चर्चित संस्था वर्ल्ड प्रेस फ़ोटो फाउंडेशन भारत की गरीबी को दिखाने वाली एक फोटो सीरीज पर विवादों में घिर गई है. वर्ल्ड प्रेस फोटो के इंस्टाग्राम अकॉउंट से बीते रविवार को एक फोटो सीरीज साझा की गई थी. ये तस्वीरें इटली के मशहूर फोटोग्राफर असेलियो मामो ने खींचीं थीं. मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के गांवों में खींचीं गईं इन तस्वीरों में चेहरे हाथों से ढककर खड़े बच्चे और अन्य लोग थे और उनके सामने खाने से सजी मेज थी. इस प्रोजेक्ट को ड्रीमिंग फ़ूड नाम दिया गया था. तस्वीरों के कैप्शन में मामो ने लिखा था, ‘मैं फेक फूड और मेज लाया और लोगों से उस खाने के बारे में सोचने के लिए कहा जो वे अपनी मेज पर चाहते हैं.’

इस प्रोजेक्ट का मकसद भारत में गरीबी दिखाने का था. लेकिन सोशल मीडिया पर इसकी दुनियाभर में आलोचना शुरू हो गई. मामो के फोटो लेने के तरीके को क्रूर, अनैतिक और भारत के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त बताया गया. चूंकि तस्वीरें वर्ल्ड प्रेस फोटो के अकॉउंट से शेयर की गई थीं, इसलिए संस्था भी आलोचना के घेरे में आ गई. महज गरीबी दिखाने के लिए इस तरह फोटो प्रायोजित करने को फोटो पत्रकारिता के मूूलभूत नियमों के विरुद्ध बताया गया.

पश्चिम के फोटोग्राफर इससे पहले भी भारत में गरीबी और दरिद्रता दिखाने के लिए फर्जी फोटो खींचते रहे हैं और इसकी आलोचना भी होती रही है. फेक फोटोग्राफी की दुनिया भर में आलोचना के बाद इसमें कमी आई थी, लेकिन मामो की तस्वीरों ने इस मुद्दे को फिर गर्म कर दिया है. इन तस्वीरों को लेकर दुनिया के कई देशों के पत्रकारों ने तीखी प्रतिक्रिया दर्ज कराई. चर्चित अमेरिकी पत्रकार लॉरेन वूल्फ ने ट्विटर पर लिखा, ‘बच्चों के सामने नकली खाना रखना और उसके बारे में सोचने को कहना. यह किस तरह की अनैतिक पत्रकारिता है. और वर्ल्ड प्रेस फोटो इसे क्यों समर्थन दे रहा है.’

एक और पत्रकार शैनन सिम्स का कहना था, ‘वर्ल्ड प्रेस फोटो दुनिया के सबसे चर्चित फोटो संस्थानों में से एक है लेकिन यह समझना चाहिए कि आर्थिक रूप से वंचित लोग मजमे की चीज नहीं होते.’ कई लोगों ने इस पावर्टी पोर्न भी करार दिया.

फोटो पत्रकार सुनील कुमार कहते हैं, ‘दरअसल भारत में फेक फोटो और फ़ोटो के गलत इस्तेमाल के प्रति जागरूकता नहीं है. पश्चिमी देशों के बहुत सारे फोटोग्राफर यह धारणा बनाकर निकलते हैं कि भारत एक पिछड़ा और गरीब देश है. लेकिन एेसी तस्वीर न मिलने पर वह इस तरह की फोटो बना लेते हैं. भारत में गरीब हैं, लेकिन उनकी सच्ची तस्वीर पेश करनी चाहिए न कि इस तरह के हथकंडे अपनाने चाहिए.’

आलोचनाओं के बाद मामो ने ट्विटर पर एक लंबा बयान शेयर कर माफी मांगी. उन्होंने लिखा, ‘मेरा मकसद केवल पश्चिमी देशों में खाने की बर्बादी की समस्या को दिखाना था. लेकिन शायद मेरा तरीका गलत रहा. मैं भी मनुष्य हूं और मुझसे भी गलती हो सकती है. इसके लिए मैं माफी मांगता हूं.’

उधर, वर्ल्ड फ़ोटो प्रेस ने पूरे विवाद पर अपना पक्ष रखते हुए कहा, ‘वर्ल्ड फ़ोटो प्रेस अपनी प्रतियोगिताओं के विजेताओं को इंस्ट्राग्राम पर अपना काम साझा करने की इजाजत देता है. इसके लिए बाकायदा दिशा-निर्देश हैं. उन तस्वीरों पर कोई विवाद खड़ा होने पर वह फोटोग्राफर ही लोगों के सवालों के जवाब देता है.’

लेकिन बहुत से लोग मानते हैं कि इस जवाब को संतोषजनक नहीं कहा जा सकता. उनके मुताबिक पश्चिम के फोटोग्राफर अपने देश में फोटोग्राफी के तमाम नैतिक मानदंडों का बखूबी पालन करते हैं, लेकिन एशिया और अफ्रीका में तस्वीरें खींचते हुए वे उन्हीं मानदंडों को ताक पर रख देते हैं. इसलिए सोशल मीडिया पर कइयों का यह भी कहना था कि ये तस्वीरें भारत की नहीं बल्कि पश्चिम के फोटोग्राफरों की मानसिक दरिद्रता दिखाती हैं.