राजनेता हैं. ख़ुद अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश तो करेंगे ही, साथ में सामने वाले की तरफ उंगली भी उठाएंगे. लेकिन कहा जाता है कि जब आप एक उंगली दूसरे की तरफ उठाते हैं तो आपकी तीन उंगलियां आपकी तरफ ही मुड़ी होती हैं. लोक सभा में शुक्रवार को हुई अविश्वास प्रस्ताव की क़वायद के दौरान और उसके बाद जो हुआ उसका सार-संक्षेप यही है. नतीज़ा तो वही रहा जो पहले से सबको पता था. प्रस्ताव गिर गया. उसके समर्थन में सिर्फ 126 वोट ही पड़े. वहीं प्रस्ताव के ख़िलाफ़ केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 325 सांसदों का समर्थन जुटा लिया.

इस सफलता के बाद सरकार का सीना फूलना स्वाभाविक है. लेकिन विपक्ष भी हार मानने को तैयार नहीं है. उसका दावा है कि उसने अविश्वास प्रस्ताव सरकार गिराने के मक़सद से नहीं, बल्कि सरकार की ख़ामियां उजागर करने के लिए पेश किया था और इस मक़सद में वह सफल रहा है. यह दावा कुछ हद तक सही भी हो सकता है. पर दिलचस्प बात यह है कि अविश्वास प्रस्ताव की इस क़वायद ने सत्ता पक्ष ही नहीं विपक्ष की भी दरारें यानी फॉल्ट लाइनें उजागर कर के रख दी हैं. आखिर इस कवायद का एक छिपा मक़सद विपक्षी एकता का प्रदर्शन भी था.

विपक्ष का नेतृत्व करने की संभावना पर राहुल गांधी ने ख़ुद अपने व्यवहार से सवाल खड़े कर दिए

मोदी सरकार के ख़िलाफ़ जिस तरह विपक्षी पार्टियां लामबंद हो रही हैं, उसे देखकर फिलहाल तो लगता है कि 2019 में राष्ट्रीय स्तर पर नहीं तो राज्यों में जरूर दो-तीन या उससे ज़्यादा पार्टियां मिलकर नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी की चुनौती का सामना कर सकती हैं. ऐसा हुआ तो यह भी संभव है कि अगली लोक सभा में किसी एक दल को सरकार बनाने लायक पूरा बहुमत न मिले. तब विपक्षी दल आपस में गठजोड़ कर सरकार बनाने की कोशिश भी कर सकते हैं. हालांकि फिलहाल ये सब संभावनाएं ही हैं लेकिन इन संभावनाओं से जुड़ा एक यक्ष प्रश्न अभी से निकल रहा है. सवाल यह है कि 2019 में सरकार बनाने के लिए विपक्षी दल किसके नेतृत्व में एकजुट होंगे या होना चाहेंगे.

क्या राहुल गांधी? चूंकि वे कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी के अध्यक्ष हैं इसलिए स्वाभाविक तौर पर वे विपक्षी गठजोड़ का नेतृत्व करने के दावेदारों में शुमार होंगे. लेकिन क्या तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), बहुजन समाज पार्टी (बसपा), समाजवादी पार्टी (सपा), राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी), जनता दल-धर्मनिरपेक्ष (जेडीएस), तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी), तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) और बीजू जनता दल (बीजेडी) जैसे दल तैयार होंगे? इस पर संदेह की पूरी गुंज़ाइश है क्योंकि इनमें से सपा के प्रमुख अखिलेश यादव और बीजेडी अध्यक्ष नवीन पटनायक को छोड़कर सभी दलों के प्रमुख केंद्र की राजनीति में नेतृत्व करने की अपनी मंशा खुले तौर पर जता चुके हैं.

टीएमसी की प्रमुख ममता बनर्जी और टीआरएस के मुखिया के चंद्रशेखर राव (केसीआर) क्षेत्रीय दलों को एकजुट कर उनका मोर्चा बनाने की कोशिश ही इसलिए कर रहे हैं कि वे भविष्य में अपने प्रधानमंत्री पद की संभावनाएं देख रहे हैं. टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू भी साफ कह चुके हैं कि वे इसकी पूरी कोशिश करेंगे कि 2019 में केंद्र की सरकार बनने-बनाने की प्रक्रिया में उनकी पार्टी निर्णायक ताक़त हो. बसपा की ओर से मायावती को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जा चुका है. जेडीएस प्रमुख एचडी देवेगौड़ा पूर्व प्रधानमंत्री हैं. वहीं एनसीपी के मुखिया शरद पवार को तब से प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में गिना जाता है जब वे कांग्रेस के दिग्गज हुआ करते थे.

तिस पर ख़बरें ये भी हैं कि मायावती और ममता बनर्जी जैसे दिग्गज साफ तौर पर राहुल गांधी के नेतृत्व में किसी संभावित राष्ट्रीय गठबंधन में शामिल होने से परहेज़ जता रहे हैं. इस सब से राहुल वाक़िफ़ न होंगे यह माना नहीं जा सकता. ऐसे में उनसे अपेक्षा रहती है कि वे हर उपलब्ध मौके पर परिपक्व नेता की तरह ख़ुद को पेश करें ताकि विपक्ष के कद्दावर नेताओं में उनकी स्वीकार्यता बढ़े. अविश्वास प्रस्ताव की बहस के दौरान उन्होंने जब मोदी सरकार को आक्रामक तरीके से घेरा तो यह अपेक्षा पूरी होती भी दिखी. लेकिन चंद ही पलों वे कुछ ऐसा कर गए जिसके बाद उनके व्यवहार पर न सिर्फ अंगुलियां उठ गईं बल्कि अगले दिन भी सुर्ख़ियों में उनके भाषण के बजाय यही अपरिपक्वता छाई रही.

भाषण ख़त्म करने के बाद राहुल गांधी सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सीट के पास पहुंचे. उनसे हाथ मिलाया और उनके गले जा लगे. यही नहीं. ख़बरों की मानें तो सीट पर लौटने के बाद जब उनकी पार्टी के युवा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उन्हें थम्स अप के साथ बधाई दी तो वे उन्हें आंख मारते हुए भी दिखाई दिए. (देखें वीडियो). ज़ाहिर तौर इसके बाद मीडिया और सोशल मीडिया पर यही सुर्खी बननी थी जो बनी भी. लेकिन इस व्यवहार से दूसरे दलों के नेता निश्चित ही सहमत नहीं होंगे. लोक सभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन और संसदीय कार्य मंत्री अनंत कुमार ने तो तुरंत आपत्ति भी जता दी. उन्होंने साफ कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष का व्यवहार अनुचित और सदन की गरिमा के विपरीत था.

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विपक्षी एकता का मंसूबा भी पूरी तरह परवान नहीं चढ़ा

अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के जरिए विपक्ष अपनी एकता साबित करना चाहता था. तैयारी भी पूरी थी. कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने तो एक दिन पहले दावा भी कर दिया था कि आंकड़े उनके पक्ष में हैं. यानी विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव पारित करा सकता है. अलबत्ता पता उन्हें भी था कि यह महज़ दावा ही है. फिर भी यह मानकर चला जा रहा था कि विपक्ष क़रीब 150 सदस्यों का समर्थन तो जुटा ही सकता है. टीआरएस और बीजेडी जैसे दलों के बारे में माना जा रहा था कि वे अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन कर विपक्षी एकता की धार को तीखा करने में अपना योगदान देंगे. इस तरह इन दलों की मदद लेकर विपक्ष का आंकड़ा 175 के आसपास पहुंचाने की कोशिशें भी हुईं.

लेकिन नतीज़ा इसका ठीक उल्टा निकला. अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन करने वाले विपक्षी सांसदों की संख्या 126 पर ही आकर अटक गई. वहीं बीजेडी और टीआरएस जैसी पार्टियों ने मतदन में हिस्सा ही नहीं लिया. वे सदन से बहिर्गमन कर गईं. जबकि काफी समय से चर्चा यह भी चल रही थी कि कांग्रेस पार्टी इन दोनों दलों को अपनी तरफ लाने के लिए इनमें से किसी को राज्य सभा के उपसभापति पद की पेशकश भी कर सकती है. इस पद के लिए चुनाव मानसून सत्र में ही हो सकता है और वहां भी विपक्षी एकता का परीक्षण होना है. हालांकि अभी तो विपक्षी एकता का मंसूबा पूरा होते नज़र नहीं आ रहा है. संभवत: इसी से उत्साहित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष पर कटाक्ष भी किया था, ‘ईश्वर आप सभी को इतनी शक्ति दे कि आप 2024 में भी इसी तरह अविश्वास प्रस्ताव ला सकें.’

प्रधानमंत्री और उनकी अगुवाई वाले सत्ता पक्ष का उत्साह भी दिखावा ज़्यादा लगता है

हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उत्साह भी सत्ता पक्ष की ताक़त के बारे में एक धारणा बनाने के लिए ही था, ऐसा लगता है. क्योंकि सब कुछ ठीक तो उनकी तरफ भी नहीं है. यह अविश्वास प्रस्ताव की कवायद के दौरान उजागर भी हुआ. ठीक होता तो अविश्वास प्रस्ताव की नौबत ही नहीं आती. क्योंकि यहां सिर्फ याद ही रखना होगा कि मोदी सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश करने वाली पार्टी- टीडीपी कोई और नहीं बल्कि भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) की पूर्व घटक है. वह चार साल तक मोदी सरकार में भागीदार रही है. पर अभी इसी साल आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्ज़ा देने की मांग न मानने से नाराज़ होकर टीडीपी ने एनडीए ने छोड़ा है. और अब वह भाजपा काे सबक सिखाने के दावे के साथ इसकी कोशिशें भी करती दिख रही है.

सिर्फ टीडीपी ही नहीं. केंद्र और महाराष्ट्र की सरकार में शामिल शिवसेना की नाराज़गी भी जगज़ाहिर है. हालांकि उसने अब तक एनडीए छोड़ा नहीं है. लेकिन वह भाजपा और मोदी सरकार को नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है. अविश्वास प्रस्ताव की बहस के दौरान भी उसने यही किया. उसने बहस में हिस्सा ही नहीं लिया. इस अहम मौके पर सरकार का हिस्सा होने के बाद भी उसका साथ नहीं दिया. जबकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ख़ुद इस बाबत शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से फोन पर बात की थी. हालांकि शिवसेना से समर्थन या विरोध से सरकार की सेहत पर कोई फर्क़ नहीं पड़ना था. पड़ा भी नहीं और उसे तमिलनाडु के सत्ताधारी दल- एआईएडीएमके (अखिल भारतीय अन्नाद्रविड़ मुनेत्र कड़गम) की मदद से 325 वोट हासिल हो गए.

यानी कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अविश्वास प्रस्ताव की पूरी क़वायद आम जनता के बीच अपने-अपने पक्ष में एक धारणा बनाने के लिए ज़्यादा थी. और इस लिहाज़ से देखें तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों एक हद तक विफल ही रहे हैं.