भारतीय एथलीट हिमा दास अंडर-20 विश्व एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 400 मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीतने के बाद चर्चा में है. लोग उनकी जाति भी जानना चाहते हैं. गूगल पर उनका नाम लिखने पर सबसे पहला सुझाव उनकी जाति के बारे में ही आता है. यह ख़बर कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर आलोचना का विषय बनी हुई है. ज़्यादातर लोगों का कहना है कि हिमा दास की जाति में रुचि दिखाने वालों ने बता दिया है कि भारत आज भी जातिवाद के फेर में फंसा हुआ है. मीडिया में भी इस ख़बर को आलोचनात्मक तरीक़े से पेश किया गया है. हालांकि यह बहस का विषय है कि हिमा या पीवी सिंधु जैसे कामयाब लोगों की जाति के बारे में जानना सच में निंदनीय है या नहीं.

भारतीय समाज जातियों में विभाजित है. हर समाज के व्यक्ति को उसका हिस्सा होने पर गर्व है. वह या उसके समाज का कोई और व्यक्ति ख्याति या बड़ी उपलब्धि हासिल करता है तो उसे इस बात का बड़ा गर्व होता है कि उसके समाज के आदमी ने अपने लोगों का नाम रोशन किया. सोशल मीडिया पर धर्म और संप्रदाय के लोग अपने-अपने प्रोफ़ाइल चला रहे हैं. लाखों लोग उन्हें फ़ॉलो करते हैं. सभी को लगता है कि उनके समाज के लोगों में सबसे ज़्यादा टैलेंट है. बहुत से लोग मानते हैं कि जब धर्म या जाति विशेष का होना गर्व की बात है तो इसमें क्या बुराई है कि लोग हिमा दास की जाति के बारे में भी जानना चाह रहे हैं.

लेकिन हिमा को लेकर कुछ जानकारियां भ्रामक तरीके़ से पेश की जा रही हैं. कहा जा रहा है कि दलित होने की वजह से हिमा दास को सरकार ने उचित इनाम व सम्मान नहीं दिया. यह भी दावा है कि अगर हिमा सवर्ण जाति की होतीं तो उन्हें काफ़ी ज़्यादा इनाम मिलते. सोशल मीडिया पर ऐसी कई पोस्ट शेयर हो रही हैं.

फ़ेसबुक पर वायरल इन दोनों संदेशों में लिखा है, ‘भारत का नाम पूरी दुनिया में रौशन करने वाली हिमा दास को भारत सरकार केवल 50,000 रुपये का इनाम देगी. कौन कहता है जातिवाद नहीं होता. इस देश में अगर हिमा की जगह कोई सवर्ण (जाति का) खिलाड़ी होता तो पांच करोड़ की राशि और रहने को घर मिलता.’ इसके अलावा पोस्ट के कैप्शन में पूछा गया है, ‘हिमा दास एक दलित हैं इसीलिए देश की ब्राह्मण सरकार कुछ नहीं दे रही. क्या हम सब भाइयों को मिलकर हिमा बहन की मदद नहीं करनी चाहिए?’

दूसरे पोस्ट की तस्वीर में हिमा दास पूर्व एथलीट पीटी उषा के साथ दिख रही हैं. इसे लेकर दावा किया गया है, ‘मूलनिवासी कोच है. मूलनिवासी ही धावक है. आप समझ जाइए सफलता इनकी ईमानदारी की वजह से मिली है. अन्यथा मनुवादी तो हर जगह चोर ठगी करते हैं.’

यह बात सही हो सकती है कि हिमा दास दलित हैं. हमने असम में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित आठ (बोको, मंगलडोई, जागीरोड, राहा, देरगांव, राताबाड़ी, ढोलाई, अभयापुरी साउथ) विधानसभा चुनाव क्षेत्रों के विधायकों के बारे में पता लगाया. इनमें से तीन विधायकों - नंदिता दास (कांग्रेस), गुरुज्योति दास (भाजपा) और दिंबेश्वर दास (भाजपा) - के सरनेम ‘दास’ हैं. हिमा का सरनेम भी दास है. संभव है वे दलित ही हों. लेकिन यह दावा सही नहीं लगता कि उनके दलित होने की वजह से सरकार ने उन्हें वह सम्मान नहीं दिया जिसकी वे हक़दार थीं. यह जानने के लिए एक बार उन इनामों पर नज़र डाल लेते हैं.

हिमा दास के स्वर्ण पदक जीतने के बाद असम की सरकार ने उन्हें 50 लाख रुपये की राशि देने का ऐलान किया. साथ ही उन्हें असम में खेलों का ब्रांड एंबेसेडर बनाए जाने का भी फ़ैसला किया गया. इसके अलावा कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री जी परमेश्वर ने हिमा दास के लिए दस लाख रुपये के इनाम का ऐलान किया है. असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने भी अपने एक ट्रस्ट से एक लाख रुपये देने की घोषणा की है. राज्य के पूर्व मंत्री गौतम रॉय ने एक लाख रूपये देने की बात कही है. असम एथलेटिक्स एसोसिएशन और असम ओलंपिक एसोसिएशन ने हिमा दास के लिए दो-दो लाख रुपये के इनाम की घोषणा की है. वहीं, फ़िनलैंड में रह रहे भारतीयों ने भी हिमा के लिए एक लाख रुपये इकट्ठा किए.

कई लोगों को ऐतराज़ है कि केंद्र सरकार की तरफ़ से हिमा को मात्र 50,000 रुपये के इनाम के अलावा कुछ नहीं दिया गया. लेकिन यह सही नहीं है. खेल मंत्रालय ने अपनी टारगेट ओलिंपिक पोडियम योजना में हिमा को शामिल किया है. केंद्र सरकार अब 2020 में होने वाले टोक्यो ओलिंपिक तक हिमा दास की तैयारी का पूरा ख़र्च उठाएगी. उन्हें अपनी जेब से कुछ नहीं देना होगा. इसके अलावा हिमा को आउट ऑफ़ पॉकेट (ओपीए) भत्ते के तहत हर महीने 50,000 रुपये दिए जाने का फ़ैसला किया गया है. यानी ‘मात्र 50,000 रुपये’ देने का दावा सही नहीं है. इस पर ज़रूर बहस हो सकती है कि हिमा ने जो ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की उसके बदले उन्हें दिए गए नकद इनाम कितने संतोषजनक हैं.

हालांकि इसे प्रतियोगिताओं की प्रतिष्ठा के तर्क से भी देखा जा सकता है. कई मानते हैं कि हिमा दास ने बेशक अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में जीत कर देश को गर्व करने का मौक़ा दिया है. लेकिन इस मामले में ओलंपिक से बढ़ कर कुछ नहीं है. करोड़ों रुपये के इनाम उन खिलाड़ियों को मिलते रहे हैं जिन्होंने दुनिया की इस सबसे बड़ी और प्रतिष्ठित खेल प्रतियोगिता में देश को पदक दिलाए हैं. यही वजह रही कि महिला पहलवान साक्षी मलिक और बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु को इनाम के रूप में करोड़ों रुपये मिले.

ओलंपिक कितनी बड़ी प्रतियोगिता है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारतीय जिमनास्ट दीपा कर्माकर को पदक नहीं जीत पाने की सूरत में भी उनके बेहतरीन प्रदर्शन के लिए नकद इनाम दिया गया था. एक वर्ग के मुताबिक अगर हिमा दास ओलिंपिक में पदक जीतती हैं और फिर भी उन्हें उचित पुरस्कारों से सम्मानित नहीं किया जाता तो तब दलितों के साथ भेदभाव का तर्क दिया जा सकता है. फ़िलहाल उनकी मौजूदा उपलब्धि पर दिए गए सम्मानों को ‘कुछ नहीं’ घोषित करना शायद अनुचित होगा.

इसके अलावा पीटी उषा को हिमा की कोच बताना भी सही नहीं है. हिमा दास की तरह पीटी उषा ने भी भारत का नाम रौशन किया है. लेकिन वे कभी भी उनकी कोच नहीं रही हैं. फ़िनलैंड में आयोजित चैंपियनशिप के दौरान वे भारत के कोचिंग स्टाफ़ के सदस्य के रूप में ज़रूर गई थीं. वे हिमा को गाइड भी करती रही हैं, लेकिन उन्हें तैयार करने का श्रेय उनके कोच निपोन दास को जाता है. सोशल मीडिया पर पीटी उषा और हिमा दास की वायरल तस्वीर उस समय की है जब जून में देश में राष्ट्रीय अंतर-राज्य वरिष्ठ एथलेटिक्स चैम्पियनशिप का आयोजन होने वाला था. पीटी उषा उसमें धावक टिंटू लूका की कोच थीं.