’

हिमा ने अपने कोच शमशुल शेख की इस सलाह पर फुटबॉल को अलविदा कह दिया और एथलेटिक्स की व्यक्तिगत ट्रैक स्पर्धा में हाथ आजमाने लगीं. मिट्टी की टर्फ पर कुछ महीने अभ्यास करने और स्थानीय टूर्नामेंट में हिस्सा लेने के बाद हिमा ने राज्य स्तर की एक प्रतियोगिता में हिस्सा लिया. यहां उन्होंने 100 मीटर की रेस में कांस्य पदक जीतकर सभी को हैरान कर दिया.

हालांकि, इसके बाद भी उनकी जिंदगी में ज्यादा कुछ नहीं बदला. दरअसल, अपनी कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के चलते हिमा अलग से खुद के लिए बेहतर ट्रेनिंग की व्यवस्था नहीं कर सकती थीं. हालांकि, इसके बाद जो हुआ वो अक्सर फिल्मों में ही होता है. इसी बीच एक स्थानीय प्रतियोगिता में हिमा पर खेल कल्याण निदेशालय में एथलेटिक्स के कोच निपान दास की नजर पड़ी. निपान हिमा से बहुत प्रभावित हुए. एक अखबार को दिए साक्षात्कार में निपान बताते हैं, ‘हिमा के हुनर को मैंने पहली नजर में ही परख लिया था. वह उस 100 मीटर की रेस में बिना बेहतर जूते पहने भी हवा की तेजी से दौड़ रही थी. मैं देखते ही समझ गया था कि वह बहुत आगे तक जा सकती है.’

इसके बाद निपान दास ने हिमा के माता-पिता से संपर्क साधा और अच्छी ट्रेनिंग के लिए उसे गुवाहाटी भेजने की बात कही. लेकिन, हिमा के माता-पिता छह बच्चों में सबसे छोटी अपनी लाडली को 140 किमी दूर गुवाहाटी भेजने को राजी नहीं हुए. फिर इस काम में निपान की मदद स्थानीय डॉक्टर प्रतुल शर्मा ने की. प्रतुल भी हेमा से काफी प्रभावित थे. प्रतुल ने न सिर्फ हिमा के पिता को समझाया बल्कि निपान को इसके लिए आर्थिक मदद भी दी.

इसके बाद निपान दास ने हिमा को गुवाहाटी के चर्चित ‘सरुसाजई स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स’ में ट्रेनिंग दिलाई. लेकिन, इस दौरान वे उसे राज्य अकादमी में भर्ती कराने की कोशिश करते रहे. दरअसल, निपान जानते थे कि हिमा आर्थिक तंगी के चलते ज्यादा दिन तक ‘सरुसाजई स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स’ में ट्रेनिंग नहीं कर पाएगी. वे यह भी जानते थे कि अकादमी में पहुंचना हिमा की जरूरत है क्योंकि उसके प्रदर्शन में एक बेहतर ट्रेनिंग की कमी साफ़ झलकती थी. निपान दास की यह कोशिश भी जल्द ही सफल हुई जब राज्य अकादमी के अधिकारियों ने हिमा के प्रदर्शन को देख उसे अकादमी में लेने के लिए हामी भर दी.

राज्य अकादमी में भर्ती होने का असर हिमा के प्रदर्शन पर साफ़ दिखा. कुछ महीने बाद ही हिमा ने राष्ट्रीय स्तर की दो यूथ प्रतियोगिताओं में चार पदक जीते. इसके बाद उन्हें जूनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप के लिए कोयंबटूर भेजा गया. पहली बार इस प्रतियोगिता में हिस्सा ले रही हिमा ने इसके फाइनल में पहुंचकर सभी हैरान कर दिया. हिमा बताती हैं, ‘वहां किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि जिस लड़की को अभ्यास के लिए सिंथेटिक ट्रैक तक नसीब नहीं हुआ वह राष्ट्रीय प्रतियोगिता में ऐसा प्रदर्शन कैसे कर सकती है.’

इसके बाद हिमा ने एशियन यूथ चैंपियनशिप और वर्ल्ड यूथ चैंपियनशिप के लिए क्वालिफाई किया हालांकि वे इनमें पदक जीतने से चूक गईं, लेकिन उनके प्रदर्शन ने सभी का ध्यान खींचा. फिर इस साल फरवरी में उन्होंने एशियन गेम्स की 200 मीटर की क्वालिफाइंग स्पर्धा में गोल्ड जीतकर अपना लोहा मनवाया. इसके बाद मार्च में एक बार फिर वे चर्चा में आईं जब उन्होंने फेडरेशन कप एथलेटिक्स की 400 मीटर रेस में स्वर्ण पदक जीतकर कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए क्वालिफाई कर लिया. इस टूर्नामेंट में उन्होंने एशियन गेम्स में कांस्य पदक जीत चुकी एमआर पोवाम्मा को भी पीछे छोड़ दिया था.

फेडरेशन कप एथलेटिक्स में जीत के बाद ख़ुशी मानतीं हिमा दास | फोटो : एएफपी
फेडरेशन कप एथलेटिक्स में जीत के बाद ख़ुशी मानतीं हिमा दास | फोटो : एएफपी

अप्रैल में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में उनका सामना दुनिया की कई नामी सीनियर एथलीट्स से था. यहां भी शुरुआत में हिमा का प्रदर्शन बेहतरीन रहा और उन्होंने फाइनल में जगह बनाई. हालांकि, फाइनल में वे छठवें स्थान पर रहीं. लेकिन, उनकी फाइनल तक पहुंचने की यह सफलता भी कई मायने में बहुत बड़ी थी. हिमा ने फ़ाइनल में 51.32 सेकेंड का समय निकाला था जो विदेशी धरती पर किसी भारतीय महिला एथलीट द्वारा 400 मीटर रेस में दूसरा सबसे बेहतर प्रदर्शन था. 18 साल पहले 400 मीटर रेस में केएम बीनामोल ने 51.21 सेकंड का समय निकाला था. कॉमनवेल्थ के फाइनल मुकाबले में खास यह भी था कि वे इसमें अनुभव के लिहाज से सबसे नई धाविका थीं.

हिमा अब तक अपने इस छोटे से करियर में भारत की पांच सबसे तेज धाविकाओं में अपना नाम लिखवा चुकी थीं. 400 मीटर की स्पर्धा में अब उनसे आगे केवल मनजीत कौर (51.05), केएम बीनामोल (51.21), निर्मला शेरान (51.28) और चित्र सोमन (51.30 सेकेंड) जैसे चार नाम ही थे. लेकिन फिर हिमा ने इसी साल जून में सीनियर राष्ट्रीय एथलीट प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतकर इनमें से तीन को पीछे छोड़ दिया. इस प्रतियोगिता में उन्होंने 51.13 सेकेंड के रिकॉर्ड समय में अपनी रेस पूरी की. यानी हिमा से आगे अब केवल मनजीत कौर (51.05) का रिकॉर्ड ही बचा है. उनके कोच की मानें तो हिमा जिस तरह से आगे बढ़ रही हैं उसे देखते हुए कुछ महीनों में वे इसे भी पीछे छोड़ देंगी.

फिलहाल, तो अब हिमा की अगली प्रतियोगिता एशियन गेम्स है जहां सभी को उनसे पदक की उम्मीद है. एशियन गेम्स में उनका मुख्य मुकाबला बहरीन की साल्वा ईद नसीर से है जो इस साल एशिया का पांचवां सबसे बेहतर समय निकाल चुकी हैं. वहीं हिमा इस मामले में आठवें नंबर पर हैं. जानकारों की मानें तो इस मुकाबले को लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि हिमा हर प्रतियोगिता में जिस तरह से चौंका रही हैं उसे देखते हुए वे साल्वा को भी पीछे छोड़ सकती हैं.

बहरहाल, बीते हफ्ते फिनलैंड में अंडर-20 की विश्व चैंपियन बनी 18 साल की इस उड़नपरी ने पूर्वोत्तर से ही निकली कुछ अन्य प्रतिभाओं की याद दिला दी है. इनमें ‘गोल्डन गर्ल’ एमसी मैरी कॉम, कुंजा रानी देवी, सरिता देवी और मीराबाई चानू जैसे नाम हैं. हिमा दास और इन सभी में एक समानता यह भी है कि इन्होंने कमजोर आर्थिक स्थिति, तमाम सामाजिक वर्जनाओं और घरेलू परेशानियों के बावजूद वह मुकाम हासिल किया जो तमाम भारतीयों के लिए गर्व की बात है. वैसे देखा जाए तो इन लड़कियों की सफलता केवल यही नहीं है कि इन्होंने एक सपना देखा और उसे पूरा किया बल्कि ये भी है कि इनके चलते आज देश की करोङ़ों बेटियां भी अपने लिए एक सपना देखने और उस पर यकीन करने की हिम्मत कर पा रही हैं.