केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार आज लोक सभा में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने वाली है. चार साल में पहली बार. एक ही दिन में इस पर बहस होगी और फिर मतदान भी. हालांकि मतदान से पहले ही इसका नतीज़ा सभी को पता है. कोई चमत्कारों का चमत्कार ही होगा अगर नतीज़ा सरकार के पक्ष में न रहे. इसका सीधा सा कारण है. लोक सभा में बहुमत का आंकड़ा सरकार के पक्ष में हैं. पहले इसी गणित पर नज़र डालते हैं.

लोक सभा का अंकगणित इस वक़्त कुछ इस तरह का है

लोक सभा में इस समय 535 सदस्य हैं. इनमें लोक सभा अध्यक्ष शामिल हैं, जो सामान्य परिस्थितियों में मतदान में हिस्सा नहीं लेते. इस तरह अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान करने वाले सांसदों की संख्या हुई 534 के क़रीब. इनमें से 268 सदस्यों का समर्थन मिलने पर ही अविश्वास प्रस्ताव पारित हो सकता है. कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गांधी का दावा है कि आंकड़े उनके पक्ष में हैं. लेकिन पता उन्हें भी है कि यह महज़ दावा ही है. हक़ीक़त ये है कि विपक्ष के महज़ 147 सदस्यों के बारे में ही यह माना जा सकता है कि वे प्रस्ताव का समर्थन करेंगे.

वैसे तो संशय इसमें भी है क्योंकि मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश करने वाली टीडीपी (तेलुगु देशम पार्टी) के ही एक सांसद जेसी दिवाकर रेड्‌डी ने कहा है कि वे व्हिप के बावज़ूद अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा और मतदान में हिस्सा नहीं लेंगे. फिर भी मान लें कि इन सभी सांसदों ने अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया तब भी इतने से काम नहीं चलेगा. ऐसे में विपक्ष यक़ीनी तौर पर उन 75 सांसदों की तरफ उम्मीद भरी निगाह से देखेगा जो कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी से बराबर की दूरी बनाकर रख रहे हैं. लेकिन पेंच यहां भी है. इस समूह की तीन पार्टियां - तमिलनाडु की एआईएडीएमके (अखिल भारतीय अन्नाद्रविड़ मुनेत्र कड़गम), तेलंगाना की टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्र समिति) और ओडिशा की बीजेडी (बीजू जनता दल) ऐसी हैं जो लंबे समय से कांग्रेस से दूर रहने को प्राथमिकता देती रही हैं. इन तीनों पार्टियों के पास 75 में से 67 सांसद हैं. ये क्या रुख़ अपनाएंगी कोई दावे के साथ नहीं कह सकता.

इसके बावज़ूद चूंकि राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है इसलिए एक बार और मान लें कि ये सभी 75 सांसद भी अविश्वास प्रस्ताव के समर्थन में मत दे देते हैं तब भी विपक्ष का आंकड़ा 222 के आसपास ही ठहरता है. दूसरी तरफ भाजपा के पास अपना संख्या बल ही 273 का है. यानी उसके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक दल (जिनके सदस्यों को मिलाकर सत्ता पक्ष के पास 312 सांसदों की ताक़त हो जाती है) भी विपक्ष के साथ चले जाएं तब भी मोदी सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है.

इसीलिए यह सवाल बड़ा लाज़िमी हो जाता है कि आख़िर अविश्वास प्रस्ताव की क़वायद क्यों? और सरकार तथा विपक्ष इससे हासिल क्या करना चाहता है? और क्या दोनों पक्ष अपने-अपने मक़सद में सफल हो पाएंगे? इन सवालों के जवाब यूं तो संसद में अविश्वास प्रस्ताव की बहस के दौरान ही मिलेंगे अलबत्ता अभी कुछ अंदाज़ा ज़रूर लगाया जा सकता है.

अविश्वास प्रस्ताव की क़वायद क्यों?

इस सवाल का इक़लौता ज़वाब है - चुनाव. एक साल से भी कम समय बचा है जब लोक सभा चुनाव होने हैं. साथ ही आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसी विधानसभाओं के चुनाव भी साथ हैं. अगले साल ही महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड जैसी विधानसभाओं के चुनाव भी हैं. इनसे पहले इसी साल के आखिर में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिज़ोरम में भी चुनाव हैं. सो इतने सारे चुनावों को एक झटके में महज़ एक दिन की इस बहस से साधने की कोशिश मोदी सरकार भी करना चाहती है और विपक्ष भी.

यह स्वाभाविक भी है क्योंकि सभी जानते हैं कि अविश्वास या विश्वास प्रस्ताव पर बहस संसद में होती है लेकिन इसकी चर्चा पूरे देश में होती है. इस बात पर यक़ीन करने के लिए याद कीजिए 17 अप्रैल 1999 की तारीख़. उस वक़्त एआईएडीएमके ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. सरकार ने लोक सभा में विश्वास मत प्रस्ताव पेश किया लेकिन एक वोट से वह गिर गया. मगर चंद महीनों बाद इसी एक वोट की हार ने वाजपेयी को लोक सभा की 303 सीटों के साथ फिर प्रधानमंत्री बनवा दिया.

यक़ीनन उस समय वाजपेयी और उनकी अगुवाई वाले एनडीए की इस बड़ी जीत में कारगिल विजय जैसे कुछ और भी कारकों की भूमिका थी. लेकिन विश्वास मत प्रस्ताव के दौरान संसद में हुई तब की बहस लोगों के ज़ेहन से आज भी मिटी नहीं है. वैसे अविश्वास प्रस्ताव की बात करें तो वह भी आख़िरी बार क़रीब 15 साल पहले वाजपेयी सरकार के ख़िलाफ़ ही लाया गया था. लेकिन तब वह गिर गया था. पर उस वक़्त विपक्ष ने सरकार को कठघरे में लाने का मक़सद तो एक हद तक हासिल कर ही लिया था. संसद पर हमला, गुजरात दंगे, महीनों तक पाकिस्तान की सीमा पर सेना की तैनाती जैसे कई मसलाें पर तब वाजपेयी सरकार घिरी थी. आगे जाकर इस सबका नतीज़ा यह हुआ कि 2004 में कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए ने सरकार बनाने में क़ामयाबी हासिल की. यह ताक़त है संसद में हुई बहस की.

तो फिर अब क्या?

ज़ाहिर तौर पर संसदीय बहस की इसी ताक़त का सरकार और विपक्ष दोनों ही अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहते हैं. उदाहरण के लिए कांग्रेस तमाम महत्वपूर्ण मसलों पर इस मंच से अपनी बात देश की जनता तक पहुंचाना चाहेगी. जैसे कि मॉब लिंचिंग (महज़ शंका या आरोप के आधार भीड़ द्वारा किसी की हत्या कर देना) की बढ़ती घटनाएं, किसानों की आत्महत्याएं, कृषि उपज के कम दाम, फसलों के समर्थन मूल्य (एमएसपी) में अपेक्षित बढ़ोत्तरी न होना, रोजगार की कमी, दलितों व महिलाओं के उत्पीड़न की बढ़ती घटनाएं, महंगाई और अल्पसंख्यकों में असुरक्षा का भाव. ऐसे अनेक मुद्दे हैं जिन पर कांग्रेस और उसकी अगुवाई वाले दल मोदी सरकार को घेरेंगे.

कांग्रेस की अगुवाई वाली पार्टियों का समूह इस मौके को विपक्षी एकता के प्रदर्शन के मौके के रूप में भी भुनाने की कोशिश कर सकता है. इसके लिए ज़्यादा से ज़्यादा छोटे और क्षेत्रीय दलों को साथ जोड़ने की क़वायद होगी ताकि 2019 में मोदी सरकार के सामने संयुक्त विपक्ष की चुनौती पेश करने के मक़सद को हासिल किया जा सके. हालांकि छोटे दलों के अपने मसले भी हैं जिन्हें अविश्वास प्रस्ताव के जरिये देश के सामने रखने का लोभ वे शायद ही छोड़ पाएंगे.

मिसाल के तौर पर टीडीपी ने तो एनडीए से दूरी ही इसीलिए बनाई क्योंकि वह चार साल तक मोदी सरकार में शामिल रहकर भी आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्ज़ा नहीं दिला सकी. ऐसे में उसे विधानसभा चुनाव में नुकसान होने की आशंका सताने लगी थी. इसीलिए अब अविश्वास प्रस्ताव के ज़रिए अपना चेहरा बचाने की कोशिश करती दिख सकती है. आंध्र प्रदेश को विशेष दर्ज़ा देने की मांग बुलंद कर यह संदेश देने की कोशिश करेगी उसने अपनी तरफ से कोई कमी नहीं छोड़ी.

जेडीयू (जनता दल-एकीकृत) यूं तो एनडीए में है मगर वह भी बिहार के लिए विशेष राज्य का दर्ज़ा देने की मांग उठा ज़रूर सकती है. वह काफी समय से इसे दोहरा रही है. टीआरएस के पास राज्य और केंद्र के बीच धन का सही बंटवारा न होने का मसला है. एआईएडीएमके विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) को ख़त्म करने के ख़िलाफ़ है. वह नीट (राष्ट्रीय पात्रता एवं प्रवेश परीक्षा, मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए) से भी नाख़ुश है. वहीं जेडीएस (जनता दल-धर्मनिरपेक्षे) के सामने कावेरी नदी के बंटवारे का मुद्दा है. बसपा (बहुजन समाज पार्टी) अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम में कथित छेड़छाड़ का मसला उठा सकती है. टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस) के पास बंगाल में हिंसा का मुद्दा है. ऐसे ही अन्य दलों के भी अपने मसले हैं. वे सब कोशिश तो करेंगे ही कि उनकी बात संसद के ज़रिए देश के लोगों तक पहुंचे.

वहीं दूसरी तरफ मोदी सरकार इस मौके का फ़ायदा अपनी उपलब्धियों के प्रचार के लिए उठाएगी. तीन तलाक़ जैसे मसलों पर विपक्ष ख़ासकर कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करेगी. कांग्रेस पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के तुष्टिकरण और मुस्लिम महिलाओं के प्रति असंवेदनशील होने का आरोप लगाएगी. ख़बरों की मानें तो इस आक्रमण की अगुवाई ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर सकते हैं.

इसके साथ ही सत्ता पक्ष जम्मू-कश्मीर के मसले पर संसद से ही देश के साथ दुनिया को भी संदेश देने की कोशिश कर सकता है, वह भी कांग्रेस पर हमले की मिलावट के साथ. सिर्फ इतना ही नहीं सूत्रों की मानें तो सत्ता पक्ष इस दौरान विपक्ष में सेंध लगाने की कोशिश भी कर सकता है. ताकि 2019 के लिए विपक्षी एकता के मंसूबों पर समय से पहले ही पानी फेरा जा सके.

लेकिन ये सभी मक़सद साधने के लिए वक़्त बहुत कम है

यानी हर किसी के अपने मक़सद हैं जो इस एक बहस से उसे साधने हैं. वह भी बेहद कम समय में. समय की बात चली है तो यह भी बताते चलें कि अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा के दौरान लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने भाजपा सदस्यों को बोलने के लिए साढ़े तीन घंटे का वक़्त दिया है. जबकि कांग्रेस, एआईएडीएमके, और टीएससी को 38, 29 और 27 मिनट मिले हैं. बीजेडी, शिवसेना और टीडीपी को क्रमश: 15, 14 और 13 तथा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को सात मिनट मिले हैं.