मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने मॉब लिंचिंग से जुड़ी घटनाओं की आलोचना करते हुए सुझाव दिया है कि इन्हें रोकने के लिए संसद को एक कड़ा कानून बनाना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के इस सुझाव के बीच जो बात सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है, वो यह कि अगर केंद्र और राज्य सरकारों ने पहले ही इस दिशा में सख्ती दिखाई होती तो न्यायपालिका को अपनी तरफ से सक्रियता दिखाने की जरूरत नहीं पड़ती.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि ‘भीड़तंत्र की भयावह हरकतों’ को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और ऐसी घटनाओं को सामान्य घटनाएं नहीं बनने दिया जाएगा. देश में जब भी नागरिकों के मूल अधिकारों का हनन हुआ, सुप्रीम कोर्ट इनकी रक्षा के लिए आगे आया है. मॉब लिंचिंग के मामले में भी देश की शीर्ष अदालत ने अपनी इसी छवि के अनुरूप रुख दिखाया है.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर केंद्र और राज्य सरकारों में शामिल उन नेताओं से बिलकुल उलट है जो ऐसे मामलों पर चुप्पी साधे हुए हैं. यही नहीं कभी-कभार तो ये लोग केंद्रीय उड्डयन मंत्री जयंत सिन्हा की तरह मॉब लिंचिंग के आरोपितों का स्वागत कर ऐसी घटनाओं को बढ़ावा देते हुए भी लगते हैं.

जिस तरह केंद्र में यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल को भ्रष्टाचार ने दागदार किया था, उसी तरह वर्तमान एनडीए सरकार का कार्यकाल भी मॉब लिंचिंग के चलते दागदार हो सकता है. वहीं जब तक कांग्रेस भ्रष्टाचार निरोधक कानून बनवा पाती और उन्हें लागू करवा पाती, वह अपनी छवि की लड़ाई हार चुकी थी. इस समय कुछ ऐसा ही खतरा भाजपा के सामने भी है और इसलिए उसे सुप्रीम कोर्ट के सुझाव के मुताबिक केंद्र के स्तर पर और अपनी सरकारों वाले राज्यों में मॉब लिंचिंग के खिलाफ सख्त रुख अपना लेना चाहिए.

मॉब लिंचिंग के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस अधिकारियों को यह निर्देश भी दिए हैं कि उन्हें भीड़ को तितर-बितर करने के लिए अपनी सभी कानूनी शक्तियों का इस्तेमाल करना चाहिए. उसे संभावित उपद्रवियों की पहचान के साथ-साथ अतीत की घटनाओं के आधार पर संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित पेट्रोलिंग भी करनी चाहिए. अदालत ने यह भी कहा है कि पुलिस को भड़काऊ मैसेज फैलाने वालों और हिंसा भड़काने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करनी चाहिए.

इसके साथ शीर्ष अदालत ने जागरुकता अभियान चलाने, मॉब लिंचिंग से जुड़े मुकदमों की सुनवाई में तेजी लाने, पीड़ितों को जल्द से जल्द मुआवजा देने और उन्हें मुफ्त कानूनी मदद मुहैया कराने का भी सुझाव दिया है.

अब केंद्र को राज्य सरकारों को यह निर्देश जारी करना चाहिए कि वे सोशल मीडिया पर भड़काऊ मैसेज फैलाने वालों की निगरानी करें. इससे हिंसक मैसेजों में काफी हद तक कमी आ सकती है और यह भीड़ के लिए एक चेतावनी भी होगी.

मॉब लिंचिंग से जुड़े मुकदमों के निपटारों के लिए फास्ट ट्रैक अदालतें भी बनाए जाने की जरूरत है. इसके साथ, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, केंद्र को एक कड़ा कानून बनाना चाहिए. हालांकि कानून से आगे मॉब लिंचिंग रोकने के लिए पहली जरूरत है राजनीतिक इच्छाशक्ति की. इससे पहले कि और लोगों की जान जाए या उनकी आजीविका खतरे में पड़े, सरकार को इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने चाहिए. (स्रोत)