इतिहास बताता है कि अलवर के राजा हसन खां मेवाती ने 1527 में हुए खानवा के युद्ध में मेवाड़ के राणा सांगा के कंधे से कंधा मिलाकर बाबर के खिलाफ लड़ते हुए शहादत दी थी. राजस्थान के इसी इलाके में मेव जाति के संत लालदास ने लालदासी संप्रदाय की भी स्थापना की थी. हिंदू-मुस्लिम एकता इसके मूल सिद्धांतों में शामिल थी.

लेकिन वही अलवर अब बिल्कुल उलट कारणों से सुर्खियों में है. पिछले दिनों यहां से गोतस्करी के संदेह में रकबार खान नाम के एक शख्स के साथ मारपीट और फिर उसकी मौत की खबर आई. पिछले साल अप्रैल में यहां एक डेयरी किसान पहलू खान को भीड़ ने गोतस्कर समझ कर पीट-पीट कर मार डाला था. घटना का वीडियो सामने आने के बाद देश भर में गुस्सा देखने को मिला था. इसके बाद नवंबर 2017 में अलवर में ही उमर मोहम्मद नाम के व्यक्ति का शव एक रेलवे ट्रैक पर मिला था. उमर के परिवारवालों का आरोप था कि यह हत्या गोरक्षकों ने की है.

सवाल उठता है कि कुछ समय पहले तक गंगा-जमुनी विरासत को सहेजने वाले अलवर में क्या बदल गया है? यह समझने के लिए हमें अलवर के जातिगत-राजनैतिक समीकरण समझने होंगे. अलवर मुस्लिम-मेव समुदाय की खासी आबादी वाला इलाका है. यहां की आठ विधानसभाओं के कुल 18.27 लाख मतदाताओं में से करीब 3.35 लाख वोटर मेव हैं. मेवों के अलावा यहां 4.5 लाख दलित, 3.6 लाख यादव, 1.4 लाख जाट, 1.15 लाख ब्राह्मण और एक लाख के करीब वैश्य वोटर हैं. इनके बाद अलवर में अनुसूचित जनजाति समुदाय से ताल्लुक रखने वाले मतदाता भी खासी संख्या में हैं.

जानकार बताते हैं कि मेव के साथ अनुसूचित जाति और जनजाति के वोटर का स्वभाविक झुकाव कांग्रेस की तरफ होने से यहां पार्टी का पलड़ा तुलनात्मक तौर पर खासा भारी हो जाता है. इसकी बानगी के तौर पर अलवर लोकसभा सीट पर हुए अब तक के 17 चुनावों को देखा जा सकता है. इनमें 11 बार कांग्रेस बाजी मारने में सफल रही है. इसी साल हुए उपचुनाव को मिलाकर पिछले सात लोकसभा चुनावों की बात करें तो इनमें से पांच बार कांग्रेस ने जीत हासिल की जबकि भाजपा ने सिर्फ दो बार. इनमें से भी एक बार (2014-15 में) मोदी लहर हावी थी.

अलवर की राजनीति को समझने वाले बताते हैं कि इसी समीकरण को संतुलित करने के लिए ही जिले की राजनीति में हिंदुत्व के तड़के लगाए जाते रहते हैं ताकि अनुसूचित जाति और जनजाति के वोटर को भाजपा के पाले में खींचा जा सके. इसकी पुष्टि के तौर पर वे स्थानीय भाजपा नेताओं और विधायकों के समय-समय पर आने वाले तमाम विवादित बयानों को गिनाते हैं. फिर चाहे वे ज्ञानदेव आहूजा हों या बनवारी लाल सिंघल या फिर जसवंत यादव. अपने भड़काऊ बयानों के जरिए ये नेता जिले और अपने क्षेत्र में हिंदुत्व को भुनाने की कोशिशों में लगे रहते हैं.

रकबर खान के मामले की बात करें तो भीड़ के हमले को जायज ठहराते हुए रामगढ़ से विधायक ज्ञानदेव आहूजा का कहना है कि गोरक्षकों को बेवजह परेशान किया जा रहा है. उनके मुताबिक यदि गोमाता पर हमला होगा तो लोगों को गुस्सा आना तय है. इससे पहले आहूजा द्वारा हमलावर गोरक्षकों को अपने आदमी बताने की भी ख़बरें खूब सामने आई थीं. हालांकि बाद में उन्होंने इस बात से इन्कार कर दिया था. कुछ खबरों के मुताबिक मौके पर मौजूद रकबर के साथी असलम का आरोप है कि हमलावर बोल रहे थे, ‘विधायक हमारे साथ हैं. कोई हमारा कुछ नहीं कर सकता. इसे आग लगा दो.’ इससे पहले पहलू खान वाले मामले में ज्ञानदेव आहूजा ने कहा था कि जो गो तस्करी करेगा वह ऐसे ही मरेगा. ज्ञानदेव आहूजा ‘प्रतिदिन जेएनयू में तीन हजार कंडोम मिलते हैं और कश्मीर समस्या पूर्व प्रधानमंत्री नेहरू और उनके सौतेले भाई अब्दुला की देन है’ जैसे बयान देकर भी सुर्ख़ियों बटोर चुके हैं.

वहीं इस मामले में राजस्थान सरकार के श्रम मंत्री जसवंत यादव का कहना है कि जब तक मेव हिंदुओं की भावनाओं को नहीं समझेंगे ऐसी घटनाएं होती रहेंगी. इस साल हुए अलवर लोकसभा उपचुनाव में भाजपा की तरफ से यादव ही मैदान में उतरे थे. उस दौरान भी उनका एक विवादित वीडियो वायरल हुआ था. एक चुनावी रैली को संबोंधित करते हुए यादव ने कहा था, ‘जो हिंदू होंगे वे मुझे वोट देंगे, और जो मुसलमान होंगे वे कांग्रेस को वोट देंगे.’

इसी तर्ज पर अलवर से विधायक बनवारी लाल सिंघल ने इस साल की शुरुआत ही विवादित बयानबाजी से की थी. तब सिंघल ने कहा था, ‘भारत के मुसलमान, हिंदुओं को किनारे कर देश पर राज करने के लिए ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं.’ इसके दो महीने बाद ही सिंघल ने एक और बयान देकर न सिर्फ अलवर बल्कि राजस्थान के सियासी पारे को चढ़ा दिया था. सिंघल ने कहा था, ‘मेरे घर में किसी हाल में मुसलमान को प्रवेश करने की इजाजत नहीं है.’

ये बयान तो वे हैं जो इन नेताओं ने मीडिया के सामने सरेआम कहे हैं. इनसे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अंदर ही अंदर इलाके की राजनीति में सांप्रदायिकता को किस हद तक प्रभावी बनाया जा रहा है.

अलवर के हिंदुत्व की प्रयोगशाला बनने के तार यहां फैले अपराध से भी जुड़ते हैं. हरियाणा से सटे और उत्तर प्रदेश के करीब होने की वजह से अलवर में अन्य सीमावर्ती जिलों की तरह कई तरह के अपराधों की दर ज्यादा है. बहुतायत होने की वजह से आपराधिक मामलों में मेव समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लोगों के नाम आनुपातिक तौर पर ज्यादा उजागर होते हैं. विश्लेषक मानते हैं कि इसके चलते यहां के नेताओं को यह बात स्थापित करने में खासी मदद मिलती है कि यदि मुस्लिमों को काबू में नहीं रखा गया तो वे भविष्य में हिंदुओं के लिए बड़ी समस्या खड़ी कर सकते हैं.

सूत्रों की मानें तो अलवर में मेवों के मामले में पुलिस-प्रशासन को भी आंखें मूंदे रखने का इशारा मिला होता है ताकि मेव ज्यादा से ज्यादा से अपराधों में लिप्त हों और इस बात का फायदा हिंदू ध्रुवीकरण के लिए उठाया जा सके. उनके मुताबिक इस तरह का माहौल बरकरार रखने के लिए अलवर जिले के नेता अपने समर्थकों और गुर्गों का सहारा लेते हैं. इस बारे में मेव पंचायत के सरदार शेर मोहम्मद कहते हैं, ‘यह सही है कि कुछ मेव आपराधिक मामलों में लिप्त हैं, लेकिन इसके लिए पूरे समाज को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं.’

किसी क्षेत्र की राजनीति को सांप्रदायिक रंग देने में वहां होने वाले अपराध कितनी अहम भूमिका निभाते हैं यह समझने के लिए गुजरात का उदाहरण देखा जा सकता है. प्रदेश के एक राजनीतिकार कहते हैं, ‘अगर अब्दुल लतीफ़ न होता तो शायद गुजरात में भाजपा और हिंदूवादी संगठन इतनी गहराई तक पैर नहीं जमा पाते.’ दरअसल 80 और 90 के दशक में वहां शराब तस्कर अब्दुल लतीफ़ का मुस्लिम समुदाय में खासा बोलबाला था. यह वही लतीफ था जिस पर कुछ साल पहले शाहरुख खान अभिनीत ‘रईस’ फिल्म बनी थी.

गुजरात के एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं, ‘तब प्रदेश की सत्ता में आने का रास्ता तलाश रही भाजपा के नेताओं ने हिंदू समुदाय से जुड़े लोगों में यह बात गहराई तक बिठा दी कि यदि लतीफ को काबू नहीं किया गया तो प्रदेश के मुसलमान हिंदुओं का जीना मुहाल कर देंगे. इस आग में 1987 में हुए अहमदाबाद महानगर पालिका कॉर्पोरेशन चुनावों ने घी का काम किया. जब लतीफ ने शहर के पांच इलाकों से नामांकन भरा और पांचों से जीत गया. उस समय गुजरात भाजपा के प्रमुख नेता शंकर सिंह वाघेला के उस बयान की गूंज आज भी प्रदेश के राजनैतिक गलियारों में सुनी जा सकती है जिसमें उन्होंने कहा था कि- मुसलमान एक अपराधी को भी पांच-पांच जगह से जितवा रहे हैं, लेकिन आप (हिंदू) अपने प्रत्याशियों को एक जगह से भी नहीं जितवा सकते.’

हालांकि अब्दुल लतीफ़ को पुलिस ने 1997 में एनकाउंटर में मार गिराया था. लेकिन गुजरात में भाजपा कहां से कहां पहुंच गई, यह किसी से नहीं छिपा है.