20 जुलाई को विपक्ष द्वारा लाये गए अविश्वास प्रस्ताव पर हुई बहस के बाद विश्लेषणों का दौर शुरू हो गया है. उस बहस में राहुल गांधी ने अपने भाषण से मीडिया और विश्लेषकों का ध्यान अपनी और खींचने की कोशिश की. दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जवाबी हमलों से अपनी स्थिति को पहले जैसा मजबूत दिखाने की कोशिश की. चुनावी पंडितों ने उस दिन की बहस के आधार पर 2019 के लोकसभा चुनाव का आकलन करना शुरू कर दिया है.

अब सवाल यह किया जा रहा है कि अविश्वास प्रस्ताव वाले दिन जिस उत्साह से राहुल गांधी ने अपने भाषण के जरिये लोगों का ध्यान आकर्षित किया क्या उसी प्रकार से वे और उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी 2019 के चुनाव में भी कुछ जलवा दिखा सकती है, और वह भी नरेंद्र मोदी के मजबूत नेतृत्व वाली बीजेपी के खिलाफ?

पुराने आंकड़ों के आधार पर देखें तो यह काम मुश्किल लग रहा है. 2014 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को पिछले चुनाव के मुकाबले नौ प्रतिशत कम वोट मिले थे. उस चुनाव में कांग्रेस की करारी हार हुई थी. लेकिन उसके वोटों में इतनी बड़ी गिरावट कोई पहली बार नहीं हुई थी. 1952 से अभी तक चार बार लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी के मतों में 8-9 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है. सिर्फ एक बार 1980 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अपने उस खोये हुए वोट को लगभग उसी अनुपात में दोबारा हासिल कर लिया था. लेकिन वह दौर कांग्रेस के वर्चस्व का था जिसे पहली बार 1977 के चुनाव में सत्ता से बाहर होने के बावजूद 35 प्रतिशत वोट मिले थे. उस समय उसके पास इंदिरा गांधी जैसी एक मजबूत नेता भी थीं. लेकिन 1989 के बाद से कांग्रेस की स्थिति कभी पहले जैसी नहीं रही और उसके वोटों में लगातार कमी होती रही है. सिवाय 1999 और 2009 के जब पिछली बार की तुलना में उसके वोटों में 2.5 और 2.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई थी.

स्रोत: भारतीय चुनाव आयोग
स्रोत: भारतीय चुनाव आयोग

एक रोचक बात यह भी है कि कांग्रेस पार्टी के वोटों में औसत बदलाव करीब तीन प्रतिशत का रहा है. और सिर्फ दो लोक सभा चुनावों – 1980 और 1984 – को छोड़ दिया जाए तो यह हमेशा तीन फीसदी से कम ही बढ़ा है. अगर हम इसे एक छोटा पैमाना मानकर इसे कांग्रेस के पिछले चुनाव के मत प्रतिशत में जोड़ दें तब भी दोतरफ़ा मुकाबले में बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस की दावेदारी मजबूत नहीं दिख रही है.

तो क्या यह मान लिया जाये कि 2019 के चुनाव में बीजेपी के लिए आगे का रास्ता साफ है? लोकसभा चुनाव में अभी आठ महीने शेष है और राजनीति में यह एक लंबा समय होता है. 1960 के दशक में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हेरल्ड विल्सन ने कहा था – ‘राजनीति में एक सप्ताह का समय भी लंबा होता है.’ पिछले तीन वर्षों में हुए विभिन्न विधानसभा चुनाव में फील्ड वर्क के दौरान इस रिसर्चर को भी ठीक से यह जानने का मौका मिला कि चुनाव में आखिरी के महीने काफी अहम होते है. उस वक्त चुनाव प्रचार अपने चरम पर होता है और मतदाता चुनावी संदेशों से चार्ज रहते है. यही वह समय होता है जब किसी चुनाव की दिशा और दशा तय होती है.

उदाहरण के लिए 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक एक महीना पहले तक भाजपा (एनडीए) की स्थिति मजबूत मानी गयी थी. लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान उसकी गाड़ी प्लेटफार्म से उतर गयी और चुनाव परिणाम भाजपा के खिलाफ गया. ठीक इसी प्रकार पिछले साल हुए उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले तक भाजपा की इतनी बड़ी जीत का किसी को कोई अनुमान नहीं था.

इसके अलावा लोकसभा चुनाव से पहले चार राज्यों के विधानसभा चुनाव भी होने है. चुनावी वर्ष होने की वजह से कई मुद्दों पर राजनीतिक उथल-पुथल भी हो रही है. इसके कई उदाहरण भी देखे जा सकते है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी का एक साथ आना, तेलुगू देशम का एनडीए से बाहर जाना, शिवसेना की भाजपा से बढ़ती दूरी और जनता दल (यूनाइटेड) और भाजपा के बीच सीटों के तालमेल पर पेंच फंस जाना.

चुनावी लोकतंत्र में पार्टियों की एक महत्वपूर्ण भूमिका होती है. और पार्टियों के विचार और वादों के आधार पर चुनाव लड़े जाते है. पिछले कुछ समय से भारतीय चुनावी राजनीति में चर्चा का केंद्र पार्टी के बजाय व्यक्ति होने लगे हैं. अविश्वास प्रस्ताव के बाद भी मुद्दों पर चर्चा होने के बजाय सारा फोकस इस सवाल पर चला गया कि क्या राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी को चुनौती दे पाएंगे? यह लोकतंत्र के लिए बहुत ज्यादा सही नहीं है.

नरेंद्र मोदी आज के दौर के सबसे लोकप्रिय नेता है. इससे पहले भी इस देश में कुछ लोकप्रिय नेता हुए हैं जो जनता से खुद को आसानी से जोड़ लेते थे. लेकिन ऐसा कम ही देखने को मिला है कि एक ही समय में दो प्रतिद्वंद्वी पार्टियों से ऐसे दो लोकप्रिय नेता हुए हों जिनका जनाधार एक समान रूप से सारे देश में हो. और ये कभी देखने को नहीं मिला है कि किसी दोतरफा चुनाव में सत्ताधारी लोकप्रिय नेता को विपक्षी पार्टी के लोकप्रिय नेता ने हरा दिया हो.

इसलिए 2019 के चुनाव में अगर सिर्फ राहुल गांधी के भरोसे नरेंद्र मोदी को हराने के बारे में सोचा जाता है तो यह एक मुश्किल लक्ष्य है. लेकिन अगर राहुल गांधी कई अहम क्षेत्रीय पार्टियों के साथ एक मजबूत गठबंधन करने में सफल होते हैं तो 2019 के दंगल का परिदृश्य बदल सकता है. 1977 और 1989 के चुनाव इसका उदाहरण हैं