रैमन मैगसेसे पुरस्कार को एशिया का नोबेल पुरस्कार कहा जाता है और इस साल जिन लोगों को यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिलना है उनमें दो भारतीय भी शामिल हैं. इनमें से डॉ भरत वाटवानी को मानसिक रूप से बीमार हजारों निर्धन लोगों को बचाने और उन्हें उनके परिवारों से मिलाने के लिए यह सम्मान दिया जा रहा है. वहीं, सोनम वांगचुक को प्रकृति के उपयोग, संस्कृति और शिक्षा में अपने योगदान के लिए यह पुरस्कार दिया जाएगा.

डॉ भरत वाटवानी ने सालों पहले अपनी पत्नी के साथ मिलकर एक अनौपचारिक अभियान शुरू किया था. इसके तहत ये दोनों बेघर मानसिक रूप से बीमार लोगों को अपने क्लिनिक में इलाज के लिए लाते थे. बाद में 1988 में इन्होंने ‘श्रद्धा रीहेबिलिटेशन फाउंडेशन’ की स्थापना की. इसका मकसद था गलियों-सड़कों पर रहने को मजबूर मानसिक रोगियों को बचाना और इन्हें रहने का आसरा देकर इनका इलाज करना. इस काम में इनका पुलिस, सामाजिक कार्यकर्ताओं व अन्य लोगों ने भी साथ दिया.

वहीं, सोनम वांगचुक ने 1988 में इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद ‘स्टूडेंट्स एजूकेशन एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख’ की स्थापना की थी. इसके तहत उन्होंने लद्दाख के उन छात्रों को पढ़ाना शुरू किया जो स्कूली परीक्षाओं में बार-बार फेल होते थे. आगे चलकर 1994 में उन्होंने ‘ऑपरेशन न्यू होप’ नाम से एक नया अभियान चलाया. इसका मकसद था छात्रों के सुधार के लिए चलाए कार्यक्रम का विस्तार करना और उसे मजबूत बनाना. इसके तहत अब तक 700 अध्यापकों को प्रशिक्षित किया जा चुका है. इसी का नतीजा रहा कि 1996 में जहां सिर्फ पांच प्रतिशत छात्र-छात्रा मैट्रिक की परीक्षा पास कर पाते थे, उनका आंकड़ा 2015 में 75 प्रतिशत तक पहुंच गया.