शुक्रवार को संसद में पेश अविश्वास प्रस्ताव और इसके बाद रविवार को हुई कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्लूसी) की बैठक का अगर कोई सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक निष्कर्ष निकाला जाए तो वह यही होगा कि 2019 के पहले राहुल गांधी को कई चुनौतियां से पार पाना है.

कांग्रेस का देशभर में असर है और भले ही संसद में इसके पास पर्याप्त सदस्य न हों, लेकिन यह मुख्य विपक्षी पार्टी तो है ही. इसका अध्यक्ष होने के बावजूद फिलहाल राहुल गांधी नई तरह से चर्चा में हैं. बीते लंबे अरसे के दौरान उनके राजनीतिक मौके गंवाने और चुनावी राजनीति में मात खाने की ही लगातार चर्चा हुई है लेकिन शुक्रवार को उन्होंने संसद में खुद को बेहद प्रभावशाली अंदाज में पेश किया और यह भाजपा से ज्यादा खुद उनके लिए अहम था. वहीं कांग्रेस कार्यसमिति ने अपने पार्टी अध्यक्ष को अगले आम चुनाव के लिए गठबंधन बनाने के मकसद से मोलभाव करने की जिम्मेदारी दे दी है. बताया जा रहा है कि इसके लिए पार्टी एक अलग से पैनल भी बना रही है. कुल मिलाकर अब राहुल गांधी इस सब कवायद के केंद्र में हैं.

लेकिन गठबंधन बनाने और उसे कायम रखने में लेन-देन शामिल होता है. कांग्रेस को हो सकता है, यहां ‘देना’ ज्यादा पड़े. यह कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा कि क्योंकि वह अब तक स्वीकार नहीं कर पाई है कि उसके दबदबे वाले दिन कब के लद चुके हैं. यह बात अन्य पार्टियां अच्छे से समझती हैं. सीडब्लूसी की बैठक पर भाजपा प्रवक्ता ने तंज कसते हुए कहा भी था कि कांग्रेस अब एक ‘नई क्षेत्रीय पार्टी’ है.

यह तय है कि कांग्रेस बिना गठबंधन के आगे नहीं बढ़ सकती. लेकिन यहां राहुल गांधी के लिए सबसे बड़ी चुनौती खुद अपनी पार्टी का अतीत है. अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने भाषण में कांग्रेस के पुराने और नए संभावित सहयोगियों को याद दिलाया था कि कांग्रेस कैसे अतीत में अपने गठबंधन सहयोगियों को दगा देती रही है.

नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस द्वारा संविधान के अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग का जिक्र करते हुए यह भी कहा था कि कैसे इस पार्टी ने अतीत में गैर-कांग्रेसी नेताओं का अपमान किया है. राहुल गांधी का नाम लिए बिना उन पर निशाना साधते हुए मोदी का यह भी कहना था कि कुछ लोग प्रधानमंत्री बनने की जल्दबाजी में हैं. यह मोदी की सीधे-सीधे विपक्षी खेमे को असहज करने की कोशिश थी क्योंकि यहां अभी नेतृत्व का मुद्दा काफी उलझा हुआ है.

संसद में अविश्वास प्रस्ताव पेश होने और कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के बीच कम से कम तीन क्षेत्रीय नेताओं ने देश को यह संकेत भी दिया है कि 2019 के चुनाव को अभी से मोदी बनाम राहुल मानना सही नहीं है. कोलकाता में ममता बनर्जी ने घोषणा की है कि वे जनवरी के दौरान ‘संघीय मोर्चे’ की एक बड़ी रैली करने जा रही हैं. दिल्ली में मायावती ने अपने पार्टी संयोजकों के साथ बैठक के बाद घोषणा की है कि वे भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए अन्य पार्टियों से गठबंधन के लिए तैयार हैं. उधर चंद्रबाबू नायडू ने भी कहा है कि उनकी पार्टी टीडीपी राष्ट्रीय राजनीति में अहम भूमिका निभाएगी. इन नेताओं की महत्वाकांक्षाएं और शर्तें वे मसले हैं जिन पर राहुल गांधी को आने वाले दिनों में बात करनी चाहिए, मोलभाव करना चाहिए. अगर इस कसरत में वे सफल होते हैं तभी संसद के भीतर उनके असरदार साबित होने को भी गंभीरता से लिया जाएगा. (स्रोत)