पाकिस्तान के आम चुनाव में इमरान खान की पाकिस्तान-तहरीके-इंसाफ (पीटीआई) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. देखा जाए तो ये नतीजे काफी हद तक अपेक्षित भी थे. लेकिन, पिछले दिनों चुनावी परिस्थितियां तब बदलती नजर आई थीं, जब पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को सजा होने के बाद उन्होंने पाकिस्तान लौट कर जेल जाने का निर्णय लिया. इसके बाद से चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में भी इमरान और नवाज शरीफ की पार्टियों के बीच कांटे का मुकाबला बताया जाने लगा था. लेकिन, ऐसा नहीं हुआ और नवाज शरीफ की पार्टी सत्ता में वापसी करने में विफल रही.

पाकिस्तान के इस चुनाव पर पूरी दुनिया और खासकर भारत की भी निगाहें लगी हुई थीं. भले ही भारत-पाकिस्तान के बीच विवादों के मुद्दे काफी पुराने हों और इनका सुलझना इतना आसान नहीं लगता हो. लेकिन, फिर भी दोनों देशों के नेतृत्व की विचारधारा इनके आपसी चर्चा के तौर तरीकों को हर तरह से प्रभावित करती है. इसीलिए, इमरान खान के सत्ता में आने के बाद यह सवाल उठता है कि वे भारत के लिए कैसे साबित होंगे.

भारत और पाकिस्तान सहित दुनियाभर के जानकारों का मानना है कि इमरान खान के प्रधानमंत्री बनने के बाद दोनों देशों के बीच बेहतर संबंध बनना और मुश्किल हो सकता है. पिछले कुछ महीनों में चुनाव के दौरान पाकिस्तान में जिस तरह से चीजें घटी हैं उनसे यह बात काफी हद तक सही भी दिखती है.

चुनाव प्रचार में भारत को लेकर इमरान के बयान

पाकिस्तान में चुनाव प्रचार के दौरान जिस पार्टी ने भारत विरोधी भावनाओं को सबसे ज्यादा भुनाने की कोशिश की, वह इमरान की पीटीआई ही थी. इमरान खान ने अपनी लगभग हर रैली में भारत के खिलाफ बयानबाजी की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते हुए इमरान ने उन्हें दोनों देशों के बीच बेहतर रिश्तों में सबसे बड़ी अड़चन बताया था.

इसके बाद एक साक्षत्कार में इमरान ने कहा, ‘भारत का सिर्फ एक ही मकसद है कि पाकिस्तान की फौज को किसी तरह कमजोर करना. नवाज शरीफ इसमें उसके साथ हैं. इसीलिए नरेंद्र मोदी कहते हैं कि नवाज अच्छे हैं लेकिन, सेना ठीक नहीं है.’ इस साक्षात्कार में इमरान का यह कहना था कि अब मोदी सरकार बहुत बेचैन है क्योंकि उन्हें पता है कि अब एक ऐसा आदमी आ रहा है जो केवल पाकिस्तान की भलाई चाहता है.

बीते हफ्ते कराची की एक रैली में इमरान ने भारत पर उनसे डरकर उनके खिलाफ झूठा प्रचार करने का आरोप भी लगाया. कश्मीर के मुद्दे पर भी इमरान का साफ़ कहना है कि भारत कश्मीर के स्वतंत्रता संग्राम को आतंकवाद बताकर कश्मीरियों का दमन कर रहा है. उनके मुताबिक वे दुनिया के सामने भारत के इस झूठ को बेनकाब करेंगे. चुनाव प्रचार के दौरान इमरान खान ने भारत की अफगानिस्तान में उपस्थिति को भी अमेरिका का षड़यंत्र बताया था.

इमरान खान के इन बयानों से काफी हद तक साफ़ हो जाता है कि भारत से जुड़े मुख्य मुद्दों पर उनका रुख क्या है. हालांकि, कुछ बातें ऐसे भी हैं जिनसे भारत को लेकर उनके सकारात्मक रुख के भी संकेत मिलते हैं. इमरान ने चुनावी घोषणा पत्र में भारत के साथ शांति सुनिश्चित करने के लिए नीतियां बनाने की बात कही है. लेकिन, साथ ही इसमें यह भी लिखा है कि कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के तहत ही सुलझाया जाएगा. इसके अलावा चुनाव जीतने के बाद दिए गए संदेश में भी उन्होंने भारत से बेहतर संबंध बनाने की हिमायत की है.

कट्टरपंथियों को लेकर नरम रुख

भारत के साथ पाकिस्तान के बिगड़े संबंधों की एक बड़ी वजह सीमा पार चल रहे आतंकी संगठनों को माना जाता है. लेकिन, इमरान खान का इन संगठनों को लेकर जिस तरह का रुख है वह भारत की चिंता को और बढ़ाने वाला है. इमरान ने इस चुनाव में कट्टरपंथियों का समर्थन पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. उन्होंने खुद 50 से ज्यादा इमामों और मौलानाओं से निजी मुलाकात की.

पीटीआई के मुखिया ने कट्टरपंथियों का समर्थन पाने के लिए बहुत कुछ ऐसा भी किया जिसकी उनसे उम्मीद नहीं की जा सकती थी. खैबर पख्तूनख्वा में इमरान की सरकार ने मौलाना समी-उल-हक के मदरसे को तीन लाख डॉलर की बड़ी मदद दी. इसके बदले में मौलाना ने पीटीआई के साथ गठबंधन की घोषणा की. पाकिस्तान में मौलाना समी-उल-हक का ये मदरसा तालिबानी लड़ाकों को ट्रेनिंग देने के लिए भी चर्चित है.

पिछले दिनों कई आतंकवादी भी पीटीआई का प्रचार करते नजर आए. वैश्विक आतंकवादियों की अमेरिकी सूची में शामिल और कंधार विमान अपहरण के आरोपित फजलुर रहमान खलील ने भी इमरान के समर्थन में वोट मांगे. इसके अलावा पीटीआई के चुनावी घोषणा पत्र में कहा गया है कि पाकिस्तान को इस्‍लामिक वेलफेयर स्‍टेट बनाया जाएगा, जिहादियों से वार्ता शुरू की जायेगी और इमरान सरकार कट्टरपंथियों को मुख्य धारा में लाएगी.

सेना का इमरान को समर्थन

पाकिस्तान में नवाज शरीफ की पार्टी ‘पीएमएल-एन’ और बेनजीर भुट्टो की ‘पाकिस्तान पीपल्स पार्टी’ दोनों को ही भारत से बेहतर रिश्तों का पक्षधर माना जाता रहा है. अपने इसी रुख के चलते इन दोनों को कई बार सेना की नाराजगी का सामना करना पड़ा और सत्ता से हाथ धोना पड़ा. जानकारों के मुताबिक नवाज शरीफ की पिछली सरकार के सेना विपरीत चलने की वजह से ही सेना उन्हें किसी तरह सत्ता में आने से रोकना चाहती थी और इसीलिए उसने इस बार इमरान का साथ दिया.

पाकिस्तानी सेना ने पहले इमरान की राह आसान करने के लिए अदालत के जरिए नवाज शरीफ पर राजनीतिक प्रतिबंध लगवा दिया. उसके बाद इसने पाकिस्तान की सत्ता में पहुंचने के लिए बेहद अहम माने-जाने वाले पंजाब प्रांत में इमरान का माहौल बनाने में मदद की. यहां सेना ने पीएमएल-एन के कई उम्मीदवारों को धमकाकर पार्टी छोड़ने और फिर स्वतंत्र रूप से या इमरान की पार्टी से चुनाव लड़ने को मजबूर किया.

अन्य प्रांतों में भी सेना ने पीएमएल-एन और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को कमजोर करने की कोशिश की. यह भी बताया जाता है कि सेना ने ही इस बार कई कट्टरपंथी पार्टियों को चुनाव में उतारा है. इन पार्टियों के करीब 50 उम्मीदवार जीते हैं. माना जा रहा है कि यही लोग इमरान खान को समर्थन देकर सत्ता तक पहुंचाने में मदद करेंगे.

पाकिस्तानी सेना पर नवाज शरीफ को दबाने और इमरान का साथ देने के आरोप इस्लामाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शौकत अजीज के खुलासे के बाद सही साबित हो गए. चुनाव से तीन दिन पहले अजीज ने दावा किया कि सेना नहीं चाहती कि नवाज शरीफ को चुनाव से पहले जमानत मिले. उनके मुताबिक आईएसआई के कहने पर ही नवाज शरीफ की जमानत पर सुनवाई करने वाली बेंच में उन्हें शामिल नहीं किया गया क्योंकि खुफिया एजेंसी को लगता था कि वे उसकी इच्छा के खिलाफ जा सकते हैं.