संसद के मॉनसून सत्र के दौरान सदन की अभी तक की कार्यवाही देख कर लग रहा है कि हमेशा की तरह इस बार का सत्र भी हंगामे की भेंट चढ़ सकता है. गुरुवार को मॉब लिंचिंग के मुद्दे पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह के बयान से नाराज़ होकर कांग्रेस पार्टी वॉकआउट कर गई. वहीं, शुक्रवार को अविश्वास प्रस्ताव पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के भाषण के दौरान हुए हंगामे के चलते लोकसभा स्पीकर को एक बार संसद की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ गई. जानकार कह रह हैं कि अगर ऐसा पूरा सत्र के दौरान हुआ तो लंबित पड़े महत्वपूर्ण विधेयक एक बार फिर पारित नहीं हो पाएंगे. मोटर वाहन संशोधन विधेयक उनमें से एक है जिसका संबंध सीधे आम लोगों की ज़िंदगी ही नहीं जान से भी जुड़ा हुआ है.

यह विधेयक कितना महत्वपूर्ण है यह समझने के लिए कुछ हालिया जानकारियों पर ग़ौर करने की ज़रूरत है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की कुछ दिन पहले की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2017 में सड़क के गड्ढों की वजह से क़रीब 3,600 लोगों की मौत हो गई. रिपोर्ट में बताया गया कि यह आंकड़ा 2016 में मारे गए लोगों की संख्या से 50 प्रतिशत ज़्यादा था. इस संख्या की तुलना अगर आतंकवाद की वजह से मारे गए लोगों की संख्या से करें तो पता चलता है कि देश की सड़कों के गड्ढे लोगों की जान लेने में आतंकवाद से चार गुना से भी ज़्यादा आगे हैं. अख़बार के मुताबिक़ साल 2017 में आतंकी हमलों के चलते 803 लोग मारे गए. इनमें नक्सली हमलों में मारे गए लोग भी शामिल हैं.

भाजपा शासित राज्यों की सड़कें सबसे अधिक जानलेवा

कई लोगों का कहना है कि निर्दोष लोगों की जान लेने के लिहाज़ से देखें तो सड़क के गड्ढे आतंकवाद से ज़्यादा बड़ी समस्या हैं. यह हाल तब है जब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का दावा है कि देश में सड़क निर्माण का काम अभूतपूर्व रूप से चल रहा है. उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार है. जब योगी आदित्यनाथ यहां के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने कहा था कि कुछ ही दिनों में प्रदेश की सभी सड़कों के गड्ढे भर दिए जाएंगे. तब उत्तर प्रदेश को ‘गड्ढामुक्त’ बनाने के दावे किए जा रहे थे. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि गड्ढों की वजह से सबसे ज़्यादा मौतें उत्तर प्रदेश में होती हैं. साल 2016 में 714 और 2017 में 987 मौतों के साथ उत्तर प्रदेश इस मामले में अन्य सभी राज्यों से अव्वल रहा.

यही हाल महाराष्ट्र का है जो इस मामले में दूसरे नंबर पर है. यहां 2016 के मुक़ाबले 2017 में गड्ढों की वजह से होने वाली मौतों में दोगुना इज़ाफ़ा हुआ है. रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में 329 लोग गड्ढों की वजह से मारे गए थे. वहीं, 2017 में यह संख्या 726 हो गई. भाजपा नेतृत्व वाले इस एक और राज्य में सड़क के गड्ढे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनते जा रहे हैं. हाल में इस समस्या को लेकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं ने विरोध स्वरूप राज्य सरकार के मंत्रालय के कार्यालय के सामने की सड़क पर बना फ़ुटपाथ तोड़ डाला. हालात ऐसे हैं कि आम लोग ख़ुद ही गड्ढों को भरने निकल पड़े हैं. मुंबई के युवा और कुछ छोटे समूह सोशल मीडिया पर अभियान चला रहे हैं और गड्ढे वाली सड़कों की तस्वीरें शेयर कर रहे हैं.

हरियाणा और गुजरात के हालात भी ऐसे ही हैं. गड्ढों की वजह से होने वाली मौतों के मामले में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के बाद ये दोनों राज्य क्रमशः तीसरे और चौथे नंबर पर आते हैं. साल 2016 में ये दोनों ही शीर्ष चार राज्यों में नहीं थे. लेकिन पिछले साल इन दोनों राज्यों में सड़कों के गड्ढों की वजह से हुई मौतों ने इन्हें शीर्ष चार राज्यों में ला खड़ा किया. हरियाणा के लिए यह आंकड़ा 522 रहा तो गुजरात के लिए 228. गुजरात के चौथे स्थान पर होने पर कई जानकारों का कहना है कि यह ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए निराशाजनक होना चाहिए. वे गुजरात के ही हैं और प्रधानमंत्री बनने से पहले लंबे वक़्त तक इस राज्य के मुख्यमंत्री रहे. उनके प्रधानमंत्री बनने के पीछे गुजरात विकास मॉडल एक प्रमुख कारण रहा. लेकिन सड़कों का हाल इस मॉडल पर बड़े सवाल उठाता दिख रहा है.

मोदी सरकार की 2022 तक 80,000 किलोमीटर सड़क बनाने की योजना है. सरकार हर दिन 22 किलोमीटर सड़क निर्माण का दावा कर रही है. लेकिन जिस तरह सड़कों पर गड्ढे बढ़ते जा रहे हैं, उससे सवाल उठता है कि आख़िर धड़ाधड़ बन रही सड़कों की गुणवत्ता क्या है.

सुप्रीम कोर्ट की चिंता

सड़क के गड्ढे कैसे राष्ट्रीय समस्या बन चुके हैं, यह सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी से समझा जा सकता है. सर्वोच्च अदालत ने इन गड्ढों की वजह से मरने वालों की संख्या पर चिंता व्यक्त करते हुए अपनी ही बनाई सड़क सुरक्षा समिति को इस मामले में ज़रूरी क़दम उठाने को कहा है. कोर्ट ने कहा कि आतंकी हमलों से ज़्यादा लोगों का गड्ढों की वजह से मरना बताता है कि हालात भयावह हैं.

राजनीतिक दलों के हंगामे की वजह से अटका पड़ा विधेयक

अधिकारियों में फैला भ्रष्टाचार और लापरवाह रवैया सड़कों पर जानलेवा गड्ढे बनने और बने रहने के लिए ज़िम्मेदार है. लेकिन लोगों की असमय मौत के लिए केवल अधिकारियों को आलोचना के लपेटे में लेना काफ़ी नहीं है. आलोचक कहते हैं कि इन मौतों के लिए देश के राजनीतिक दल भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं. नगर पालिकाएं और सड़क निर्माण प्राधिकरण अच्छी गुणवत्ता वाली सड़कें नहीं बनाने के लिए ज़िम्मेदार हैं. सड़क बनने के बाद उसके रखरखाव में भी लापरवाही बरती जाती है. ऐसे में अगर कई हादसा हो जाए तो संबंधित अधिकारी पर कार्रवाई करने के लिए जो क़ानून पारित कराने की ज़रूरत है वह संसद में राजनीतिक दलों के हंगामों की वजह से लटका पड़ा है.

दरअसल केंद्रीय सड़क मंत्रालय का कहना है कि मोटर वाहन संशोधन विधेयक में अधिकारियों पर भारी जुर्माने लगाने से संबंधित प्रावधान किया गया है लेकिन, संसद की कार्यवाही बार-बार स्थगित होने की वजह से यह विधेयक पास नहीं हो पा रहा. हालांकि, सड़क निर्माण से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि सड़कों के ख़राब डिज़ाइन व रखरखाव और समस्याओं का निपटारा करने के बजाय उनकी अनदेखी करने वाले अधिकारियों के ख़िलाफ़ आईपीसी के तहत ग़ैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज होना चाहिए.

बहरहाल, इस मुद्दे पर इसी महीने कई सामाजिक संस्थाओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पत्र लिखा. उन्होंने कहा है कि सड़क सुरक्षा को राष्ट्रीय प्राथमिकता मानते हुए मोटर वाहन संशोधन विधेयक का लागू होना ज़रूरी है. लोकसभा में पास होने के बाद यह राज्यसभा में अटका पड़ा है. जैसे हालात हैं उनमें इस बार भी इसका पास होना मुश्किल दिखता है. जानकारों के मुताबिक इसकी एक वजह तो यह है कि सड़कों के गड्ढे सरकार के साथ आम लोगों के लिए भी कोई मुद्दा नहीं हैं. इस समय सड़कों के गड्ढे इन सबसे ज़्यादा जानलेवा साबित हो रहे हैं. लेकिन न सरकार, न विपक्ष और न ही मीडिया में इस समस्या को खास तवज्जो मिल रही है.