आप में से बहुत से लोग काशी हिंदू विश्वविद्यालय गए होंगे, कम से कम नाम तो सभी ने सुना होगा. प्राचीन शहर बनारस में मौजूद इस बेहद खूबसूरत यूनिवर्सिटी को देखना अपने आप में एक समृद्ध करने वाला अनुभव है. गेरुए कंगूरों वाली पीली इंडो-गौथिक इमारतों के सामने से गुज़रते हुए आप बीते वक्त में लौट सकते हैं. चाहें तो आज डेनिम और टी-शर्ट्स पहनकर डिपार्टमेंट्स में घुसते लड़के-लड़कियों को, 102 साल पहले के धोती कुर्ता और साड़ियां पहनने वाले विद्यार्थियों में तब्दील होते देख सकते हैं. साल 2018 में यह विश्वविद्यालय अपनी 102वीं वर्षगांठ मना रहा है.

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी या काशी हिंदू विश्विद्यालय भारत के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है. और सिर्फ यही नहीं, यह अपनी तरह का पहला विश्वविद्यालय भी था. इससे पहले तत्कालीन अविभाजित भारत में पांच विश्वविद्यालय थे - कलकत्ता, बौम्बे, मद्रास, लाहौर और इलाहाबाद विश्वविद्यालय. लेकिन तत्कालीन यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन की तर्ज पर शुरू किए गए इन विश्वविद्यालयों में क्लासरूम ट्यूशन की व्यवस्था नहीं थी, ये सिर्फ परीक्षा कराने और डिग्री देने वाले संस्थान थे. लेकिन बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की संकल्पना एक ऐसी रेज़ीडेंशियल यूनिवर्सिटी के तौर पर की गई कि यहां हिंदू धर्म की शिक्षा के साथ-साथ सभी तरह की कलाओं और विज्ञान की शिक्षा तो दी ही जानी थी, साथ ही विद्यार्थियों को एक नैतिक चरित्र वाले नागरिक के तौर पर भी तैयार किया जाना था.

विश्वविद्यालय के नाम में हिंदू शब्द का होना आज हमें चौंकाता है, लेकिन हममें से अधिकतर भारत और यहां की शिक्षा के इतिहास से नावाकिफ होने के कारण इस नाम के पीछे की कहानी नहीं जानते. सत्रहवीं शताब्दी की शुरुआत में भारत आई ईस्ट इंडिया कंपनी ने जब देश में अपने पांव जमा लिए तब उन्होंने शिक्षा की तरफ भी रुख किया. तमाम मिशनरियों ने अंग्रेज़ी शिक्षा देने वाले संस्थान खोल दिए. भारतीय शिक्षा पद्धति ने अब तक जो जुटाया था उसे कमतर आंका जाने लगा.

साल 1833 में जब चार्टर एक्ट ने ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत में व्यापार करने के अधिकार समाप्त कर दिए, और भारत सीधे ब्रिटिश राज्य का हिस्सा बन गया. अब देश में अंग्रेजी शिक्षा की मांग और तेज़ी से बढ़ी. लेकिन तब भी बहुत से ऐसे लोग थे जो देश की प्राचीन संस्कृत और अरेबिक शिक्षा के पक्षधर थे. मसला जब अंग्रेजी सरकार तक पहुंचा तब 2 फरवरी 1835 की मशहूर रिपोर्ट में लॉर्ड मैकॉले ने अंग्रेजी शिक्षा का समर्थन किया. मैकॉले ने लिखा, ‘एक अच्छी यूरोपियन लाइब्रेरी की एक अलमारी भारत और अरब के समूचे साहित्य के बराबर है.’

ब्रिटिश सरकार ने तय किया कि सरकारी पैसा यूरोपियन साहित्य औऱ विज्ञान की पढ़ाई पर खर्च किया जाएगा. यह भी तय हुआ कि संस्कृत और अरबी शिक्षा संस्थानों को बंद तो नहीं किया जाएगा लेकिन इनके विद्यार्थियों को कोई सरकारी सहायता नहीं मिलेगी. इसके बाद 1856 में यूनिवर्सिटी ऑप कलकत्ता के रूप में भारत में पहला विश्वविद्यालय शुरू करने के लिए जरूरी विधेयक पारित कर दिया गया. 1869 में लाहौर में यूनिवर्सिटी कॉलेज खुला जिसे 1882 में यूनिवर्सिटी का दर्जा दे दिया गया. 1887 में इलाहाबाद यूनिवर्सिटी अस्तित्व में आई.

अब तक भारत में अंग्रेजी शिक्षा और संस्कृति का काफी प्रचार-प्रसार हो चुका था, और बहुत से लोग देश की संस्कृति में आती गिरावट से दुखी थे. 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती आर्य समाज की स्थापना कर चुके थे. महादेव गोविंद रानाडे का प्रार्थना समाज, बॉम्बे में सामाजिक बदलाव लाने की कोशिश कर रहा था. थियोसोफिकल आंदोलन भी अब तक भारत में कदम रख चुका था.

1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना ने देश के इतिहास में एक नया सफहा जोड़ा. दिसंबर 1886 को कलकत्ता में हुए कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में लोगों ने पहली बार 25 साल के युवा मदन मोहन मालवीय को सुना. कांग्रेस की बैठकों के लिए देश भर में घूमते वक्त मालवीय जी ने महसूस किया कि देश भर में धर्म उपेक्षित है. उनका मानना था कि धर्म के बिना देशभक्ति और नैतिकता असंभव थी.

उन दिनों म्योर सेंट्रल कॉलेज इलाहाबाद विश्वविद्यालय का मुख्य कॉलेज था. मालवीय जी ने वहां हिंदू छात्रों के लिए छात्रावास की व्यवस्था की जिसका उद्देश्य सिर्फ छात्रों को रहने की जगह उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था बनाना था जो उनमें नैतिकता और चरित्र निर्माण कर सके. बनारस के महाराज प्रभु नारायण सिंह ने इस काम में उनकी मदद की.

इसके बाद ही उन्होंने एक ऐसा विश्वविद्यालय शुरू करने के बारे में सोचा जहां गुरुकुल की परंपरा को मॉडर्न शिक्षा के साथ विद्यार्थियों तक पहुंचाया जा सके. इस काम के लिए उन्होंने काशी को चुना. काशी, जहां व्यास ने महाभारत और 18 पुराण लिखे, बुद्ध ने पहला प्रवचन दिया, तुलसीदास ने रामायण लिखी और जो सदियों से प्राचीन हिंदू परंपरा का केंद्र था. इस योजना में भी काशी नरेश उनके साथ थे.

मालवीय जी ने जब हिंदू विश्विद्यालय का प्रस्ताव तैयार किया तो उसकी शुरुआत में ही उन्होंने स्पष्ट किया कि इसकी स्थापना इसलिए ज़रूरी थी क्योंकि देश की 94 फीसदी आबादी निरक्षर थी, बहुसंख्यक हिंदू हर साल प्लेग और अकाल का शिकार होकर लाखों की संख्या में मर रहे थे, इन हिंदुओं की शारीरिक बनावट व क्षमताएं भी धीरे-धीरे कम हो रही थीं. और इस दुर्गति का कारण था धर्म का ह्रास.

इस धर्म के बारे में उन्होंने लिखा कि ‘भारत का प्राचीन धर्म प्रत्येक व्यक्ति को सिखाता है कि वह एक बड़ी शक्ति का एक हिस्सा है, उसे उस बड़ी शक्ति के हित के लिए कार्य करना और जीना है.’ उन्होंने हिंदू यूनिवर्सिटी की एक योजना पेश की जिसमें, संस्कृत की शिक्षा के साथ इंजीनियरिंग, मेडिसिन और अन्य वैज्ञानिक शिक्षा की व्यवस्था भी थी. 31 दिसंबर 1905 को प्रस्तावित विश्वविद्यालय का प्रोस्पेक्टस कांग्रेस के 21 वें अधिवेशन में पेश किया गया. इसके बाद जनवरी 1906 में प्रयाग कुंभ के दौरान आयोजित सनातन धर्म महासभा में भी इस पर चर्चा हुई. प्रस्ताव को सभी का समर्थन मिला. लेकिन अक्टूबर 1905 में बंगाल विभाजन के बाद देश की राजनीतिक स्थितियां तेज़ी से अस्थिर हुईं और इस प्रस्ताव पर काम नहीं हो सका.

इसी समय थियोसोफिकल सोसाइटी की एनी बेसेंट भी बनारस में एक ‘भारतीय विश्वविद्यालय’ बनाने की योजना पर काम कर रही थीं. उनका मानना था कि असली भारतीय राष्ट्रीयता के विकास के लिए भारतीय धर्म, दर्शन और अध्यात्म को पुनर्जीवित करने की ज़रूरत थी. सिर्फ पश्चिम की शिक्षा भारत को एक मजबूत राष्ट्र नहीं बना सकती थी. उन्होंने 1898 में सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्थापना की जहां पश्चिमी शिक्षा के साथ-साथ संस्कृत साहित्य और हिंदू शास्त्रों के आधार पर धर्म और नैतिकता की शिक्षा भी दी जा रही थी.

श्रीमती बेसेंट की कल्पना के विश्वविद्यालय में सभी धर्मों की शिक्षा दी जानी थी, देश भर के धर्म आधारित कॉलेज इस विश्वविद्यालय से जुड़ने थे. लेकिन 1998-99 के दौरान अलीगढ़ के मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज को यूनिवर्सिटी का दर्जा दिलाने की मांग ने ज़ोर पकड़ा और कई मुसलमान शिक्षाविद श्रीमती बेसेंट की संकल्पना से अलग हो गए. तब उन्होंने भी इस यूनिवर्सिटी को सिर्फ हिंदू धर्म तक सीमित कर दिया. 1907 में एनी बेसेंट ने विश्वविद्यालय की स्कीम को पेटिशन के तौर पर ब्रिटिश क्राउन के पास भेजा ताकि वहां से स्वीकृति मिलने के बाद वे यूनिवर्सिटी के लिए पैसा इकट्ठा कर सकें.

1911 में पंडित मालवीय और एनी बेसेंट कलकत्ता में मिले और दोनों ने साथ मिलकर यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए काम करने का निर्णय लिया. ब्रिटिश राज्य की स्वीकृति मिलने के बाद देश भर के राजाओं और आम जनता ने पैसा इकट्ठा करने में उनकी मदद की. इस तरह से 4 फरवरी 1916 को यूनिवर्सिटी की नींव रखी गई.

बीएचयू के कृषि विभाग का भवन
बीएचयू के कृषि विभाग का भवन

तब से अब तक 100 साल बीत चुके हैं, यूनिवर्सिटी का स्वरूप पहले से काफी बदल चुका है. तमाम नए डिपार्टमेंट्स शुरू हो चुके हैं, विद्यार्थियों की तादाद काफी बढ़ चुकी है. सालों से सुबह कैंपस में घूमने आने वाले पुराने प्रॉफेसर्स शिकायत करने लगे हैं कि यूनिवर्सिटी में अब उतने पेड़ नहीं बचे जितने कभी हुआ करते थे. नई इमारतें बनाने के लिए कई बार इन्हें काटा जा चुका है.

लेकिन एक चीज़ है जो यहां अब तक नहीं बदली. और वह है मालवीय जी का नाम. आज भी नए-पुराने प्रॉफेसरान, मालवीय मूल्यों की बात करते दिख जाते हैं. यह और बात है कि विश्वविद्यालय के मौजूदा हालात देखने के बाद साफ हो जाता है कि जिस चरित्र निर्माण और धार्मिक-नैतिक शिक्षा के विचार के साथ मालवीय जी ने इस विश्वविद्यालय का सपना देखा था, वह अब सिर्फ छात्रावास की दीवारों पर लगे उनके संदेशों तक ही सिमट गया है. धर्म और नैतिकता की जगह गुंडागर्दी, क्षेत्रीय राजनीति और भ्रष्टाचार ने ले ली है.

फैकल्टी रोड से हॉस्टल रोड की तरफ जाते हुए मैं कानून और दर्शन के तीन छात्रों से मिलती हूं. सड़क के किनारे बाइक और साइकल खड़ी कर ये लोग राइट टू लाइफ पर बातचीत कर रहे हैं. सुन कर अच्छा लगता है. लेकिन जब मैं इनसे विश्वविद्यालय के अनुभव जानना चाहती हूं तो निराशा हाथ लगती है. अपना नाम न बताने की शर्त पर उनमें से बीएएलएलबी के तीसरे वर्ष के एक छात्र कहते हैं, ‘मैं यहीं बनारस में पला-बढ़ा हूं. इस यूनिवर्सिटी की पॉलिटिक्स को करीब से देखा है. यहां की सबसे बड़ी समस्या है अपॉइन्टमेंट्स में धांधली. जब टीचर्स ही ऐसे आएंगे तो फिर स्टूडेंट्स का क्या होगा.’ वे कहते हैं पिछले तमाम सालों से यहां पहुंच के आधार पर ही शिक्षकों की भर्ती होती रही है.

विश्वविद्यालयों में एकैडमिक इनब्रीडिंग यानी डिपार्टमेंट में भर्तियों के समय अपने पुराने छात्रों को प्राथमिकता से लेना, एक आम चलन बन चुका है. हाल में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘अगर फैकल्टी रिक्रूटमेंट्स में थोड़ी सख्ती बरती जाये तो इनब्रीडिंग की बुराई को खत्म किया जा सकता है. इनब्रीडिंग ने भारतीय विश्वविद्यालयों के कई विभागों को नष्ट कर दिया है.’ साथ में मौजूद एक और छात्र कहते हैं, ‘आप किसी भी डिपार्टमेंट में जाकर देख लीजिए, आपको फैकल्टी में तमाम ऐसे लोग मिल जाएंगे जो यहां के पुराने छात्र हैं.’

बिहार के पूर्णिया से आईं मैत्री वर्मा इसी यूनिवर्सिटी के महिला महाविद्यालय से अंग्रेज़ी में स्नातक हैं और एक बार फिर मास्टर्स में दाखिले के लिए यहां आई हैं. वे कहती हैं, ‘जब में एमएमवी में आई तो बीएचयू के नाम की वजह से यहां से बहुत कुछ उम्मीद कर रही थी. पर जब एडमिनशन लिया तो जाना कि हमारे कॉलेज की फैकल्टी बहुत अच्छी नहीं थी. क्लास इंटरेक्शन नहीं था, लिटरेरी फैस्ट्स उतने नहीं थे.’ हालांकि मैत्री एमएमवी के बाहर के बीएचयू से अब भी काफी प्रभावित नज़र आती हैं.

मैत्री से बात करने के बाद में आर्ट्स फैकल्टी के अंग्रेज़ी विभाग जाती हूं. यूनिवर्सिटी में एडमिशंस शुरू हो चुके हैं. दूर-दूर से विद्यार्थी और उनके अभिभावक तमाम तरह की उम्मीदें और सपने लेकर आने लगे हैं. अंग्रेजी डिपार्टमेंट काफी गंदा है, जैसे बहुत समय से ठीक से सफाई नहीं हुई हो. इमारत के रखरखाव पर भी ध्यान नहीं दिया गया है. यहां असिस्टेंट प्रॉफेसर राहुल चतुर्वेदी से मुलाकात होती है. राहुल इसी विभाग के छात्र रहे हैं. एक छात्र से लेकर शिक्षक तक के सफर में वे क्या बदलाव पाते हैं, इस सवाल पर राहुल टेक्नॉलजी की बात करते हैं. वे कहते हैं, ‘इंटरनेट और सोशल मीडिया ने आज के स्टूडेंट्स को पहले से ज़्यादा एक्टिव बना दिया है. इसके अलावा क्लासरूम अब पहले की तरह मोनोलॉजिकल नहीं रह गए हैं, अब लेक्चर्स के साथ-साथ यहां डिस्कशंस भी होते हैं.’

राहुल से आर्ट्स फैक्ल्टी, राजनीति और बिरला छात्रावास की नकारात्मक छवि पर भी बातचीत होती है. वे मानते हैं कि फैकल्टी और छात्रावास में कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जिन्हें बाहर से राजनीतिक पार्टियों का समर्थन है. ‘ऐसा नहीं है कि मेरे छात्र राजनीति से दूर रहना चाहते हैं, पर वे सही किस्म की राजनीति चाहते हैं जहां विद्यार्थियों के मुद्दों पर बात हो, बहस हो. लेकिन अक्सर डर यही होता है कि वे 0.1 फीसदी छात्र जो गलत तरह की पॉलिटिक्स करते हैं वे हमारे छात्रों को हाइजैक करने की कोशिश करते है. मैं मानता हूं कि यहां स्टूडेंट पॉलिटिक्स खुले तौर पर पॉलिटिकल हो चुकी है, छात्र शिक्षा और शिक्षण संस्कृति के मुद्दों के बजाय बेकार की बातों में इंगेज होने लगे हैं’ राहुल चतुर्वेदी कहते हैं.

पत्रकारिता एवं जनसंपर्क विभाग के एक छात्र अपना नाम न बताते हुए साझा करते हैं कि पिछले चार सालों में विश्वविद्यालय की राजनीति तेजी से बदली है. अब पार्टी विशेष के प्रॉफेसर्स ऐसे विद्यार्थियों और उनके साथ छात्रावास में जगह बनाए हुए असामाजिक तत्वों को शह देते हैं जिन्हें ज़रूरत पड़ने पर किसी अन्य प्रॉफेसर या अधिकारी के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके. वे बीजेपी और एबीवीपी के बढ़ते प्रभाव का ज़िक्र करते हुए बताते हैं, ‘पिछले दिनों कई बार कैंपस के विश्वनाथ मंदिर पर स्थानीय मुसलमानों के सथ मारपीट की घटनाएं हुई हैं.’

2015 में एबीवीपी से जुड़े बीएएलएलबी के छात्र विकास से बात होती है. वे कहते हैं, ‘मेरे पिता आर्मी में थे, देशभक्ति हमारे खून में है, एबीवीपी एक प्लैटफॉर्म है जो हमें नेशन बिल्डिंग में पार्टिसिपेट करना सिखाता है.’ वे बताते हैं कि 2015 से एबीवीपी के हर साल चार से छह हज़ार सदस्य कैंपस में होते हैं. वे बताते हैं, ‘हम एडिमिशन के समय हेल्प डेस्क लगाने से लेकर, छात्रों की समस्याओं को डीन स्तर पर पहुंचाने और आस-पास के गांवों में पेड़-पौधे लगाने तक तमाम काम करते हैं.’ बिरला छात्रावास के छात्रों की गुंडागर्दी और प्रॉफेसर्स द्वारा उन्हें शह दिए जाने के सवाल पर वे एक ऐसे प्रॉफेसर का ज़िक्र करते हैं जो समाजवादी पार्टी के छात्रों को प्रश्रय दिया करते थे.

डिपार्टमेंट ऑफ एनशंट इंडियन हिस्ट्री, कल्चर एंड आर्किओलॉजी के प्रोफैसर महेश प्रसाद अहिरवार से इस बारे में बातचीत होती है तो वे मौजूदा हालात से काफी नाराज़ नज़र आते हैं. साल 1996 से इस डिपार्टमेंट का हिस्सा रहे प्रॉफेसर अहिरवार कहते हैं, ‘यूनिवर्सिटी में फंड्स आए हैं तो सिर्फ फर्नीचर बदला है, लेकिन सही विजन न होने की वजह से एकैडमिक एनवायर्नमेंट नहीं बदला, बल्कि और खराब हुआ है.’ वे नवंबर 2014 से नवंबर 2017 तक बीएचयू के वीसी रहे गिरीश चंद्र त्रिपाठी पर आरोप लगाते हैं कि उनके कार्यकाल में विश्वविद्यालय को हिंदू तालिबान का ब्रीडिंग ग्राउंड बनाने की कोशिशें हुई थीं.

‘2014 के बाद से लगभग सभी विभागों में संघ और उसके अनुषांगिक संगठनों की गतिविधियां शुरू हो गईं. यूनिवर्सिटी के खर्चे पर संघ के कार्यक्रम आयोजित किए जाने लगे. छात्रावासों के भीतर संघ के प्रचारक बैठकें करने लगे. एक खास मानसिकता को बढ़ावा दिया जाने लगा. रिसर्च में भी संघ की विचारधारा से जुड़े टॉपिक आसानी से पास हो जाते हैं.’ उदाहरण के लिए प्रॉफेसर अहिरवार कैंपस के भीतर महामना हॉल संगोष्ठी संकुल, विज्ञान संस्थान में आयोजित एक कार्यक्रम का पोस्टर साझा करते हैं. वे अपॉइन्टमेंट्स के मामले में भी संघ पर हस्तक्षेप का आरोप लगाते हैं.

इसके बाद डिपार्टमेंट ऑफ एनिमल हस्बेंड्री एंड डेयरीइंग के अध्यक्ष प्रॉफेसर दिनेश चंद्र राय से बातचीत होती है. वे गर्व से बताते हैं कि उन्होंने अपने डिपार्टमेंट को विदेशी यूनिवर्सिटीज़ के डिपार्टमेंट से कमतर नहीं रखा है. विभाग वाकई काफी शानदार है, एकदम चमचमाता हुआ. डेयरी की नई तकनीकें और वर्कशॉप सब कुछ अप-टू-डेट. मुझे एक छात्रा द्वारा विकसित की गई बेसिल फ्लेवर की आइस-क्रीम भी खिलाई जाती है. लेकिन इसके बाद प्रोफेसर राय जो कहते हैं वह निराश करने वाला है, ‘हमारे पास सबकुछ है, फंड्स की कोई कमी नहीं है लेकिन फिर भी अच्छे से अच्छे छात्र यहां दाखिला लेने, रिसर्च तक करने के बाद बैंक की तैयारियां करते हैं. क्योंकि उनके लिए नौकरियां नहीं हैं.’

विभाग से निकलते वक्त शाम घिरने लगी है, दिन भर बारिश होकर थमने लगी है. यहां से विश्वनाथ मंदिर का करीब डेढ़ किलोमीटर का रास्ता मुझे पैदल तय करना है. रास्ता बेहद खूबसूरत है. बारिश से भीगे हुए आम और इमली के दरख्त अच्छे लग रहे हैं. बीच-बीच में मोरों के चिल्लाने की आवाज़ें भी सुनाई दे रही है. मैं सोचती हूं कि मालवीय जी के समय भी मोर तो कम से कम यूं ही बोलते होंगे. लेकिन बाकी सब चीजें जैसी इस वक्त हैं, मालवीय जी ने कल्पना भी न की होगी इस स्थिति की. विश्वविद्यालय में क्या, देश की राजनीति में जिस तरह हिंदुत्व के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है, मुझे लगता है हमें एक बार फिर उसी हिंदू यूनिवर्सिटी की ज़रूरत है जो हमें धर्म, नैतिकता और देशभक्ति के सही मायने सिखाए. वही यूनिवर्सिटी जिसका सपना श्रीमती बेसेंट और पंडित मालवीय ने देखा था. पर आज वह सपना हमारे लिए कौन देखेगा?