निर्देशक : शशांक खेतान

लेखक : नागराज मंजुले, शशांक खेतान

कलाकार : जाह्नवी कपूर, ईशान खट्टर, आशुतोष राणा, अंकित बिष्ट, श्रीधर वत्सर, खराज मुखर्जी

रेटिंग : 1.5 / 5

‘धड़क’ देखते वक्त एक सवाल अनेक बार जेहन में आता है. आखिर वो क्या वजह है कि हर दिल अजीज मराठी फिल्म ‘सैराट’ की हिंदी रीमेक बनाने की गुस्ताखी हुई? जो वजहें सार्वजनिक तौर पर बताई जाती हैं – ‘हम सैराट को ट्रिब्यूट देना चाहते हैं’, ‘हम सैराट को ज्यादा लोगों तक पहुंचाना चाहते हैं’– के अलावा बतौर दर्शक हमारी क्या नाकामी है, कि एक लगभग परफेक्ट फिल्म को बॉलीवुड सिर्फ दो साल के अंतराल में दोबारा बनाने की सीनाजोरी करने को तैयार हो जाता है?

जवाब इसका शायद यह है कि हम हिंदुस्तानी लोग सिनेमा के मामले में भी बंटे हुए हैं. हम पर क्षेत्रवाद इस कदर हावी है कि नॉर्थ इंडियन दर्शक सिनेमाघर जाकर बंगाली फिल्म कभी नहीं देखेगा. ‘सैराट’ जैसी मराठी फिल्म महाराष्ट्र के कुछ गैर-मराठी दर्शकों तक तो अपनी ख्याति के चलते पहुंच जाएगी लेकिन देशभर के गैर-मराठी दर्शक उसे देखने सिनेमाघर नहीं जाएंगे. न ही हमारे यहां थियेटर जाकर सबटाइटल्स के साथ क्षेत्रीय भाषाओं में फिल्में देखने का कल्चर पनप पाया है और न ही हम अपनी मातृ-भाषा के इतर दूसरी भाषा की फिल्मों को अंग्रेजी जितना उचित सम्मान देना सीख पाए हैं. इसीलिए, बॉलीवुड को मौका मिलता रहता है बेमिसाल हिंदुस्तानी फिल्मों के रीमेक बना-बनाकर उनकी आत्माओं का कत्ल करने का.

अगर आपने ‘सैराट’ नहीं देखी, तो ‘धड़क’ देखते वक्त वो आपको ‘सैराट’ की आत्मा का कत्ल नहीं लगेगी. लगेगा कि बचपन से हीरो-हीरोइन बनने का सपना देखने वाले और उसी की तैयारी करने के अलावा कुछ नहीं करने वाले फिल्मी दुनिया के दो प्रतिष्ठित खानदानों के प्रिवलेज्ड बच्चों ने नयनाभिराम लोकेशन्स पर अच्छा काम किया है. दोनों साथ बड़े क्यूट लगे हैं और नकली गुलाब की तरह उनका नकली प्यार दूर से देखने पर कभी-कभी असली भी लगा है. फिल्म के गाने जुबां पर तुंरत चढ़े हैं, और हृदयविदारक अंत ने तो भाईसाब, शरीर के हर सोए रोंगटे को सावधान की मुद्रा में खड़ा कर दिया है. बोले तो - ऐसा आप फोन पर किसी को बोल सकते हैं - फिल्म ठीक-ठाक है और वीकेंड आउटिंग का अपन का ध्येय पूरा हुआ है. बोलो स्वाहा!

लेकिन अगर आपने ‘सैराट’ देखी है और दलित नायक व ब्राह्मण नायिका की रक्तरंजित प्रेम-कहानी आज भी आपके दिल में बसती है तो ‘धड़क’ आपको रीमेक नहीं, घोर पाप लगेगी. ‘सैराट’ की हर खूबी को ‘धड़क’ ने खुद से अलग कर दिया है और सिर्फ पटकथा को पन्ने दर पन्ने ‘दिल’ और ‘कयामत से कयामत तक’ टाइप स्टाइल में शूट किया है. यहां तक कि स्लो-मोशन में गाने शूट करने की बॉलीवुड की जिस खासियत को ‘सैराट’ में कमाल अंदाज में उपयोग कर अद्भुत पल क्रिएट किए गए थे, उस काम में भी ‘धड़क’ असफल रहती है. ऊपर से चालाकी भी ऐसी दिखाई गई है कि तकरीबन तीन घंटे की मराठी फिल्म को ज्यादा कमर्शियल बनाने के लिए दो घंटे बीस मिनट का कर दिया गया है और ‘सैराट’ का इंटरवल के बाद वाला जो हिस्सा नायक-नायिका के संघर्षों की लंबी करुण दास्तान था, उसे काट-छांटकर बेहद छोटा और बहुत ज्यादा फिल्मी कर दिया गया है.

इससे फिल्म का इम्पेक्ट कम हुआ है, और ‘सैराट’ के मशहूर अंत से थोड़ा हटकर जो अंत दिखाया गया है वो भी - बाद में बैठकर देर तक सोचो तो समझ आता है - कि इमोशनल मैन्युपुलेशन ज्यादा है. ऊपर से ‘धड़क’ के इस दूसरे हिस्से में नायक-नायिका को मदद करने वाले कई अनजान लोग मिल जाते हैं, जबकि ‘सैराट’ में आर्ची और परश्या को अकेले दुश्कर जीवन भोगना पड़ता है. जो एक हाथ उनकी मदद को आगे भी आता है, वो भी उनके कठोर जीवन में नरमी नहीं भरता, बस कठोरता थोड़ी कम कर देता है. ‘सैराट’ के दूसरे हिस्से में कुछ भी फिल्मी नहीं था, बस कि जैसे वर्ण व्यवस्था के प्रति आसक्त एक समाज में विद्रोह कर बैठे किन्हीं असल जिंदगी के दलित और ब्राह्मण प्रेमियों का जीवन परदे पर चल रहा था.

‘धड़क’ यह सब दिखाने की औकात ही नहीं रखती. और यह बात इंटरवल के बाद नहीं, फिल्म शुरू होते ही समझ आ जाती है जब एक गांव की पृष्ठभूमि में जन्म लेने वाली अंतरजातीय प्रेम-कहानी को यह हिंदी फिल्म खूबसूरत महलों और किलों के लिए मशहूर उदयपुर में स्थापित कर देती है. दलित नायक की यह पहचान तकरीबन ‘व्हाइटवॉश’ कर देती है और आप बस उसके बाप को एक-दो बार कहते पाते हैं कि हीरोइन ऊंची जाति की है इसलिए उससे दूर रह.

नागराज मंजुले ने जिस सच्चाई से अपने नायक परश्या की दलित आइडेंटिटी ‘सैराट’ में स्थापित की थी, और ब्राह्मण नायिका व उसके प्रेम से पनपे कॉन्फ्लिक्ट को साधा था, वही तो ‘सैराट’ की सबसे खास बात थी. आपने – जी हां, ‘धड़क’ के निर्देशक शशांक खेतान आपने – उस आइडेंटिटी को ही छिपा लिया, उस कॉन्फ्लिक्ट को ही दबा दिया तो फिर ‘सैराट’ की रीमेक बनाई ही क्यों! ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ और ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ के बाद ‘शाहिद कपूर के छोटे भाई की दुल्हनिया’ जैसी कोई पलायनवादी प्रेम-कहानी बना लेते.

अफसोस की बात है, कि बॉलीवुड आज भी दलित नायकों का ईमानदार चित्रण करने से घबराता है.

‘धड़क’ की एक और बड़ी कमी नायिका का चित्रण है. ‘सैराट’ की आर्ची यहां पार्थवी हो गई है और बेहद साधारण नैन-नक्श वाली सांवली रिंकु राजगुरु की जगह श्रीदेवी की परी जैसी खूबसूरत दिखने वाली बेटी जाह्नवी ने ली है.

कास्ट पॉलिटिक्स के अलावा ‘सैराट’ की दूसरी सबसे खास बात रिंकु राजगुरु और तब 14-15 साल की रही इस नई-नवेली अभिनेत्री का चरित्र-चित्रण ही था. आपने – जी हां, निर्देशक शशांक खेतान, एक बार फिर आपने – एक तो कमाल काम करने वाली इस अभिनेत्री को दोबारा हिंदी रीमेक में लेने की हिम्मत नहीं दिखाई, और दूसरा आर्ची के किरदार में जो अथाह बहादुरी मौजूद थी, उसका आप सिर्फ लेश-मात्र ही जाह्नवी के किरदार पार्थवी को दे पाए. वाकपटुता दे दी और पुलिस वाले से रिवॉल्वर छीनना भी सिखा दिया, लेकिन ट्रैक्टर चलाकर दलित बस्ती में चली जाने वाली, बुलेट चलाकर कॉलेज जाने वाली और अपने प्रेमी नायक को पिटते देख ऊंची आवाज में बोलकर ही पीटने वाले को डरा देने वाली नायिका आप नहीं गढ़ पाए. अफसोस!

जाह्नवी कपूर ने पार्थवी के रोल में अच्छा काम किया है. वे अभिनय में बहुत कच्ची हैं लेकिन जिस तरह का यह किरदार है, उसपर उनका कच्चापन जंचता है. फिल्म के दूसरे हिस्से में जब उन्हें परिपक्व दिखना था, तब जरूर उनकी कमियां ज्यादा जोर-शोर से नजर आती हैं, लेकिन संपूर्णता में पहली फिल्म के हिसाब से वे प्रभावित करती हैं. श्रीदेवी की लेगेसी में वे शर्तिया कुछ जोड़ेंगी ही, घटाएंगी नहीं. खूबसूरत अभिनेत्रियों को एकटक देखने की फुर्सत रखने वाले युवा भी उन्हें फिल्म में टकटकी लगाकर देखेंगे.

नायिका के इतर ‘सैराट’ का नायक दब्बू था. नायिका ही हमेशा झांसी की रानी बनी रही थी और इस वजह से जो कैमिस्ट्री दोनों के बीच पनपी थी वो अद्भुत के स्तर की चीज थी. ‘धड़क’ में ईशान खट्टर के किरदार मधु को भी वही साधारणता देने की कोशिश की गई है, लेकिन बचपन से शो-बिज में आने की तैयारी करने वाले लड़कों के चेहरों पर आत्मविश्वास इतना हद चमकता है कि दब्बू या कमजोर किरदारों में वे लाख कोशिशों के बावजूद कुछ न कुछ कमी छोड़ ही देते हैं. हालांकि, ईशान के मासूम चेहरे का एक अनूठा गुरुत्वाकर्षण है जो उनके अभिनय की तरफ खींचता है, और कठिन से कठिन भाव को वे अत्यंत आसानी से व्यक्त कर लेते हैं. पूर्णत: नैचुरल कलाकार प्रतीत होता ये एक्टर लंबी रेस का भी घोड़ा मालूम होता है.

‘धड़क’ धड़ से कटकर अलग गिर जाती अगर यही ईशान खट्टर और जाह्नवी कपूर इसके पास नहीं होते. उनका सुंदर-सजीला व्यक्तित्व फिल्म को अंत तक देखे जाने की वजह देता है. लेकिन जनाब, ठीक इसी वजह के लिए तो आलसी फिल्मों में स्टार किड्स और सुपरस्टारों को लिया जाता है. है कि नहीं?