भारतीय जनता पार्टी के साथ जाने से पहले तक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को विपक्ष का सबसे विश्वसनीय और लोकप्रिय चेहरा माना जाता था. माना जा रहा था कि 2019 में नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष की गोलबंदी उनके आसपास ही होगी. लेकिन वे पिछले साल पाला बदलकर फिर से भाजपा के साथ आ गए. शुरुआती कुछ महीनों में ऐसा लगा कि उनकी सियासी हैसियत भाजपा के साथ रहकर अगर बढ़ती नहीं है तो घटेगी भी नहीं. लेकिन साल भर के अंदर ही वे बेहद लाचार से दिखने लगे.

नीतीश कुमार के भाजपा के पाले में आने के बाद नरेंद्र मोदी ने केंद्र में मंत्रिमंडल विस्तार किया लेकिन जदयू के किसी भी नेता को उसमें जगह नहीं दी गई. हालांकि बाद में जेडीयू के हरिवंश सिंह को भाजपा ने राज्य सभा का उपसभापति बनवा दिया. लेकिन यह उसकी भलमनसाहत या विपक्षी पार्टी के प्रति सम्मान से ज्यादा मजबूरी थी. और इससे किसी का ज्यादा कुछ बनता-बिगड़ता भी नहीं है. जिन नीतीश कुमार ने 2010 में नरेंद्र मोदी के विरोध में भाजपा नेताओं के सम्मान में दिया जाने वाला भोज रद्द कर दिया था, उन्हें ही अब बेहद सहजता के साथ बिहार सरकार के गेस्ट हाऊस में भाजपा अध्यक्ष और नरेंद्र मोदी के सबसे खास सहयोगी अमित शाह के साथ नाश्ते पर जाना पड़ रहा है और उन्हें अपने आवास पर खाने पर बुलाना पड़ रहा है. पहले जब वे भाजपा के साथ थे तो उनकी पार्टी जनता दल यूनाइटेड इस गंठबंधन में सीनियर पार्टनर हुआ करती थी. आज जदयू अगले लोकसभा चुनाव में बराबरी की स्थिति के लिए संघर्ष कर रही है.

कुछ समय पहले तक देश के सबसे ताकतवर मुख्यमंत्री माने जाने वाले नीतीश कुमार की लाचारी उस वक्त और बढ़ी हुई लगती है जब भाजपा से अपेक्षित सम्मान नहीं मिलने के बावजूद राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस के पाले में उनके वापस जाने की संभावनाएं न के बराबर दिखती हैं. कहा जा रहा है कि पेशेवर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के जरिए नीतीश कुमार ने फिर से महागठबंधन को खड़ा करने की कोशिश करवाई और कांग्रेस इसके लिए राजी भी हो गई लेकिन आरजेडी की ओर से इसके लिए मना कर दिया गया. ऐसे में अभी तो यही लग रहा है कि अपमान का घूंट पीने के बावजूद नीतीश के सामने भाजपा के साथ बने रहने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.

इसके बावजूद अगर नीतीश कुमार सत्याग्रह महामुख्यमंत्री सूची में दूसरे नंबर पर हैं तो जाहिर है कि कुछ मोर्चों पर वे अब भी मजबूत बने हुए हैं. विकास दर के मामले में बिहार देश के चोटी के कुछ राज्यों में से एक है. आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक विकास में भी राज्य अच्छी गति से आगे बढ़ रहा है. हालांकि, कई आर्थिक जानकार यह भी मानते हैं कि बिहार इतना पिछड़ा हुआ था कि थोड़ा भी काम होने पर सुधार तुरंत दिखता है. कुल मिलाकर 2005 में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद से बिहार विकास और गवर्नेंस के मोर्चे पर एक दिशा में बढ़ता हुआ दिखता है.

नीतीश की दूसरी बड़ी ताकत उनकी अपनी अलग राष्ट्रीय पहचान है. अभी भले ही आरजेडी उनका कितना भी विरोध कर रही हो लेकिन यह सबको मालूम है कि अपनी इसी अलग पहचान की वजह से अगर वे विपक्ष में फिर से आते हैं तो कांग्रेस समेत कई दूसरे दलों को इससे परहेज नहीं होगा. गठबंधन राजनीति में स्वीकार्यता के मामले में भी वे कई दूसरे मुख्यमंत्रियों से आगे दिखते हैं.

कुल मिलाकर नीतीश कुमार एक ऐसे नेता हैं जिन्हें भाजपा भी अपने साथ रखकर उतनी ही खुश है जितना साल भर पहले तक विपक्ष था. अभी भले ही राष्ट्रीय जनता दल के तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव नीतीश कुमार का विरोध करते दिख रहे हों लेकिन अगर वे फिर से भाजपा के पाले से बाहर आने का निर्णय लेते हैं तो कांग्रेस के दबाव में स्थिति बदलते देर नहीं लगेगी. यही स्वीकार्यता उनकी सबसे बड़ी ताकत है और यही उन्हें कमजोर मुख्यमंत्रियों के इस दौर में अब भी मजबूत बनाए हुए है.


महामुख्यमंत्री-2018 : देश के सबसे ताकतवर और प्रभावी 10 मुख्यमंत्री

#1 कमजोर मुख्यमंत्रियों वाले इस दौर में ममता बनर्जी अपवाद हैं

#2 नीतीश कुमार अभी भले कमजोर हैं लेकिन भविष्य में क्या होगा, कहा नहीं जा सकता

#3 विकास और गवर्नेंस के पैमाने पर चंद्रबाबू नायडू अभी भी बाकी मुख्यमंत्रियों से मीलों आगे हैं

#4 उपचुनावों में हार के बाद योगी आदित्यनाथ कमजोर होने के बजाय मजबूत हो गये हैं

#5 नवीन पटनायक और उनकी पार्टी की प्रकृति गठबंधन राजनीति से पूरी तरह मेल खाती है

#6-10 इनमें से दो मुख्यमंत्रियों के नाम शीर्ष पांच में भी हो सकते थे

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