साल 2019 के आम चुनाव से करीब नौ महीने पहले बिहार खासकर नीतीश कुमार की राजनीति पर सभी की नजर है. करीब एक साल पहले उन्होंने सभी को चौंकाते हुए राष्ट्रीय जनता दल (राजद), जनता दल यूनाइटेड (जदयू) और कांग्रेस की महागठबंधन की सरकार को गिरा दिया था. उस वक्त राज्यपाल को अपना इस्तीफा देने के बाद उन्होंने कहा था कि उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच उनके लिए सरकार चलाना और काम करना मुश्किल हो गया है.

हालांकि, इससे पहले नीतीश कुमार लगातार कहते रहे थे कि महागठबंधन को जनता ने पूरे पांच साल के लिए जनादेश दिया है. इसके बाद नीतीश कुमार ने 17 साल तक सहयोगी रह चुकी भाजपा के समर्थन से एक बार फिर सूबे की बागडोर संभाली. 2013 के पांच साल बाद एक बार फिर राज्य में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनने के बाद माना गया कि अब केंद्र और राज्य में एक गठबंधन की सरकार होने की वजह से बिहार पहले के मुकाबले अब तेजी से विकास करेगा. लेकिन क्या ऐसा वास्तव में हुआ है.

विकास की गति

बीते साल पटना विश्वविद्यालय के 100 साल पूरे होने के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा देने की मांग की थी. लेकिन, प्रधानमंत्री ने इस पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी. इसके अलावा बिहार के विशेष राज्य के दर्जे की मांग को लेकर पिछली यूपीए सरकार की तरह ही मोदी सरकार का रुख भी नकारात्मक रहा है. उधर, 2015 के विधानसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी द्वारा आरा की एक रैली में जो 1.65 लाख करोड़ रुपये देने का जो वादा किया था, वह भी अभी कागजों पर ही है. इसके अलावा वित्तीय वर्ष 2017-18 में बिहार सरकार को केंद्र से उसके हिस्से के बजट अनुमान का 10.2 फीसदी कम राजस्व हासिल हुआ है.

पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टीच्यूट ऑफ सोशल स्टडीज में प्रोफेसर डीएम दिवाकर मानते हैं कि सूबे में एनडीए की सरकार आने के एक साल बाद भी कोई बदलाव नहीं आया है. उनके मुताबिक बीते कुछ महीनों से सीट बंटवारे को लेकर जिस तरह सरकार में शामिल दलों के बीच ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है, उससे भी विकास कार्य प्रभावित हुआ है. डीएम दिवाकर कहते हैं, ‘केंद्र और राज्य में एक सरकार होने के बाद भी 14वें वित्त आयोग की सिफारिशों के मुताबिक जितना पैसा राज्य को मिलना चाहिए था, उतना नहीं मिला.’ राज्य की वित्तीय स्थिति को लेकर वे आगे कहते हैं, ‘जीएसटी लागू होने के बाद राज्य को जो मुआवजा देने का वादा किया गया था उसे पूरा नहीं किया जा रहा है.’

वहीं, किशनगंज जिले में कार्यरत एक जीविका परियोजना में कार्यरत कर्मचारी सत्याग्रह को बताते हैं, ‘नई सरकार के आने के बाद सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर कोई तेजी नहीं आई है, स्थिति जस की तस बनी हुई है. हालांकि, बीते कुछ वक्त से शौचालय निर्माण पर काफी जोर दिया जा रहा है.’ क्या इसके पीछे की वजह जदयू का भाजपा के साथ आना है? उनके मुताबिक ऐसा साफ तौर पर नहीं कहा जा सकता. किशनगंज की गिनती देश के सबसे पिछड़े जिलों में होती है.

शिक्षा के मोर्चे पर भी हालात जस के तस ही दिखते हैं. पेशे से शिक्षक राकेश रंजन (बदला हुआ नाम) बताते हैं, ‘जब नीतीश कुमार ने एक बार फिर भाजपा के साथ सरकार बनाई तो लगा कि शिक्षकों का वेतन भुगतान समय पर होगा. लेकिन, अब तक ऐसा नहीं हुआ है. यानी पहले की तरह अब भी वेतन के लिए शिक्षकों को महीनों तक इंतजार करना होता है.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘पहले छात्रों को किताबें सरकार की ओर दी जाती थीं. लेकिन, इसमें लेटलतीफी को देखते हुए इन्हें खरीदने के लिए छात्रों को पैसे देने की व्यवस्था शुरू की गई. इसके बाद भी हाल ये है कि इस साल शैक्षणिक सत्र शुरू होने के करीब चार महीने बाद पैसों का आवंटन किया गया है.’ यानी किताबों के लिए सरकार पर निर्भर छात्रों को इस दौरान बिना किताब पढ़ाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

सांप्रदायिक हिंसा

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार सांप्रदायिकता को बर्दाश्त न करने की बात करते रहे हैं. इसके बाद भी नई एनडीए सरकार के एक साल के दौरान सांप्रदायिक हिंसा में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है. इस साल रामनवमी के मौके पर मुख्यमंत्री के गृह जिले नालंदा सहित कई शहरों में दो समुदायों के बीच हिंसक टकराव देखने को मिला था. भागलपुर में हुई ऐसी ही एक घटना में केंद्रीय मंत्री और भाजपा सांसद अश्विनी चौबे के बेटे अर्जित शाश्वत चौबे के खिलाफ मामला दर्ज किया गया. इसके अलावा इीस महीने केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने नवादा स्थित जेल में दंगे के आरोपितों से मुलाकात की. साथ ही, उन्होंने अपनी ही सरकार पर हिंदुओं को दबाने का आरोप लगाया.

द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते एक साल के दौरान बिहार में सांप्रदायिक हिंसा में तेज बढ़ोतरी देखने को मिली है. इसके मुताबिक बीते साल जुलाई में नई सरकार बनने से लेकर इस साल मार्च तक बिहार की जनता को 200 से अधिक सांप्रदायिक हिंसक घटनाओं का सामना करना पड़ा है. इसके अलावा 2017 में राज्य में सांप्रदायिक हिंसक घटनाओं की संख्या 270 रही. यह आंकड़ा बीते सात वर्षों में सबसे अधिक है. साल 2010 से 2012 तक एनडी सरकार के तीन वर्षों के दौरान यह संख्या केवल 125 थी. वहीं, 2016 में महागठबंधन की सरकार के दौरान सूबे को 230 सांप्रदायिक हिंसक घटनाओं का सामना करना पड़ा था.

कानून-व्यवस्था और प्रशासन

नीतीश कुमार ने बिहार की जनता से सामाजिक न्याय के साथ कानून-व्यवस्था दुरूस्त करने की बात कही थी. लेकिन, सूबे में कानून-व्यवस्था की जो स्थिति है, वह जनता के बीच नाउम्मीदी पैदा करती हुई दिखती है. एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और बिहार इलेक्शन वॉच की एक रिपोर्ट के मुताबिक नई सरकार में 76 फीसदी मंत्रियों ने चुनावी हलफनामे में इस बात को स्वीकार किया है कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं. इससे पहले महागठबंधन की सरकार में यह आंकड़ा 66 फीसदी था.

बिहार को करीब से देखने वाले पत्रकार और डेवलपमेंट फाइल्स के संपादक अमरेंद्र किशोर की मानें तो राज्य में बीते एक साल के दौरान अपराध में कमी देखने को नहीं मिली है. मुजफ्फरपुर मामले का उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि अब (एनडीए सरकार में) अलग-अलग तरह के अपराध देखने को मिल रहे हैं. वे कहते हैं, ‘आम जनता को कोई राहत नहीं मिली है. यहां तक की स्थिति पहले से कहीं अधिक लचर हुई है. यदि पहले महागठबंधन की सरकार में नीतीश कुमार काम नहीं कर पा रहे थे तो अब पूरा सिस्टम ही काम नहीं कर पा रहा है.’ उनके मुताबिक सूबे में अधिकारी सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत मांगी गई कोई भी जानकारी देने को तैयार नहीं हैं. यानी इस क्रांतिकारी कानून का भी बिहार में बुरा हाल है और जनता को ही इस अधिकार से दूर रखने की कोशिश की जा रही है.

हालांकि बिहार पुलिस में कार्यरत एक सब इंस्पेक्टर इस आरोप को खारिज करते हैं कि बीते एक साल में कानून व्यवस्था की स्थिति खराब हुई है. वे कहते हैं कि नई सरकार में सांप्रदायिक तत्वों के खिलाफ किसी तरह की कोताही बरतने को लेकर दबाव है. हालांकि, एक सूत्र के शब्दों में ‘अगर उच्च पदाधिकारी कोई आदेश देते हैं तो उसका पालन करना ही होता है.’ यहां ध्यान देने वाली बात है कि इसी साल सूबे में कानून-व्यवस्था को संभालने की जिम्मेदारी केएस द्विवेदी को दी गई है. साल 1989 के भागलपुर दंगे में उनकी भूमिका पर सवाल उठे थे और यही वजह है कि इस नियुक्ति को लेकर भी विपक्ष ने नीतीश कुमार को कटघरे में खड़ा किया था.

सामाजिक बदलाव संबंधी अभियान

सूबे में पूर्ण शराबबंदी को लेकर अति सख्ती दिखाने के बाद अब नीतीश सरकार ने अपने रुख में नरमी दिखाई है. बीती 23 जुलाई को इससे संबंधित कानून में कई संशोधन कर कानून को पहले से अधिक लचीला किया गया है. विपक्ष का कहना है कि इस कानून के जरिये गरीबों और वंचितों को सताया जा रहा है. राजद नेता तेजस्वी यादव ने इस संशोधन के नाम पर गरीबों को डिस्काउंट देने की बात कही है. उधर, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि यह कानून गरीबों की बेहतरी के लिए लागू किया गया था और इसमें थोड़ी ढील इसलिए दी गई है ताकि किसी निर्दोष को सजा न हो.

कई सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि शराबबंदी कानून लागू होने के बाद बिहार में शराब तस्करी का एक सामानांतर कारोबार खड़ा हो गया है, जिस पर लगाम लगती हुई नहीं दिख रही. उनका यह भी कहना है कि इस ‘खेल’ के बड़े माफिया और कारोबारी बच जा रहे हैं, जबकि निचले स्तर के लोग पुलिस की गिरफ्त में आ रहे हैं.

बीते साल नीतीश कुमार ने सूबे में बाल विवाह और शादियों में दहेज के खिलाफ अभियान की शुरुआत की. लेकिन, लोगों के समर्थन के बिना ये अभियान भी विफल होते हुए दिख रहे हैं. इन अभियानों से जुड़े एक सरकारी कर्मी ने सत्याग्रह को बताया कि छह महीने के भीतर ही बाल विवाह और दहेज विरोधी अभियान की हवा निकल गई है. इसके लिए बीते साल शराबबंदी की तरह ही मानव श्रृंखला भी निकाली गई थी, लेकिन इसमें लोगों का सहयोग न के बराबर ही दिखा.

प्रोफेसर डीएम दिवाकर का कहना है कि सामाजिक बदलाव का काम सरकार को समाज पर ही छोड़ देना चाहिए. साथ ही, इस तरह की सामाजिक पहल को लेकर नीतीश कुमार के जोर पर उनका कहना है, ‘नीतीश कुमार के पास जनता से कहने को अधिक कुछ नहीं बचा है. इसे देखते हुए अपनी जमीन बचाए रखने के लिए वे इस तरह के अभियानों पर जोर दे रहे हैं.’

साफ है कि बिहार में जदयू-भाजपा के साथ आने के एक साल बाद अलग-अलग मोर्चों पर हालात में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है. बल्कि कुछ मामलों में स्थिति बिगड़ी ही है. जानकारों के मुताबिक नीतीश कुमार ने सूबे की जनता के हित में राजद का साथ छोड़ने का जो दावा किया था, वह खोखला साबित होता नजर आ रहा है. राजनीति के कई जानकार इस बात पर करीब-करीब एकमत हैं कि बीते एक साल के दौरान नीतीश कुमार पहले की तुलना में कमजोर दिखे हैं.