पाकिस्तान में 25 जुलाई को होने वाले आम चुनाव में मुख्य मुकाबला इमरान खान, नवाज शरीफ और बिलावल भुट्टो जरदारी की पार्टी के बीच है. चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में इमरान खान का पलड़ा काफी भारी बताया जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषकों की भी मानें तो इस चुनाव से पहले जिस तरह की परिस्थितियां बनी हैं, उन्हें देखते हुए यह इमरान का अब तक का सबसे बेहतर चुनाव साबित होने वाला है. ये लोग यह भी कहते हैं कि इमरान को चुनाव जीतने के लिए इससे बेहतर परिस्थितियां भविष्य में शायद ही मिल सकें.

कोई कद्दावर नेता सामने नहीं

1996 में राजनीति में कदम रखने वाले इमरान खान अगर अब तक सत्ता में नहीं पहुंच सके तो इसकी सबसे बड़ी वजह बेनजीर भुट्टो और नवाज शरीफ जैसे कद्दावर नेताओं का उनके सामने होना था. लेकिन, इस बार के चुनाव में ये दोनों ही नहीं हैं. साथ ही इस चुनाव में पीएमएल-एन नवाज शरीफ के छोटे भाई शहबाज शरीफ के नेतृत्व में और पीपीपी बिलावल भुट्टो के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है. ये दोनों ही नेता जनाधार और लोकप्रियता के मामले इमरान के सामने फीके नजर आते हैं.

पिछले चुनावों में की गई गलतियों से सबक

इस चुनाव में इमरान खान के मजबूत नजर आने की एक और भी वजह है. इस बार उन्होंने कई ऐसे फैसले लिए हैं जिनसे पता चलता है कि वे पिछले चुनावों में की गई गलतियों से सबक ले चुके हैं और उन्हें दोहराने के मूड में नहीं हैं. इमरान की दो बड़ी कमजोरियां मानी जाती थीं - एक तो उनकी पार्टी पीटीआई में ऐसे नेता नहीं थे जो अपने दम पर चुनाव जीत सकें. दूसरा, पंजाब और सिंध के ग्रामीण क्षेत्रों में पीटीआई का जनाधार न के बराबर था. लेकिन, इस बार इमरान ने इन दोनों ही कमजोरियों से उभरने की पूरी कोशिश की है. उन्होंने अपनी पार्टी के करीब एक तिहाई टिकट उन नेताओं को दिए हैं जो कल तक पीएमएल-एन और पीपीपी सहित कई अन्य पार्टियों के कद्दावर नेता माने जाते थे. बताते हैं कि इनमें से अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों से ही आते हैं और अपने दम पर जीतने का माद्दा भी रखते हैं.

मध्यपूर्व (खाड़ी) से छपने वाले एक अखबार में पाकिस्तान मामलों के जानकार अशफाक अहमद कहते हैं, ‘इमरान इस बार अपनी बिसात बहुत सोच समझकर बिछा रहे हैं. इस बार वे अपनी उन कमियों पर काम कर रहे हैं जो वाकई उनके सत्ता में पहुंचने में बड़ी बाधा बनती थीं.’ अशफाक आगे कहते हैं, ‘यह सच है कि पीएमएल-एन के गढ़ पंजाब और पीपीपी के गढ़ सिंध में वे केवल अपनी लोकप्रियता के दम पर चुनाव नहीं जीत सकते. इसके लिए उन्हें ऐसे उम्मीदवारों की जरूरत थी जिनका अपना रसूख हो.’

इस रणनीति से इमरान खान को एक और बड़ा फायदा हुआ है. बताया जाता है कि दूसरी पार्टियों से आए इन नेताओं ने उनकी पार्टी को करोड़ों रुपए का चंदा दिया है. हालांकि, विपक्षी पार्टियों के नेताओं के आने से पीटीआई के कई समर्थक उनसे नाराज हो गए. लेकिन, कहा जा रहा है कि इमरान खान ने काफी हद तक उनकी नाराजगी दूर कर दी है.

इस पूरे मामले को लेकर एक साक्षात्कार में इमरान कहते हैं, ‘मैं सभी से यही कहता हूं कि हमारा लक्ष्य सत्ता में आना है और इसके लिए हमें अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंदी पीएमएल-एन को किसी भी तरह हराना होगा. इसी वजह से मैंने न केवल मैच जिताऊ खिलाड़ियों को टीम में लिया है बल्कि पीएमएल-एन को कमजोर करने के लिए ऐसी जगह अपने उम्मीदवार भी नहीं उतारे जहां कोई अन्य पार्टी उन पर हमसे ज्यादा भारी पड़ रही हो.’ इमरान यह भी कहते हैं, ‘मैंने कार्यकर्ताओं से कहा कि अगर आपको यह डर है कि दूसरी पार्टियों से आए लोगों की वजह से हमारी सरकार बेहतर नहीं कर पाएगी तो ऐसा नहीं होगा, क्योंकि इन सबका लीडर ईमानदार और मजबूत होगा.’

कट्टरपंथियों का पूरा समर्थन

इमरान खान इस चुनाव में और भी बहुत कुछ ऐसा कर रहे हैं जिसके लिए उन्हें नहीं जाना जाता था. उन्होंने इस चुनाव में कट्टरपंथियों का समर्थन पाने के लिए एड़ी से चोटी तक का जोर लगा दिया है. पाकिस्तान के अखबार ‘द नेशन’ के मुताबिक इमरान इसके लिए खुद 50 से ज्यादा इमामों से निजी मुलाकात कर चुके हैं. इसका उन्हें फायदा भी मिला है, इनमें से अधिकांश ने उन्हें समर्थन देने का ऐलान किया है.

पाकिस्तान के चर्चित अखबार डॉन के पत्रकार अशहर रहमान ‘द गार्डियन’ को बताते हैं कि खैबर पख्तूनख्वा में इमरान की सरकार ने मौलाना समी-उल-हक का समर्थन पाने के लिए उनके मदरसे को तीन लाख डॉलर की बड़ी मदद दी. इसके बदले में मौलाना की राजनीतिक पार्टी जमीयत उलेमा इस्लाम-समी (जेयूआई-एस) ने पीटीआई के साथ गठबंधन की घोषणा की. पाकिस्तान में मौलाना समी-उल-हक को ‘फादर ऑफ़ तालिबान’ के नाम से भी जाना जाता है और इनका ये मदरसा तालिबानी लड़ाकों को ट्रेनिंग देने के लिए भी चर्चित है.

सेना का भी साथ

पाकिस्तान में एक और बड़ा पक्ष वहां की सेना है जिसकी छिपी ही सही लेकिन हर मामले में बड़ी भूमिका होती है. कभी बेनजीर भुट्टो से लेकर नवाज शरीफ को तक सत्ता तक पहुंचवा चुकी सेना का हाथ इस बार इमरान के सिर पर माना जा रहा है. पाकिस्तानी सेना पहले ही नवाज शरीफ पर अदालत के जरिए राजनीतिक प्रतिबंध लगवाकर इमरान की राह का सबसे बड़ा रोड़ा हटा चुकी है. इसके अलावा कई और तरह से भी उसने इमरान की मदद की है. पिछले दिनों जब पंजाब और सिंध में इमरान का माहौल कमजोर दिखा तो सेना ने पीएमएल-एन और पीपीपी के कई उम्मीदवारों को धमकाकर पार्टी छोड़ने और स्वतंत्र रूप से या इमरान की पार्टी से चुनाव लड़ने को मजबूर किया.

इसी तरह सेना ने सिंध प्रांत की पार्टी मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) में दो फाड़ करवाकर ‘पाकिस्तान सरजमीं पार्टी’ के नाम से एक नई पार्टी बनवा दी. इसी तरह बलूचिस्तान में पीएमएल-एन में दरार डलवाकर उसने ‘बलूच अवाम पार्टी’ बनवा दी. नवाज शरीफ के जो समर्थक इस नई पार्टी के साथ जाने को तैयार नहीं हुए उन्हें स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने को मजबूर किया गया.

इसके अलावा बीते शनिवार को इस्लामाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शौकत अजीज ने एक बड़ा खुलासा किया. उन्होंने दावा किया कि सेना नहीं चाहती कि नवाज शरीफ को चुनाव से पहले जमानत मिले. अजीज के मुताबिक आईएसआई के कहने पर ही नवाज शरीफ की सज़ा के खिलाफ दायर अपील की सुनवाई करने वाली बेंच में उन्हें शामिल नहीं किया गया क्योंकि खुफिया एजेंसी को लगता था कि वे उसकी इच्छा के खिलाफ जा सकते हैं.

अगली बार मैदान में विरोधी पार्टियों के परिपक्व उत्तराधिकारी होंगे

पाकिस्तान की राजनीति पर नजर रखने वाले कई जानकार यह भी कहते हैं कि अगर इतना सबकुछ अपने पक्ष में होने के बावजूद इमरान खान प्रधानमंत्री नहीं बने तो फिर भविष्य में उनकी यह हसरत शायद ही पूरी हो. उनके मुताबिक इसकी पहली वजह यह है कि इस स्थिति के बाद भी चुनाव हारने से उनके समर्थकों का हौसला बुरी तरह टूट जाएगा क्योंकि फिर यह लगभग साफ़ हो जाएगा कि देश की जनता ही इमरान को सत्ता में नहीं लाना चाहती.

इसके अलावा अगले चुनाव तक न सिर्फ नवाज शरीफ की राजनीतिक उत्तराधिकारी मरियम शरीफ एक परिपक्व नेता के रूप में उनके सामने होंगी बल्कि बेनजीर भुट्टो के पुत्र बिलावल भुट्टो भी आज से ज्यादा अनुभवी हो चुके होंगे. और फिर यह भी जरूरी नहीं कि तब भी पाकिस्तानी सेना इमरान के साथ ही खड़ी हो.

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