सीन -1

सातवीं क्लास में एक कविता रटी थी - ’जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना अंधेरा धरा पर कहीं रह न जाए’.

इस कविता के मतलब बहुत बाद में खुले लेकिन इतना समझ में आ गया था कि कोई बहुत बड़ा आदमी ही पूरी दुनिया के अंधेरे को मिटाने की सोच सकता है.

सीन - 2

इंजीनियरिंग के बाद एक साल से बेरोज़गार बैठे एक लड़के के हाथ एक दिन ये कविता लगती है और वह इस कविता के भरोसे एक साल काट देता है.

‘हो नहीं मंजिल कहीं जिस राह की

उस राह चलना चाहिए इंसान को

जिस दर्द से सारी उम्र रोते कटे

वह दर्द पाना है जरूरी प्यार को

जिस चाह का हस्ती मिटाना नाम है

उस चाह पर हस्ती मिटाना धर्म है.

जिन मुश्किलों में मुस्कुराना हो मना,

उन मुश्किलों में मुस्कुराना धर्म है’

सीन-3

इंजीनियरिंग ख़त्म होने के बाद का वह दौर जब मैं ओशो को बहुत पढ़ता था. 2007 की फ़रवरी थी, लखनऊ से चलने वाली 3.30 बजे की शताब्दी ट्रेन. दरवाजे के पास नज़र गयी तो देखा अपना बैग उठाये नीरज जी आ रहे है. मुझे समझ नहीं आया कि क्या बोलूं, बस भागकर उनका बैग उठा लिया. बैग उठाते ही उनका एक हाथ फ्री हो गया जो उन्होंने मेरे कंधे पर रख दिया. उनसे सीट नंबर पूछा और बैठा दिया. उनकी सीट बिलकुल बीच वाली थी जिस सीट के साथ एक टेबल भी होती है. मेरी सीट दूर थी. मुझे लगा कि यार पूरा रास्ता इतनी दूर बैठकर तो कटेगा नहीं. अलीगढ़ तक पांच घंटे अगर उनके साथ बैठने को मिल जाएं तो लाइफ बन जाएगी.

मैंने उनके पड़ोस में बैठे अंकल से रिक्वेस्ट की तो वे मान गए. उन्होंने पूछा कौन हैं ये. मैंने कहा - ‘मेरा नाम जोकर देखी है आपने, उसका गाना ‘ए भाई ज़रा देख के चलो’ इन्होंने ही लिखा था.’

खैर अब मैं नीरज जी के पड़ोस में, समझ ही नहीं आ रहा था क्या बात करूं. उन्होंने कविता की कोई किताब निकाल ली थी और कलम से कुछ-कुछ निशान लगाने लगे थे. ट्रेन चलने के 15-20 मिनट बाद बोले - ‘ज़रा दरवाज़े तक ले चलोगे.’

दरवाज़े पर खड़े होकर उन्होंने बीड़ी जलाई. बीड़ी के बाद मैं थोड़ा नार्मल हुआ. फिर वैसे ही हाथ पकड़कर उनको सीट तक लाया. अलीगढ़ आने तक उन्होंने 7-8 बीड़ी पी होंगी.

सीट पर लौटकर उन्होंने टेबल पर मेरी ओशो टाइम्स रखी देखी और बड़ा ही कैजुअली बोले- ‘रजनीश मित्र थे हमारे. उनका ज्ञान कई जन्मों का था. बस एक जगह वो फेल कर गए.’

मैं रजनीश का फैन था, पूछा - ‘कहां फेल कर गए.’

‘परिवार की सत्ता को तोड़ना चाहते थे वो. हिंदुस्तान में परिवार तोड़कर कोई भी चीज टिक नहीं सकती.’

मुझे ये बात पता थी कि उनका ज्योतिष का ज्ञान बहुत अच्छा है. मेरा मन किया कि वहीं कुंडली बनाकर दिखा लूं. मैंने कोशिश बहुत की लेकिन पूरी कुंडली नोट नहीं हो पाई. फिर लगा कि इतने बड़े आदमी के साथ पांच घंटे काटने को मिल गए यही किस्मत की बात है.

हमारे सामने कोई ऑल इंडिया रेडियो के सज्जन बैठे थे. उस समय नीरज जी हिंदी संस्थान उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष थे. ऑल इंडिया रेडियो वाले सज्जन ने उनसे कहा – ‘नीरज जी हिंदी की हालत बड़ी खराब होती जा रही है?’ वे तुरंत बोले - ‘अब हम आ गए हैं, सब ठीक कर देंगे.’

ये तेवर गोपाल दास नीरज के तब थे जब वे करीब 81 साल के थे.

सफर के दौरान मैं उनसे अटल बिहारी बाजपेयी से लेकर किताबों की रॉयल्टी तक, जीवन से लेकर मरण तक दुनिया भर के सवाल पूछता रहा और वे बिना थके उनका जवाब देते रहे.

उनकी इस बात ने मुझे बड़ा हैरान किया कि किताबों की रॉयल्टी से कुछ खास नहीं आता. यह भी कि बहुत करीबी लोग मर गए लेकिन उनको जाना ही था हमने पहले ही देख लिया था. पद्मश्री की कोई बात आयी तो बाकायदा उन्होंने कोई कुंडली की दशा बताई कि वह चल रही थी. उसमें पुरस्कार, राजकीय सम्मान मिलता ही है. यहां तक कि अटल जी की कुंडली के बारे में भी वे कुछ बोले थे लेकिन वह बात अब याद नहीं. कम बात करते हुए वे अक्सर चुप होकर हवा में कहीं देखते और फिर कुछ बोलते. हवा में जैसे उनको आगे-पीछे का सबकुछ दिखता था.

जीवन क्या है इसका जवाब मैंने अलग-अलग लोगों से सैकड़ों बार सुना है लेकिन इसका जवाब नीरज जी से सुनना ऐसा था कि विश्वास हो जाए कि हां यह वही फ़कीर है जो सब जानता है. जिसको कुछ दिया नहीं जा सकता. जिसका कुछ देर का साथ धूप-छांव का फर्क मिटा सकता है.

वे मौत को बहुत अच्छे से समझते थे, उनकी मृत्यु पर करीब तीस पेज की एक कविता है जो सभी को जीते-जी पढ़ लेनी चाहिए.

लखनऊ से अलीगढ़ उस दिन पांच घंटे में नहीं पांच मिनट में आया था. बेरोजगारी के उस साल में उनका बैग उठा लिया, इतनी देर साथ बैठ लिया...बाद के नौकरी वाले किसी साल की सारी कमाई भी कभी इससे ज्यादा नहीं लगी.