देश के सूचना आयोगों में 30 प्रतिशत से अधिक पद खाली हैं. गैर सरकारी संगठन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया की ओर से गुरुवार को जारी किए गए एक अध्ययन में इसकी जानकारी दी गई है. अध्ययन के अनुसार केंद्रीय सूचना आयोग और सूचना आयोग के 156 पदों में से केंद्र या राज्य स्तर पर करीब 48 पद खाली हैं.

बीते जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सख्त नाराजगी जताई थी. उसने सवाल किया था कि खाली पदों के संबंध में 2016 में अधिसूचना जारी होने के बाद भी अब तक ये पद भरे क्यों नहीं किए. उधर, केंद्र सरकार ने कहा कि खाली पदों को भरने के लिए दूसरी बार भी विज्ञापन जारी हुआ था, लेकिन नियुक्तियां नहीं हो सकीं. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से एक हलफनामा मांगते हुए इसमें उन कारणों का भी जिक्र करने को कहा जिनकी वजह से ये पद नहीं भरे जा सके हैं.

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया के निदेशक रमानाथ झा एक साक्षात्कार में कहते हैं, ‘सरकार का मकसद पारदर्शिता को बढ़ावा देने का होना चाहिए, मगर फिलहाल ऐसी इच्छाशक्ति न केंद्र के स्तर से और न ही राज्यों के स्तर से दिख रही है. जब ऊपर से उदासीनता है तो निचले स्तर पर और उदासीनता लाजमी है.’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में भ्रष्टाचार को बर्दाश्त न करने की बात लगातार करते रहते हैं. साथ ही, वे भ्रष्टाचार को लेकर विपक्षी पार्टियों पर निशाना साधने से नहीं चूकते. बीते साल नई दिल्ली में आयोजित भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने कहा, ‘भ्रष्टाचार के मामले में जो भी पकड़ा जाएगा, वह बचेगा नहीं. मेरा कोई रिश्तेदार नहीं है. जिसके ऊपर भी इस तरह के आरोप लगेंगे, उनपर कार्रवाई की जाएगी.’ 2014 के चुनाव में ‘बहुत हुआ भ्रष्टाचार-अबकी बार मोदी सरकार’ का नारा देकर सत्ता में आने वाली भाजपा का दावा है कि उसपर अब तक भ्रष्टाचार के दाग नहीं लगे हैं.

लेकिन जानकार इस दावे पर सवाल उठाते हैं. उनका कहना है कि मोदी सरकार पर भले ही भ्रष्टाचार के आरोप न लगे हों, लेकिन, उसके राज में इससे लड़ने वाली संस्थाएं जरूर कमजोर होती हुई दिखी हैं. उनके मुताबिक भ्रष्टाचार को लेकर सरकार की क्या मंशा है, इसका अनुमान काफी हद तक इसके खिलाफ रामबाण माने जाने वाले लोकपाल की नियुक्ति को लेकर उसकी बेरुखी से भी लगाया जा सकता है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा कई बार फटकार खाने के बाद भी सरकार लोकपाल की नियुक्ति नहीं कर पाई है. इसके अलावा केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) और केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) को लेकर भी सरकार सवालों के घेरे में है.

केंद्रीय सूचना का गठन 12 अक्टूबर, 2005 को सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून -2005 के तहत किया गया था. इस कानून के मुताबिक आयोग को आरटीआई से जुड़ी शिकायतों की जांच करने के साथ दोषी पक्ष पर जुर्माना लगाने का भी अधिकार दिया गया है. किसी मामले पर आयोग का फैसला आखिरी और बाध्यकारी होता है. यानी इसे आगे चुनौती नहीं दी जा सकती है. इसमें मुख्य सूचना आयुक्त के साथ कुल 10 सूचना आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान किया गया है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों के दौरान देखा गया है कि काम का बोझ होने के बाद भी आयुक्तों की नियुक्तियों में काफी देर की जा रही है.

सितंबर, 2016 में सरकार ने आयोग में दो आयुक्तों की नियुक्ति के लिए आवेदन निकाला था. आरटीआई के तहत मिली जानकारी के मुताबिक सरकार को इन पदों के लिए कुल 225 आवेदन मिले. हालांकि, इसके करीब दो साल बाद भी इन दो पदों पर सूचना आयुक्तों की नियुक्ति नहीं की जा सकी है. बीते सितंबर में आयुक्त शरत सभरवाल और जनवरी, 2018 में मंजुला पराशर का कार्यकाल पूरा हो चुका है. इसके अलावा सूचना आयुक्त राधा कृष्ण भी इस साल दिसंबर में सेवानिवृत रहे हैं. यानी आयोग में फिलहाल आयुक्तों के चार पद खाली हैं और इस साल के अंत तक यह संख्या पांच हो जाएगी.

आयुक्तों की नियुक्ति के बारे में सेवानिवृत्त कोमोडोर लोकेश बत्रा ने बीते सितंबर में आरटीआई के तहत सीआईसी से जानकारी मांगी थी. लोकेश के मुताबिक सीआईसी ने उन्हें बताया कि इस बारे में उसके और कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के बीच कोई बातचीत ही नहीं हुई है. आयोग में आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू करने की जिम्मेदारी डीओपीटी की ही है.

आयोग में खाली पदों पर नियुक्ति को लेकर मोदी सरकार के ढीले-ढाले रुख का यह पहला मामला नहीं है. इससे पहले भी नवंबर, 2015 में एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने केंद्र को छह हफ्ते के भीतर खाली पदों को भरने का आदेश दिया था. इसके बाद 18 दिसंबर, 2015 को पूर्व रक्षा सचिव राधा कृष्ण माथुर को मुख्य सूचना आयुक्त बनाया गया था. इसके दो महीने बाद सरकार ने फरवरी, 2016 को तीन आयुक्तों- अमिताव भट्टाचार्य, बिमल जुल्का और दिव्य प्रकाश सिन्हा की नियुक्ति की.

आरटीआई कानून के मुताबिक मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया जाता है. इसके बाद समिति द्वारा चयनित उम्मीदवार के नाम पर राष्ट्रपति मुहर लगाते हैं. इन्हें चुनाव आयुक्त के बराबर ही वेतन और अन्य सुविधाएं दी जाती हैं. साथ ही, इनसे अपेक्षा की जाती है कि इन्हें कानून, लोकसेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता या प्रशासन के क्षेत्र में काम करने का अनुभव होगा. नियुक्ति की एक शर्त यह भी है कि संबंधित व्यक्ति संसद या विधानसभा के किसी सदन का सदस्य या फिर किसी लाभ के पद पर न हो. साथ ही किसी राजनीतिक पार्टी या कारोबारी संस्थान से जुड़े हुए व्यक्ति को भी इसके लिए अयोग्य माना गया है. आयुक्तों का कार्यकाल पांच साल या 65 साल की आयु सीमा तक तय किया गया है.

केंद्रीय सूचना आयोग जैसी महत्वपूर्ण संस्था को लेकर मोदी सरकार का ढीला- ढाला रवैया शासन संभालने के एक साल बाद ही सामने आ गया था. उस वक्त मुख्य सूचना आयुक्त राजीव माथुर अपने पद से 22 अगस्त, 2015 को सेवानिवृत हुए थे. इसके बाद सरकार यह खाली पद भरने को लेकर कुंभकर्ण बनी दिखी. इस मुद्दे को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता लोकेश बत्रा, आरके जैन और सुभाष चंद्र अग्रवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की. इस पर सुनवाई के बाद सरकार ने 10 जून, 2016 को मुख्य सूचना आयुक्त के पद पर विजय शर्मा की नियुक्ति की. यानी करीब 10 महीने तक यह पद खाली रहा. उस वक्त मीडिया में आई रिपोर्टों की मानें तो आयोग के पास लंबित मामलों की संख्या बढ़कर 39 हजार हो गई थी. फिलहाल यह संख्या करीब 24,000 बताई जाती है.

आजादी के बाद आरटीआई कानून की गिनती आम आदमी की नजर में एक महत्वपूर्ण कानून के रूप में की जाती है. इसे आम लोगों के सशक्तिकरण और सरकार की जवाबदेही तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा गया. बीते 12 वर्षों में इसके जरिये सरकार और इससे जुड़े संस्थानों के कई काले-चिट्ठे लोगों के सामने आए. इसके साथ ही, इसके लिए काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं की हत्या की खबरें भी देश के अलग-अलग हिस्सों से आईं. सीआईसी को लेकर सरकार की मंशा पर जानकारों का कहना है कि आरटीआई कानून को जिस मकसद के साथ लागू किया गया था, सरकार उसकी ही धज्जियां उड़ाती हुई दिखती है.

इन बातों की पुष्टि सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून, 2005 से जुड़े संशोधन विधेयक से भी होती है. जुलाई में संसद के मानसून सत्र के दौरान इसे पेश किया जाना था. लेकिन विपक्ष के विरोध के बाद सरकार इससे पीछे हट गई. इस विधेयक के जरिये मोदी सरकार केंद्र और राज्यों के स्तर पर सूचना आयुक्तों (आईसी) की सेवा शर्तों में बदलाव करना चाहती है. मसलन विधेयक में प्रावधान है कि किसी सूचना अधिकारी का कार्यकाल पूर्व निर्धारित पांच साल होने के बजाय केंद्र सरकार द्वारा तय होना चाहिए. यही वजह है कि इसका विरोध हो रहा है. आरटीआई कानून में भी यह कहा गया है कि सूचना अधिकारी बिना किसी दूसरे प्राधिकरण के प्रभाव में आए अपनी शक्तियों का उपयोग करेंगे. लेकिन अपने कार्यकाल के लिए उनकी सरकार पर निर्भरता को जानकार इस कानून की मूल भावना पर प्रहार मान रहे हैं.

साफ है कि एक ओर सरकार भ्रष्टाचार को खत्म कर एक नया और श्रेष्ठ भारत बनाने की बात करती है और दूसरी ओर वह इससे लड़ने के लिए बनाए गए हथियारों की धार को कुंद करती हुई भी दिखती है.