कर्नाटक की राजनीति अजीब से अंतरद्वंद से गुजर रही है. राज्य में जेडीएस (जनता दल-धर्मनिरपेक्ष) फिलहाल कांग्रेस के समर्थन से सरकार चला रही है. कांग्रेस ने जेडीएस को अपनी तरफ से कई बार आश्वस्त किया है कि दोनों दलों के गठजोड़ को निकट भविष्य में काेई ख़तरा नहीं है. दोनों पार्टियां 2019 का लोक सभा चुनाव भी मिलकर लड़ेंगी. यहां तक कि राज्य की लोक सभा सीटों के बंटवारे पर भी दोनों दलों के बीच सैद्धांतिक तौर पर सहमति बन जाने की ख़बरें आ रही हैं. बताया जा रहा है कि राज्य की 18 लोक सभा सीटों पर कांग्रेस और 10 पर जेडीएस चुनाव लड़ने को राज़ी हो गई हैं. ख़बर है कि इस बाबत सीधे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जेडीएस नेता और मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी से बात की है. इसके बाद कुमारस्वामी ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उपयुक्त उम्मीदवार भी बताया.

इस सबके बावज़ूद बीच-बीच में कुछ ऐसा हाे जाता है, कोई ऐसी ख़बर आ जाती है जिससे पूरे किए-कराए पर पानी फिरता दिखता है. जैसे 14 जुलाई को मुख्यमंत्री कुमारस्वामी को सम्मानित करने के लिए उनके पार्टीजनों ने एक कार्यक्रम रखा था. इसमें पहले तो सब ठीक-ठाक चला. लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कुमारस्वामी अचानक बच्चों सरीखे रोने लगे. कहने लगे, ‘आप (कार्यकर्ता) खुश होंगे कि आपका भाई मुख्यमंत्री बन गया है. लेकिन मेरे लिए यह बहुत सुखद नहीं है. मैं मौज़ूदा हालात से खुश नहीं हूं. मैं जिस स्थिति से गुजर रहा हूं वह हलाहल (ज़हर) पीने जैसी है. बस, मैं अपना दर्द किसी से कह नहीं पा रहा हूं.’

इसके बाद तरह-तरह के विश्लेषणों का दौर चला. इनमें लिखा गया कि कुमारस्वामी आंसुओं की राजनीति कर रहे हैं. यह भी कि उन्हें पता है कि उनकी सरकार की उम्र लंबी नहीं है, इसलिए वे लगातार ख़ुद को मज़बूर दिखाकर मज़बूत होने की कोशिश कर रहे हैं. समर्थकों की सुहानभूति बटोरने की कोशिश कर रहे हैं. ये विश्लेषण कुछ हद तक सही भी हो सकते हैं. लेकिन इससे यह आशंकाएं भी पुख़्ता होती हैं कि कुमारस्वामी कांग्रेस के समर्थन को लेकर अब भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं.

अब कुमारस्वामी के पिता एचडी देवेगौड़ा की नाराज़गी की भी ख़बरें

कुमारस्वामी के असंतोष तक तो फिर भी ठीक है. वे ऐसी गठबंधन सरकार के मुखिया हैं जिसमें ख़ुद उनके ही पास ज़्यादा संख्या बल नहीं है. इस मामले में उन्हें समर्थन देने वाली पार्टी यानी कांग्रेस भारी है. ऐसे में स्वाभाविक तौर पर कांग्रेस के दबाव का उन्हें सामना करना ही पड़ रहा होगा. लेकिन उनके पिता पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा का क्या? वे तो तब से ही कांग्रेस से गठजोड़ के पक्षधर रहे हैं जब से राज्य विधानसभा के चुनाव नतीज़े आए हैं. बल्कि कहा तो यह भी जा रहा है कि कुमारस्वामी देवेगौड़ा के ही दबाव में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का समर्थन लेने के लिए राज़ी हुए. पर अब आलम यह है कि देवेगौड़ा भी राज्य कांग्रेस के कुछ नेताओं से नाराज़ बताए जाते हैं.

ख़बरों की मानें तो संसद के मानसून सत्र के दौरान देवेगौड़ा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मिले थे. उन्होंने उनसे शिकायत की कि उनके पुत्र कुमारस्वामी की सरकार के रास्ते में कांग्रेस कुछ नेता अड़चन बन रहे हैं. साथ ही उन्होंने राहुल से आग्रह किया वे अपने स्तर पर इन नेताओं की नकेल कसें, नहीं तो गठबंधन आगे चलना मुश्किल हो जाएगा. बात यहीं नहीं रुकी. बताया जाता है कि उन्हाेंने ऐसी शिकायत यूपीए (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) की अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी की है. हालांकि अब तक उनकी इस शिकायत निराकरण हाेने की ख़बर नहीं है.

कुमारस्वामी की परेशानी कौन?

सीधा सा सवाल है कि आख़िर कर्नाटक के इस सियासी गठजोड़ में ऐसा कौन सी दिक्क़त है जिससे कभी कुमारस्वामी को रोना पड़ता है तो कभी कांग्रेस नेतृत्व से आरज़ू-मिन्नत करनी पड़ती है. तिस पर भी बात न बने तो उन्हें अपने पिता से कांग्रेस नेतृत्व के पास सिफारिश लगवानी पड़ती है. फिलहाल इसका एक ज़वाब है. पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता सिद्धारमैया. राज्य में कांग्रेस ने उन्हीं के नेतृत्व में इस बार का विधानसभा चुनाव लड़ा था. इसके नतीज़े में जनता ने उनकी सीटें कम कर दीं. सरकार नहीं बना पाए. लेकिन कांग्रेस ने उनकी ताक़त बढ़ा दी. इन्हें ‘सरकार का भी सरकार’ बना दिया. सिद्धारमैया इस वक़्त जेडीएस-कांग्रेस गठबंधन की समन्वय समिति के मुखिया हैं.

इतना ही नहीं कांग्रेस अध्यक्ष ने अभी हाल में सिद्धारमैया को अपनी टीम में शामिल किया है. उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी में स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाया गया है. यानी अब वे राष्ट्रीय नेतृत्व के फैसलों को भी वे प्रभावित करने की स्थिति में होंगे. इस तरह तिहरी ताक़तवर भूमिका (कर्नाटक में कांग्रेस विधायक दल के नेता भी हैं) में सिद्धारमैया अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी कुमारस्वामी के लिए कहीं ज़्यादा ख़तरनाक हो गए हैं.

यही कुमारस्वामी और उनके पिता देवेगाैड़ा की चिंता की सबसे बड़ी वज़ह है. ख़ास तौर पर 2019 के लोक सभा चुनाव के मद्देनज़र जिसमें कांग्रेस ने अपनी तरफ से साफ कर दिया है कि वह राज्य में लोक सभा चुनाव के लिए भी सिद्धारमैया के नेतृत्व में ही मैदान में होगी.

कुमारस्वामी की परेशानी बढ़ाने में सिद्धारमैया कोई कसर भी नहीं छोड़ रहे

कुमारस्वामी की चिंता जायज़ भी लगती है क्योंकि सिद्धारमैया भी उनकी परेशानी बढ़ाने के लिहाज़ से कुछ न कुछ करते ही रहते हैं. जैसे कि जब कुमारस्वामी राज्य का बजट फिर पेश करना चाहते थे तो सिद्धारमैया ने इसका विरोध कर दिया. बंद दरवाज़े से खुला विरोध. वह इस तरह कि चुनाव बाद वे उज्जिरे के शांतिवन में स्थित योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा अस्पताल में स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे. वहीं जब उन्हें राज्य का बजट फिर किए जाने की योजना को कांग्रेस नेतृत्व से मंज़ूरी मिलने का पता चला तो उन्होंने मिलने आए समर्थक नेताओं से बातचीत के दौरान इस पर अपनी नाख़ुशी साफ ज़ता दी. बातचीत रिकॉर्ड हो गई और फिर मीडिया के माध्यमों में सार्वजनिक भी हो गई.

हालांकि सियासी जानकार बेहतर जानते हैं कि राजनीति में अपने आप तो कुछ होता नहीं. लिहाज़ा इस घटना ने भी असर दिखाया और जब कुमारस्वामी ने बजट फिर पेश किया तो इसमें अधिकांश हिस्सा उस बजट का रखा जिसे सिद्धारमैया ने बीते मार्च में पेश किया था. इसके बाद भी सिद्धारमैया का मन नहीं भरा. वे लगभग हर सप्ताह एक न एक पत्र मुख्यमंत्री कुमारस्वामी को लिख भेजते हैं. इसमें कोई न कोई मांग होती है. मसलन- अभी हाल में ही लिखे एक पत्र में उन्होंने मुख्यमंत्री से अपेक्षा जताई कि डीज़ल-पेट्रोल पर लगाया कर वापस ले लिया जाए. साथ ही गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों को दिए जाने वाले चावल की मात्रा दो किलो घटा दी जाए.

बताया जाता है कि सिद्धारमैया बीते 45 दिनों नौ पत्र कुमारस्वामी को लिख चुके हैं. शायद यही वह दिक्क़त है जिसके चलते कुमारस्वामी ने अपने काम को रोते हुए ‘ज़हर’ सा क़रार दिया था. वैसे जानकारों की मानें तो सिद्धारमैया यह सब कर के यह बताना और ज़ताना चाहते हैं कि मुख्यमंत्री कोई भी हो, असल में गठबंधन ही नहीं सरकार के भी बॉस वही हैं. ठीक वैसे ही जैसे धरम सिंह के नेतृत्व में बनी कांग्रेस की सरकार के जमाने में उनके गुरु एचडी देवेगौड़ा किया करते थे. उस समय कांग्रेस की सरकार को जेडीएस समर्थन दे रही थी और देवेगौड़ा समन्वय समिति के मुखिया थे. लेकिन वे अक़्सर ही मुख्यमंत्री एन धरम सिंह काे पत्र लिखा करते थे. ये पत्र में जाने-अनजाने में मीडिया में लीक भी होते थे.

कुमारस्वामी से प्रतिद्वंद्विता के चलते जेडीएस छोड़ कांग्रेसी नेता बने सिद्धारमैया अब वही कहानी दोहरा रहे हैं. जानकारों की मानें तो बात इससे आगे भी है. बताया जाता है कि अगले साल का लोक सभा चुनाव सिद्धारमैया अकेले लड़ना चाहते हैं. यानी वे नहीं चाहते कि कांग्रेस उसमें जेडीएस के साथ गठबंधन करे. उनका मानना है कि इससे कांग्रेस का संगठन राज्य में कमजोर होगा. उन्होंने नई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक के दौरान अपना यह विचार पार्टी अध्यक्ष को भी बता दिया है. यह संभावना तो अलबत्ता कम ही है कि कांग्रेस नेतृत्व सिद्धारमैया का यह सुझाव पूरी तरह से मान लेगा. लेकिन यह हो सकता है कि जेडीएस को उसकी अपेक्षा से काफी कम सीटें दे.

यही कारण है कि जेडीएस ने बीच-बीच में यह भी कहना शुरू किया है कि कांग्रेस के साथ ‘2019 के लोक सभा चुनाव के लिए गठबंधन इस पर निर्भर करेगा कि वह हमसे कैसा बर्ताव करती है.’ यही वह कारण भी है जिसके चलते कुमारस्वामी अक़्सर ‘सुहानुभूति की सियासत’ करते भी दिखते हैं. कभी रो कर तो कभी बेचारगी ज़ताकर. पर सवाल यह है कि उनके इस तरह के दांव क्या उन्हें कोई सियासी मुनाफ़ा दिला पाएंगे? या फिर सिद्धारमैया उनके पिता से सीखे सियासी दांव-पेंच से उन्हें ही चित करेंगे? ज़वाब वक़्त के साथ ही मिल पाएंगे.