बिहार में नीतीश कुमार सरकार ने साल 2011 में सूबे की जनता को लोक सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए एक बड़ा फैसला लिया था. इसके तहत बिहार लोक सेवाओं के अधिकार (आरटीपीएस) कानून के तहत कई सेवाओं के लिए एक अवधि तय की गई. इनमें जाति प्रमाण पत्र, आवासीय प्रमाण पत्र और आय प्रमाण पत्र हासिल करना शामिल था. इन सुविधाओं को हासिल करने के लिए आवेदनकर्ताओं को ऑनलाइन अप्लाई करने की सुविधा दी गई है. यह अधिकार सभी को है. हालांकि, 2014 में सुप्रीम कोर्ट के एक बड़े फैसले के बावजूद सरकार की लापरवाही की वजह से समाज के हाशिये पर पड़ा एक तबका इस अधिकार से वंचित है.

सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल, 2014 को एक ऐतिहासिक फैसले के तहत हिजड़ा या ट्रांसजेंडरों को पुरुष और महिला छोड़कर तीसरे लिंग के रूप में मान्यता दी थी. इससे पहले उन्हें इन्हीं दोनों श्रेणियों में खुद की पहचान बतानी होती थी. शीर्ष अदालत ने ट्रांसजेंडरों को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े तबके (ओबीसी) में शामिल करने की भी बात कही थी. इस आधार पर केंद्र और राज्य सरकारों से उन्हें सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण देने के लिए कहा गया था.

इसके अलावा न्यायाधीश केएस राधाकृष्णन और एके सीकरी की पीठ ने ट्रांसजेंडरों के तीसरे लिंग के रूप में पहचान जाहिर करने को जरूरी बताया था. पीठ का कहना था कि लैंगिक पहचान न केवल समाज या स्वास्थ्य बल्कि मानवाधिकार से जुड़ा हुआ मुद्दा भी है. भारतीय संविधान भी धर्म, जाति या लिंग के आधार पर किसी तरह के भेदभाव पर रोक लगाता है. इस सब के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के चार साल बाद भी बिहार सरकार लोक सेवाओं के अधिकार के तहत ट्रांसजेंडरों को इसका फायदा नहीं मिल रहा है.

2011 की जनगणना के मुताबिक बिहार में ट्रांसजेंडरों की आबादी करीब 41 हजार है. लेकिन अभी भी आरटीपीएस के तहत उपलब्ध कराए गए ऑनलाइन फार्म के प्रारूप में लिंग की श्रेणी में केवल दो ही विकल्प हैं - पुरुष और स्त्री. यानी यदि कोई ट्रांसजेंडर सूबे में आवासीय, जाति या आय प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करता है तो उसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले की तरह खुद को पुरुष या स्त्री ही बताना होगा.

मतलब साफ है कि बिहार सरकार ने इस ऐतिहासिक फैसले के बाद आरटीपीएस फॉर्म के प्रारूप में बदलाव नहीं किया है. यदि ऐसा है तो साफ तौर पर यह लापरवाही का मामला दिखता है. साथ ही, यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अवमानना का मामला भी नजर आता है. साथ ही इसके चलते ट्रांसजेंडरों को लेकर बिहार सरकार की मंशा पर ही सवाल खड़े होते हैं. इस तरह समाज में पहले से अलग-थलग पड़े ट्रांसजेंडरों को मुख्यधारा में लाने की एक बड़ी पहल बेकार होती दिखती है जो नीतीश कुमार के सामाजिक न्याय के दावे पर भी सवालिया निशान लगाती है.