प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार कथित रूप से शादियों को लेकर उठाए गए एक क़दम की वजह से चर्चा में हैं. कहा जा रहा है कि मोदी सरकार लोगों से शादी में आने वाले ख़र्च का हिसाब-किताब मांगने संबंधी क़ानून ला रही है. इस ख़बर पर यक़ीन कर कई लोग सोशल मीडिया पर मोदी सरकार की आलोचना कर रहे हैं.

भाजपा विरोधी सोशल मीडिया अकाउंटों से किए गए कई पोस्टों में कहा गया है कि मोदी सरकार अपनी पार्टी के फ़ंड को लेकर कुछ नहीं बताती लेकिन ग़रीबों से उनकी बेटियों की शादी तक का हिसाब मांगेगी. नीचे ऐसी ही एक पोस्ट देखी जा सकती है. इस पोस्ट के कैप्शन और ग्राफ़िक में लिखा है, ‘ग़रीब की बेटी की शादी तक का हिसाब रखना है, परन्तु पार्टी फ़ंड का कोई हिसाब नहीं बताना है इनको.... वर-वधू दोनों पक्षों को अब शादी में हुए ख़र्च का ब्यौरा सरकार को देना होगा.’ इसे पढ़ कर लगता है मानो मोदी सरकार ने यह क़ानून बना लिया है जिसे अब केवल पारित कराना बाक़ी है.

हालांकि ऐसा कुछ नहीं है. भविष्य में सरकार ऐसा कोई क़दम उठाए तो यह अलग बात है, फिलहाल केंद्र सरकार ने ऐसा कोई फ़ैसला नहीं किया है जिसके तहत लोगों को शादी से जुड़े ख़र्च की जानकारी उसे देनी होगी. सोशल मीडिया पर किया जा रहा दावा तथ्यों को सही तरह से पेश नहीं करता.

दरअसल बीते हफ़्ते सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को केवल सलाह दी थी कि वह शादी में होने वाले ख़र्चों का ब्यौरा देना अनिवार्य करने को लेकर विचार करे. अब यह सरकार पर है कि वह सुप्रीम कोर्ट की सलाह मानती है या नहीं. अभी तक सरकार की तरफ़ इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. अगर ऐसा होता तो यह निश्चित ही बड़ी ख़बर बनती.

क्या थी असली ख़बर?

सुप्रीम कोर्ट शादी से जुड़े एक मामले में सुनवाई कर रहा है. ख़बरों के मुताबिक़ एक महिला ने अपने पति और उसके परिवार पर दहेज की मांग सहित कई आरोप लगाए हैं. वहीं, पति और उसके परिवार की तरफ़ से आरोपों को ख़ारिज किया गया है. केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि विवाह संबंधी विवादों में दहेज मांगे जाने के आरोप-प्रत्यारोप सामने आते हैं. इसी पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसी कोई व्यवस्था होनी चाहिए जिससे सच-झूठ का पता लगाने में और ज़्यादा मदद मिल सके.

इसीलिए कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर कहा है कि वह अपने क़ानून अधिकारी के ज़रिए बताए कि इस मामले पर उसकी क्या राय है. यहां यह उल्लेखनीय है कि इस केस में अभी तक केवल कोर्ट ने अपनी राय रखते हुए कहा है कि वर और वधू दोनों पक्षों के लिए शादी से जुड़े ख़र्चों के बारे में संबंधित मैरिज ऑफिसर को लिखित ब्यौरा देना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए और सरकार को इस बारे में नियम-क़ानून की जांच-परख करके संशोधन करने पर विचार करना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि इससे दहेज प्रथा पर तो लगाम लगेगी ही, साथ ही दहेज क़ानूनों के ग़लत इस्तेमाल में भी कमी होगी.

यह सब जानने के बाद साफ़ हो जाता है कि सोशल मीडिया पर किया जा रहा दावा मोदी विरोध के चलते तथ्यों की अनदेखी करते हुए किया गया है. अगर ऐसा होता तो यह अपने आप में एक बहुत बड़ी ख़बर होती. गूगल करने पर ऐसी कोई ख़बर नहीं मिलती.

यह क़दम आसान नहीं

वहीं, मोदी सरकार के लिए भी ऐसा कोई क़दम उठाना आसान नहीं है. ऐसा करने पर उसे राजनीतिक विरोधियों के साथ आम लोगों के कई सवालों का जवाब देना पड़ सकता है. पार्टी फ़ंड के अलावा चुनावी ख़र्च के ब्यौरे से जुड़े सवाल भाजपा को परेशान कर सकते हैं. लोग पूछ सकते हैं कि उनसे शादी का ख़र्च का हिसाब मांगने वाली मोदी सरकार जनार्दन रेड्डी का क्या करेगी जिन्होंने कुछ साल पहले अपनी बेटी की शादी में 500 करोड़ रुपये ख़र्च किए थे और जिनके क़रीबी लोगों और रिश्तेदारों (जिनमें उनके भाई भी शामिल हैं) ने भाजपा के टिकट पर कर्नाटक विधानसभा चुनाव लड़ा था.