अफ्रीका महाद्वीप के ज्यादातर देशों ने उपनिवेशवाद से स्वतंत्रता तक का सफर तय किया है. यही वजह है कि इनके लिए भारतीय लोकतंत्र एक ऐसी शासन प्रणाली रही, जिसे आदर्श मानकर वे अपने यहां भी ऐसी ही एक शासन व्यवस्था विकसित कर सकते थे. घाना के स्वतंत्रता सेनानी और पहले प्रधानमंत्री क्वामे क्रूमाह, कांगो के पहले प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुंबा और मिस्र के गमाल अब्देल नासेर के जवाहरलाल नेहरू के साथ काफी घनिष्ठ संबंध थे. वहीं भारत के पहले प्रधानमंत्री नेहरू मानते थे कि इस महाद्वीप के साथ मजबूत आर्थिक-रणनीतिक संबंध भारत के लिए बहुत फायदेमंद हैं.

फिलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस महाद्वीप के तीन देशों की यात्रा पर हैं और इस दौरान वे आज दक्षिण अफ्रीका के जोहानेसबर्ग में ब्रिक्स बैठक में भाग लेने वाले हैं. नेहरू से लेकर मोदी तक का यह दौर अफ्रीका को लेकर भारतीय नजरिए में आए बदलाव का साक्षी है. वह बदलाव जहां भारत इस महाद्वीप के देशों की कमोबेश उपेक्षा करता रहा और उसने कई मौके गंवा दिए.

हालांकि ऐसा नहीं है कि अफ्रीकी देशों के साथ भारत के संबंध खराब हैं. लेकिन इनके साथ जो ऐतिहासिक संबंध थे, भारत उनका फायदा उठाने से चूक गया. अफ्रीकी देशों के साथ संबंधों को लगातार मजबूत करने की दिशा में भारत ज्यादा सक्रिय नहीं रहा और इस बीच यहां निवेश और व्यापार बढ़ाने के बड़े मौके चीन ने भुना लिए. भारत अफ्रीका का सबसे पुराना कारोबारी साझीदार है, इसके बावजूद आज उसे चीन से बराबरी करने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ रही है.

चीन ने जबर्दस्त सक्रियता दिखाते हुए इस महाद्वीप के नेताओं को अपने पाले में किया है और 2015 के मुताबिक अफ्रीकी देशों में उसका निवेश करीब 3500 अरब डॉलर तक पहुंच गया है. वहीं एक अनुमान के मुताबिक 2020 तक यहां भारतीय निवेश 500 अरब डॉलर की सीमा छू पाएगा. ये आंकड़े बताते हैं कि भारत और भारतीय कंपनियों को अफ्रीका को लेकर अपनी हिचक छोड़नी चाहिए और यहां के निवेश के अवसरों का फायदा उठाना चाहिए.

इस बीच नई दिल्ली ने यह एक अच्छा काम किया है कि 2015 से 2020 तक के लिए उसने अफ्रीकी देशों को दस अरब डॉलर का कर्जा देने की घोषणा की है. इसके साथ ही इन देशों में भारतीय निवेश से जुड़ी एक अच्छी बात यह है कि भारत का ध्यान स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने पर है. वहीं चीनी कंपनियां मजदूर भी अपने देश से ही लाती हैं और इसके चलते कुछ अफ्रीकी देशों की स्थानीय आबादी में असंतोष देखा गया है. पिछले चार सालों को देखें तो लगता है कि भारत अफ्रीका से जुड़ी नीति को लेकर अतीत में हुई गलतियों को ठीक कर रहा है.

भारत जिस नीति पर आगे चल रहा है, वही उसकी ताकत है लेकिन अब उसे शिक्षा, बुनियादी ढांचा विकास और सूचना तकनीकी (आईटी) के क्षेत्र में भी अफ्रीकी देशों से संबंध मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना चाहिए.

चीन के निवेश मॉडल की अकसर इस वजह से आलोचना की जाती है कि जिस भी देश में चीनी कंपनियां परियोजनाएं लगाती हैं, वे भारी कर्ज के बोझ तले तब जाते हैं. अफ्रीका में नैरोबी-मोंबासा रेल लाइन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. करीब चार अरब डॉलर की इस परियोजना के चलते इस समय कीनिया एक बड़े वित्तीय दबाव का सामना कर रहा है. इसके अलावा चीन ने पिछले दिनों जिबूती में अपना एक सैन्य अड्डा बनाया है. इससे भी अफ्रीकी देशों में यह आशंका फैली है कि चीन इस क्षेत्र में दखल न देने की नीति से हट रहा है.

इस बीच मोदी ने रवांडा में भारतीय दूतावास खोलने की घोषणा की है और इसका स्वागत किया जाना चाहिए. रवांडा अफ्रीका के लिए एक ऐसा उदाहरण है जो बताता है कि कैसे बरसों तक आंतरिक संघर्ष में फंसे रहने के बाद भी एक देश आर्थिक रूप से मजबूत बनकर उभर सकता है.

इस समय कई अफ्रीकी देश पूरी तरह से चीन पर निर्भर होने को लेकर आशंकित हैं और जाहिर है कि भारत के लिए यह फायदेमंद स्थिति है. (स्रोत)