लोक सभा में बीते बुधवार को भगोड़ा आर्थिक अपराधी विधेयक पास हो गया है. इस विधेयक के तहत ऐसे आर्थिक अपराधियों के खिलाफ कई सख्त प्रावधान किए गए हैं जो मुकदमे से बचने के लिए देश छोड़कर भाग जाते हैं. इस विधेयक में भगोड़ों के तमाम नागरिक अधिकार निलंबित करने का प्रावधान है और अगर अपराधी ने एक निश्चित रकम से ज्यादा की धोखाधड़ी की है तो फिर उसकी संपत्ति जब्त करने का भी प्रावधान है. लेकिन अगर आरोपित मुकदमे की सुनवाई के लिए वापस लौट आता है तो फिर उसके खिलाफ शुरू की गईं ये कार्रवाइयां वापस ली जाएंगी.

यह विधेयक किस पृष्ठभूमि में लोक सभा में पास हुआ है उसे समझना मुश्किल नहीं है. बैकों को हजारों करोड़ रुपये का चूना लगाकर देश से भागने वाले विजय माल्या और नीरव मोदी बीते लंबे अरसे से देश में बहस का मुद्दा बने हुए हैं. साथ ही अब ये लोग देश की आपराधिक न्याय प्रक्रिया के लिए एक चुनौती भी बन चुके हैं.

इस बीच अब असली सवाल यही है कि विधेयक अपने घोषित मकसद को हासिल करने में किस हद तक सफल हो सकता है. इस विधेयक के दो मकसद हैं. पहला – भगोड़े आर्थिक अपराधियों को देश में वापस लाना. दूसरा – आर्थिक अपराध के खिलाफ लोगों में डर पैदा करना. जहां तक पहले मकसद की बात है तो यह विधेयक अपने आप में इसे हासिल करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सकता. क्योंकि जब तक दूसरे देश, जहां आरोपित रह रहा है, की सरकार या अदालतें उसके प्रत्यर्पण का फैसला नहीं करतीं उसे भारत वापस लाना बहुत मुश्किल है.

वहीं इस बात की संभावना भी बहुत कम है कि विदेश भागा अपराधी देश में मौजूद अपनी संपत्ति के जब्त होने की कोई खास फिक्र करेगा. इस बात को अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद और वित्तीय तंत्र के हवाले से आसानी से समझा जा सकता है. दरअसल बड़ी रकम के हेर-फेर में अकसर बैंक का कर्ज जानबूझकर नहीं चुकाया जाता. वहीं ज्यादातर ऐसा होता है कि यह कर्ज उसके मुकाबले काफी कम मूल्य की किसी संपत्ति पर उठाया जाता है.

आज कंपनियां और इनसे जुड़े अरबपति जटिल अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन-देन करते हैं और इस दौरान इस बात की पूरी संभावना होती है कि वे अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा दूसरे देश में स्थानांतरित कर दें, जहां भारत का न्यायिक क्षेत्र लागू नहीं होता. विदेशों में ऐसे भगोड़ों की अय्याशी भरी जीवन जीने की खबरें भी इस दलील की पुष्टि करती हैं.

इस बात में कोई दोराय नहीं है कि भारत में फंसे हुए ऋण के संकट को सुलझाने के लिए नीतिगत स्तर पर अपरंपरागत और नई तरह से सोच-विचार की जरूरत है. इसके तहत सबसे सही रणनीति यही होगी कि इन अपराधियों को सजा देने और बैंकों द्वारा अपने कर्जे की एक बड़े हिस्से की वसूली सुनिश्चित करने को लेकर एक संतुलन साधा जाए. आगे यह जरूरी होगा कि सरकार नए कानून के साथ इन दो मकसद को हासिल करने के लिए दूसरे तरीके भी इस्तेमाल करे. (स्रोत)