राष्ट्रीय राजनीति में ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की एक खास तरह की पहचान रही है. वे उस दौर में ज्यादा प्रासंगिक दिखने लगते हैं जब कोई गैर भाजपा और गैर कांग्रेसी सियासी गोलबंदी की बात करता है. हालांकि, यह कहा जा रहा है कि कोई भी विपक्षी गोलबंदी कांग्रेस के बगैर प्रभावी नहीं हो सकती. लेकिन फिर भी एक राष्ट्रीय मोर्चे की बात तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने उछाली थी और एक वर्ग में इसे लेकर अभी भी थोड़ी-बहुत सुगबुगाहट है.

अगर वाकई ऐसा कोई मोर्चा आकार लेता है या फिर 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद किसी गैर-कांग्रेसी या कांग्रेस के समर्थन से ही किसी के प्रधानमंत्री बनने की बात आती है तो नवीन पटनायक इसके मजबूत दावेदार बनकर उभर सकते हैं. राष्ट्रीय राजनीति में उनकी कुछ ऐसी पहचान है कि वे किसी दूसरे की राजनीतिक संभावनाओं को नुकसान पहुंचाने में विश्वास नहीं रखते हैं. ऐसी ही कुछ संभावनाओं और वजहों से ही पिछले साल की सूची में छठे स्थान पर रहने वाले नवीन पटनायक इस बार शीर्ष पांच मुख्यमंत्रियों में शामिल हो गये हैं.

कुछ लोगों का मानना है कि अगला विधानसभा चुनाव नवीन पटनायक के लिए अब तक का सबसे मुश्किल चुनाव साबित हो सकता है. मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जिस तरह की गोलबंदी ओडिशा में करने की कोशिश कर रहे हैं, उसकी वजह से भाजपा को वहां चमत्कार की उम्मीद बंध रही है. लेकिन अगर ओडिशा के लोगों से बात करें तो लगता है कि नवीन पटनायक को फिर से बतौर मुख्यमंत्री वापसी करने में कोई खास दिक्कत नहीं होने वाली.

विकास और गवर्नेंस के मोर्चे पर नवीन पटनायक का एक स्थिर और लंबा प्रदर्शन बना हुआ है. भाजपा ने भी धर्मेंद्र प्रधान के जरिये प्रदेश में कई परियोजनाएं शुरू करवाई हैं. इससे पटनायक सरकार में प्रतिस्पर्धा का भाव जगा है और राज्य सरकार की परियोजनाओं पर भी काम तेज हुआ है.

नीतिगत मामलों के कई जानकारों को लगता है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में जिस योजना की शुरुआत नवीन पटनायक की सरकार ने की है वह नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी आयुष्मान योजना से भी बढ़िया है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए आम लोगों तक अनाज पहुंचाने की पटनायक सरकार की योजना की भी काफी तारीफ की जाती है. यह इस मायने में भी अहम है कि ओडिशा की चर्चा कई बार भुखमरी के साथ भी की जाती है.

नवीन पटनायक की आम लोगों के बीच एक राष्ट्रव्यापी पहचान भले नहीं हो लेकिन राजनीतिक वर्ग में उनकी एक विशिष्ट पहचान जरूर है. यही उन्हें गठबंधन राजनीति में कई दूसरे गैर-भाजपाई-कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों से अधिक स्वीकार्य बना देती है. गठबंधन राजनीति में आम तौर पर ऐसे नेता को बहुत पसंद नहीं किया जाता जिसका राष्ट्रीय स्तर पर जनाधार हो. उनकी पार्टी बीजू जनता दल का भी ओडिशा के बाहर कोई प्रभाव नहीं है. लेकिन जनता दल से निकलकर बनने वाली इसकी पृष्ठभूमि इसे दूसरी राजनीतिक पार्टियों सहज सहयोगी भी बना देती है.

कुल मिलाकर स्थिति यह है कि अगर लोकसभा चुनावों में वे ठीक-ठाक सीटें लाने में कामयाब होते हैं, विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करते हैं और किसी वजह से भाजपा लोकसभा चुनाव हार जाती है तो नवीन पटनायक राजनीतिक तौर पर बेहद ताकतवर होकर उभर सकते हैं.


महामुख्यमंत्री-2018 : देश के सबसे ताकतवर और प्रभावी 10 मुख्यमंत्री

#1 कमजोर मुख्यमंत्रियों वाले इस दौर में ममता बनर्जी अपवाद हैं

#2 नीतीश कुमार अभी भले कमजोर हैं लेकिन भविष्य में क्या होगा, कहा नहीं जा सकता

#3 विकास और गवर्नेंस के पैमाने पर चंद्रबाबू नायडू अभी भी बाकी मुख्यमंत्रियों से मीलों आगे हैं

#4 उपचुनावों में हार के बाद योगी आदित्यनाथ कमजोर होने के बजाय मजबूत हो गये हैं

#5 नवीन पटनायक और उनकी पार्टी की प्रकृति गठबंधन राजनीति से पूरी तरह मेल खाती है

#6-10 इनमें से दो मुख्यमंत्रियों के नाम शीर्ष पांच में भी हो सकते थे

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