कश्मीर घाटी को कुदरत ने खूबसूरती के साथ साथ फलों और फूलों से भी सराबोर कर रखा है. इन्हीं फूलों में से एक फूल केसर का है जिसे अंग्रेज़ी में सैफरन, उर्दू में ज़ाफरान और कश्मीरी में कोंग कहा जाता है. यह मामूली फूल नहीं है. इसकी अंदरूनी पंखुड़ियां बाजार में केसर के नाम से बेची जाती हैं जिसे दुनिया के सबसे महंगे मसालों में से एक माना जाता हैै. औषधीय गुणों से भरपूर केसर की कीमत बाजार में 300-350 रुपए प्रति ग्राम रहती है. इत्र और पान मसाला इंडस्ट्री में केसर की खासी मांग है. कश्मीर में केसर पुलवामा ज़िले के पंपोर और इसके आसपास के गांवों में बरसों से उगाया जाता है.

लेकिन पिछले कई सालों से केसर की खेती पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं. केसर की कृषि योग्य भूमि लगातार सिकुड़ती जा रही है. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन भी केसर की खेती के लिए मुश्किलें बढ़ा रहा है. भूमाफिया कश्मीर में बेलगाम है और केसर की खेती बचाने की सरकारी कोशिशें भी अपना मकसद नहीं हासिल कर पा रहीं.

खतरे की घंटी बज तो काफी समय से रही थी लेकिन, किसानों और प्रशासन को सुनाई पिछले साल दी. इस साल फसल का औसत उत्पादन 1.4 किलो प्रति हेक्टेयर रह गया जो इससे पिछले साल के 4.2 किलो प्रति हेक्टेयर उत्पादन के मुकाबले काफी कम था. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2016-17 में राज्य में केसर का कुल उत्पादन 16.45 मीट्रिक टन था जो 2017-18 में सिर्फ 5.2 मी़ट्रिक टन रह गया.

इन दो सालों के आंकड़ों को अगर अपवाद मान लिया जाए तो भी केसर की फसल उत्पादन के लिहाज से कई सालों से 1.5 से तीन किलो प्रति हेक्टेयर के बीच जूझ रही है.

मौसम में बदलाव

जलवायु परिवर्तन को केसर के घटते उत्पादन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना जा रहा है. केसर की अच्छी फसल के लिए वक्त पर बारिश जरूरी है. मार्च-अप्रैल में और फिर अगस्त-सितंबर में बारिश केसर के लिए अच्छी मानी जाती है. लेकिन पिछले कई सालों से बारिश या तो कम हो रही है या फिर उसका क्रम फसल के अनुकूल नहीं है. कश्मीर के वरिष्ठ केसर वैज्ञानिक डॉक्टर फिरदौस नेहवी कहते हैं, ‘1999 के बाद कश्मीर में बारिश का पैटर्न बदला है. अब गर्मियों के मौसम में ज्यादा बारिश होती है जो केसर के लिए बिल्कुल अच्छी नहीं है.’ 1999 तक अप्रैल से जुलाई तक 80 मिमी बारिश रिकॉर्ड की जाती थी, लेकिन अब यह बढ़कर 160 मिमी हो गयी है.

लेकिन सिर्फ ज्यादा बारिश ही कारण नहीं है. पिछले साल हुई निराशाजनक फसल कम बारिश की वजह से हुई है. कश्मीर के कृषि विभाग के निदेशक अल्ताफ ऐजाज़ अंद्राबी कहते हैं, ‘केसर को पनपने के लिए थोड़ी सी नमी की जरुरत हर समय रहती है. पिछले साल बारिश बिल्कुल नहीं हुई और फसल खराब हो गई.’

सिकुड़ती ज़मीन और भूमाफिया

केसर की खेती में एक और बड़ी समस्या इस खेती का घटता रकबा है. सरकारी अांकड़ों के मुताबिक 1990 में केसर की खेती के लिए इस्तेमाल होने वाली जमीन 7000 हेक्टेयर थी. 1997 में यह घटकर 5,707 हेक्टेयर रह गयी और अब यह केवल 3,700 हेक्टेयर रह गई है. यह सारी ज़मीन पंपोर और उसके आसपास थी. कश्मीर के कृषि विभाग के तकनीकी अधिकारी सुहैल इनामुल्लाह कहते हैं, ‘2011 के बाद से केसर की खेती में इस्तेमाल की जाने वाली जमीन कम नहीं हुई है और यह सरकार की लगातार कोशिशों का नतीजा है.’

लेकिन स्थानीय लोग इस सरकारी अांकड़े पर सवाल खड़े करते हैं . 38 साल के सामाजिक कार्यकर्ता और केसर उत्पादक मुश्ताक़ अहमद कहते हैं, ‘हमारे हिसाब से यह ज़मीन इस समय 2800 से 3000 हेक्टेयर तक ही रह गयी है.’ अहमद सीधा दोष सरकार और स्थानीय प्रशासन को देते हैं. वे कहते हैं, ‘पंपोर में केसर उगाने वाली ज़मीन पर एक कॉलोनी बनी है और दुख की बात यह है कि इस कॉलोनी का नाम सैफरन कॉलोनी रखा गया है.’

दरअसल, पहले कुछ लोगों ने केसर की खेती वाली अपनी जमीन को बेचा और किसी और काम में लग गए. धीरे-धीरे केसर की खेती वाली जमीन पर इमारतें खड़ी होने लगीं. जमीन बेचने वाले कुछ लोगों का कहना था कि केसर की खेती परिवार का पेट नहीं पाल पा रही थी.

लेकिन जमीन बेचना भी बहुतों के लिए घाटे का सौदा साबित हुआ. केसर उगाने वाले एक पूर्व उत्पादक कहते हैं, ‘फसल कम हो रही थी और परिवार बड़ा. मैंने उसी ज़मीन पर गाड़ियों का सर्विस स्टेशन बना दिया. शुरू-शुरू में पैसा अच्छा था लेकिन अब वैसा काम नहीं है. अब अपनी गलती का एहसास हो रहा है.’

कुछ लोगों को अपनी गलती का एहसास है, लेकिन जमीन माफिया की करतूतें केसर की खेती पर भारी पड़ रही हैं. कश्मीर में 2009 के आसपास रेलवे लाइन बिछनी शुरू हुई और उसके कुछ साल बाद नेशनल हाईवे को चौड़ा करने की प्रक्रिया. दोनों कामों के लिए मिट्टी की ज़रुरत पड़ी. केसर के व्यापारी समीर मीर कहते हैं, ‘ठेकेदारों ने मिट्टी का काम लिया और वह ये मिट्टी केसर उगाने वाली ज़मीन से निकालने लगे. जब तक प्रशासन की आंख खुली तब तक बहुत देर हो चुकी थी.’

केसर उत्पादन वाली जमीन पर निर्माण करना और उसमें से मिट्टी निकालना दोनों कानूनी रूप से अवैध है. प्रशासन का दावा है कि निर्माण और मिट्टी की निकासी पूर्ण रूप से बंद है. लेकिन हकीकत में दोनों काम धड़ल्ले से किए जा रहे हैं.

ईरान का केसर

जहां कश्मीर में केसर की उपज कम हो रही है, वहीं इसकी मांग दिन-ब-दिन बढ़ रही है. एेसे में केसर व्यापारी पैसे कमाने के चक्कर में दूसरे तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं. कश्मीर के केसर व्यापारी देश के अन्य राज्यों में ईरान और स्पेन का केसर सप्लाई कर रहे हैं. यह कश्मीरी केसर से सस्ता तो है, लेकिन गुणवत्ता में काफी पीछे है. एक व्यापारी कहते हैं, ‘हम भी क्या करें. कश्मीरी केसर की मांग ज्यादा है और सप्लाई कम. उसके अलावा सच बात यह है कि ईरानी केसर में अच्छा मुनाफा होता है.’

उनकी बात गलत नहीं. जहां कश्मीरी केसर थोक में 1.5 लाख से लेकर 2.5 लाख रुपए प्रति किलो बिकता है, वहीं ईरानी केसर 90,000 रुपए प्रति किलो में मिल जाता है. 70 साल के केसर उत्पादक अब्दुल रहमान इससे चिंंतित हैं. वे कहते हैं, ‘ये लोग धोखाधड़ी करके व्यापारी हमारा नाम ख़राब करते हैं. बाजार में कश्मीरी केसर के नाम पर दूसरा केसर बेचने पर लोग उसे ही सही मानने लगेंगे और असली कश्मीरी केसर लेना बंद कर देंगे क्योंकि यह थोड़ा महंगा भी होता है.’

नेशनल सैफरन मिशन

केसर की खेती पर मंडराते खतरे की वजह चाहे जलवायु परिवर्तन हो या घटती जमीन, लेकिन सरकार भी चिंतित है. कश्मीर के कृषि मंत्रालय, केसर वैज्ञानिकों और इससे जुड़े तमाम लोगों ने केंद्र सरकार के सामने नेशनल सैफरन मिशन का प्रस्ताव रखा था. 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने काफी उत्साह के साथ इस मिशन का ऐलान किया था. इस मिशन में जहां सिंचाई के लिए एक व्यापक योजना बनाई गयी थी, वहीं मार्केटिंग के मोर्चे पर व्यापारियों की मदद, बीज कायाकल्प, किसानों के लिए जागरूकता कार्यक्रम और डी-वीडिंग के लिए मशीनें देने जैसी कवायदें शामिल थीं.

लेकिन अफसोस कि इतने दिनों बाद भी यह मिशन कोई एक मकसद भी पूरा करने में असफल रहा है. इस मिशन की सबसे बड़ी असफलता इसकी सिंचाई योजना का पूरा न हो पाना है. मिशन के तहत 124 बोरवेल बनाने थे और साथ ही साथ सिंचाई के लिए पाइप बिछाए जाने थे. लेकिन छह साल गुज़रने के बाद मात्र 14 बोरवेल ही काम कर रहे हैं. पंपोर में मिशन के नोडल अफसर रियाज़ अहमद खान कहते हैं, ‘लोगों की हिचकिचाहट और कश्मीर के ख़राब हालात इस देरी के मुख्य कारण हैं. पहले किसान समझ ही नहीं पाए कि यह सब उनकी भलाई के लिए हो रहा है. वे अपनी ज़मीनों में बोरवेल बनवाने और पाइप बिछवाने में सहयोग नहीं कर रहे थे. फिर 2014 की बाढ़ और 2016 के ख़राब हालात ने मिशन को और झटका दिया.’ खान यह भी मानते हैं कि भूमाफिया भी लोगों को मिशन का फायदा न लेने के लिए उकसाते हैं. हालात यह हैं कि कई जगह तो बिछे हुए पाइप भी तोड़ दिए गए.

किसानों का मन खट्टा होने की और भी वजहें हैं. सैफरन मिशन की बीज कायाकल्प योजना में किसानों से दोबारा बीज लगाने को कहा गया. इसके लिए उन्हें 25000 रुपये सरकार की ओर से दिए जाने थे. 55 साल के किसान ग़ुलाम नबी भट कहते हैं, ‘बीज कायाकल्प के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ सिंचाई है. हमने बीज फिर से लगा तो दिया लेकिन न बोरवेल तैयार थे और न सिंचाई का कोई और साधन. बारिश भी नहीं हुई और बीज ख़राब हो गया.’ पिछले दो साल से मिशन को फंड नहीं मिल रहा है और तमाम किसानों के पैसे फंसे हुए हैं. मिशन की योजना थी कि कश्मीर में केसर की खेती को पुलवामा से निकालकर राज्य के 18 जिलों में ले जाया जााएगा, लेकिन अभी तक केवल दो जिलों में एेसा हुआ है.

मिशन की हालत ठीक नहीं है. लेकिन इससे जुड़े अधिकारी अाशान्वित हैं. मिशन के नोडल अफसर रियाज खान कहते हैं, ‘हम लोगों को समझा-बुझा रहे हैं और वह खुद भी इस मिशन के परिणाम देख रहे हैं. अब धीरे धीरे लोग स्वेच्छा से आगे आ रहे हैं.’ मिशन के मुख्य वैज्ञानिक फिरदौस नेहवी कहते हैं, ‘डी-वीडिंग की जो मशीनें 75 प्रतिशत सब्सिडी के बाद भी नहीं बिक रहीं थीं वे अब बिकने लगी हैं और अन्य मशीनों की मांग भी आ रही है.’

केंद्र सरकार ने भी मिशन को दो साल का विस्तार दे दिया है. सैफरन मिश्न के तकनीकी अधिकारी इनामुल्लाह को उम्मीद है कि मिशन का रुका हुआ बजट भी जल्द रिलीज हो जाएगा. किसानों के साथ-साथ आम लोग भी इसी उम्मीद में हैं कि सरकार इस दुर्लभ खेती को बचाने के लिए और कदम उठाए.