इसी पुस्तक की ग़ज़ल ‘ख़ुद-ब-ख़ुद हमवार हर इक रास्ता हो जाएगा’ :

‘ख़ुद-ब-ख़ुद हमवार हर इक रास्ता हो जाएगा / मुश्किलों के रूबरू जब हौसला हो जाएगा

वो किसी के आसरे की आस क्यों रक्खे भला / जिसका रिश्ता है जड़ों से खुद हरा हो जाएगा

प्यार की दुनिया से नाता जोड़कर देखो कभी / जिसको छू दोगे वो पत्थर आईना हो जाएगा

सीख ले ऐ दोस्त अपने आप से यारी का फ़न / वरना तेरा ज़िन्दगी से फ़ासला हो जाएगा

ऊंचे-ऊंचे सर भी उस दिन शर्म से झुक जाएंगे / जब भी उनका आइने से सामना हो जाएगा

बख्श दे या रब मुझे भी मीठी-सी कसक / मेरे जीने का भी कोई आसरा हो जाएगा

तुम हवाएं ले के आओ मैं जलाता हूं चिराग़ / किसमें कितना दम यारों फ़ैसला हो जाएगा’


ग़ज़ल संग्रह : प्यार का पहला ख़त

ग़ज़लकार : हस्तीमल ‘हस्ती’

प्रकाशक : वाणी

कीमत : 295 रुपये


इश्क ऐसी शह है जो हर किसी को दीवाना बना देती है. फिर चाहे इश्क किसी इंसान से हो या फिर अपने मुल्क से. इस दीवानगी में जो जितना डूबा वह उतना ही उबरा. जो अपने इश्क के चलते जितना गुमनाम रहा उसका उतना ही नाम हुआ. फिर चाहे वह अपने मुल्क से प्रेम करने वाले भगत सिंह हों या फिर अपनी हीर से प्रेम करने वाला रांझा. हस्तीमल ‘हस्ती’ का यह ग़ज़ल संग्रह भी हमें इश्क के कई तरह के दरियाओं में एक साथ डुबाए रखता है.

हस्तीमल ‘हस्ती’ की इन ग़ज़लों में न सिर्फ प्रेम का एक व्यापक स्वरूप है, बल्कि उसकी गहराई भी मौजूद है. वे प्रेम की तीव्रता को जितनी गहराई से महसूस करते हैं, उसी तीव्रता से उसे पाठकों तक पहुंचाने में भी सफल होते हैं. उनकी लिखी एक बहुत प्रसिद्ध ग़ज़ल है जिसे जगजीत सिंह ने अपनी सुरमई आवाज़ में पिरोया था. जिन पाठकों ने वह ग़ज़ल सुनी है, इसे पढ़ते हुए बरबस ही उनके कानों में वह आवाज़ गूंजने लगेगी. उसी ग़ज़ल के कुछ हिस्से -

‘प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है / नये परिन्दों को उड़ने में वक़्त तो लगता है

जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था / लंबी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है

गांठ अगर लग जाए तो फिर रिश्ते हों या डोर / लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है

हमने इलाजे-ज़ख़्मे-दिल तो ढूंढ़ लिया लेकिन / गहरे ज़ख़्मों को भरने में वक़्त तो लगता है.’

बदलते दौर के चलन से ग़ज़लकार कितना आहत है, यह बात हस्ती साहब की ग़ज़लों में खूब दिखाई देती है. इंसानियत का खून, हद दर्जे के स्वार्थ, झूठ और फरेब की इस दुनिया में उनका दिल जैसे ज़ार-ज़ार रोता है. वे चाहते हैं कि इस दिखावे भरी दुनिया में लोगों को सिर्फ बाहरी रौशनी और शोर-शराबे में ही नहीं खो जाना चाहिए, बल्कि अपने भीतर भी एक नज़र रखनी चाहिए. इसी मिजाज़ की एक ग़ज़ल -

‘लड़ने की जब से ठान ली सच बात के लिए / सौ आफ़तों का साथ है दिन-रात के लिए

अब है फ़जूल वक़्त कहां आदमी के पास / दर और कोई ढ़ूंढ़िए जज़्बात के लिए

ऐसा नहीं है कि साथ निभाते नहीं हैं लोग / आवाज़ दे के देख फ़सादात के लिए

इल्ज़ाम दीजिए न किसी एक शख़्स को / मुजरिम सभी हैं आज के हालात के लिए

उसने उसे फिज़ूल समझकर उड़ा दिया / बरबाद हो चला हूं जिस बात के लिए.’

हस्तीमल ‘हस्ती’ ईश्वर की सत्ता को स्वीकारते भी हैं और ठीक उसी समय उस पर तंज करने का हौसला भी दिखाते हैं. वे पूरी तरह से बेखौफ होकर अपने ईश्वर के साथ संवाद करते हैं. एक तरफ से ईश्वर से शिकायत करते हैं कि जब उसके हाथ में था, तो उसने सारी दुनिया के इंसानों को एक जैसा अच्छा क्यों नहीं बनाया. दूसरी तरफ वे इंसानों के इबादत के तरीकों पर भी सवाल करते हैं. इन्हीं अहसासों के चंद शेर -

‘जब तूने ही दुनिया का ये दीवान लिखा है / हर आदमी प्यारी सी ग़ज़ल क्यों नहीं होता’

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‘हस्ती’ मन्दिर-मस्जिद में हम जो कुछ करके आते हैं / रब की नज़र में हो न इबादत ऐसा भी हो सकता है’

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मंदिर पर भी पहरे हैं / ईश्वर किससे डरता है

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एक सच्ची पुकार काफी है / हर घड़ी क्या ख़ुदा-ख़ुदा करना

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आते-जाते डर लगता है / ये राजा का घर लगता है

धरती के इन भगवानों से / ईश्वर को भी डर लगता है

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अस्ल में मुजरिम जो थे घर में ख़ुदा के जा छुपे / अब मसीहा रह गये हैं सूलियों के वास्ते’

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सियासत वह शह है जो इसानों के दम पर ही अपनी जड़ें फैलाती है. लेकिन विडंबना यह है कि उन्हीं इंसानों का खून चूसकर वह फलती-फूलती भी है. हस्तीमल इस विडंबना को बखूबी पहचानते हैं और उसके लिए कहीं न कहीं वे जनता को ही दोषी भी ठहराते हैं. वे कहते हैं -

‘सारे तुग़लक़ चुन-चुन कर / हमने बनाई है सरकार

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है उन्हीं के हाथ में मेरे वतन की रहबरी / जो हैं ज़िम्मेदार इन बरबादियों के वास्ते

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कुछ नये सपने दिखाए जाएंगे / झुनझुने फिर से थमाए जाएंगे

आग की दकरार है फिर से उन्हें / फिर हमारे घर जलाए जाएंगे

क्या ख़बर थी अस्ल सिक्कों की तरह / खोटे सिक्के भी चलन में आएंगे

आग अंदर की मियां दहकाइए / आप वरना ख़ाक होते जाएंगे

हाथ हर युग में कटेंगे ‘हस्ती’ जी / ताज जब-जब भी बनाए जाएंगे.’

यहां एक तरफ ग़ज़लकार की नज़र देश के क्रूर होते राजनीतिक हालात, समाज के पतन, खोखली होती सामाजिक संवेदनाओं पर है और ठीक इसी समय वह ममता के मुलायम अहसास से भी भीगा हुआ है. मां को लेकर कई प्यार भरे शेर इस संग्रह में हैं. एक बानगी -

‘मां को देखा तो ये लगा मुझको / जैसे आयत कोई पढ़ी है अभी

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रह के देखो थोड़ा-सा तो मां के पास / कौन कहता है ख़ुदा दिखता नहीं’

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आ गया था थाली में स्नेह सारी दुनिया का / मेरा भाई जब खाना मां के हाथ का लाया’

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हस्तीमल ‘हस्ती’ की ग़ज़लों में प्रेम के व्यक्तिगत अहसास से लेकर सामूहिक प्रेम तक की काफी सशक्त, गहरी और संवेदी अभिव्यक्ति है. इन ग़ज़लों में हालात पर खीज है, आक्रोश है, गुस्सा है तो उन्हें ललकारने की कूव्वत भी है. बहुत कम शब्दों में वे सच्चाई, ईमानदारी, समझदारी और सादगी की बात करते हैं. वे सियासत के नरभक्षी दौर पर भी तीखा तंज कसते हैं.

कुल मिलाकर ये ग़ज़लें पूरे दिल से लिखी गई हैं. भावों और संवेदना की जिस तीव्रता को ग़ज़लकार ने महसूस किया होगा, वह पाठकों तक भी उसी शिद्दत से पहुंचती है. गोपालदास ‘नीरज’ के शब्दों में ‘उनकी (हस्ती की) ग़ज़लें ऐसी हैं कि तुरन्त होंठों पर बैठ जाती है. उनकी ग़ज़लों में उस्तादाना रंग हैं.’ ग़ज़ल प्रेमियों के लिए यह एक अच्छा संग्रह है.