एक सुविचार बचपन में कभी पढ़ा था. शायद गौतम बुद्ध का है. ‘तीन चीजें ज्यादा देर तक नहीं छुप सकतीं – सूरज, चंद्रमा और सत्य.’ फिर लड़कपन में फुजैल जाफ़री का एक शेर पढ़ा – ‘जहर मीठा हो तो पीने में मजा आता है, बात सच कहिए मगर यूं कि हकीकत न लगे.’

अकीरा कुरोसावा न तो ईश्वर थे न दार्शनिक-शायर. लेकिन ‘सच’ से जुड़े ऐसे स्थापित मानकों की उन्होंने बखिया उधेड़ दी थी, जब 1950 में ‘राशोमोन’ को दुनिया के सामने पेश किया था. एक कत्ल के बारे में चार मुख्तलिफ, अंतर्विरोधी और सच लगने वाली कहानियां बयां करने वाले चार गवाहों की मदद लेकर उन्होंने न सिर्फ सत्य को सदैव के लिए छिपा दिया था – आज भी सिनेप्रेमी चर्चा करते हुए आपको मिलेंगे कि आखिर किस गवाह का वर्जन सत्य था – बल्कि ऊपर लिखे शेर का जैसे दूसरा मिसरा तक बदल कर कुछ यूं कर दिया था –‘बात सच कहिए या झूठ, मगर यूं कि हकीकत लगे!’

दार्शनिक से लेकर संजीदा शायर तक अक्सर लिखते रहे हैं कि सच क्या है, नजरिया भर ही तो है. कुछ स्थायी से सच छोड़कर, जैसे सूरज, चंद्रमा, रात, पानी, जीवन फानी, सबके अपने-अपने सच होते हैं. सार्वभौमिक सत्य इस दुनिया में कम होते हैं. लेकिन, सिनेमा के परदे पर इस अलहदे विचार की अभिव्यक्ति बेहद मुश्किल काम है. वैचारिक स्तर पर ये जितनी गहराई लिए हुए है, उस तक सिनेमा के माध्यम से पहुंच पाना आसान नहीं है. चूंकि आज ढेर सारी फिल्में हम इस विचार के आसपास की देख चुके हैं - जिनमें किसी हत्या के कई वर्जन दिखाए जाते हैं और अंत में नायक सत्य को तलाश ही लेता है - इसलिए इसकी ‘सही’ सिनेमाई भाषा तलाशने की जद्दोजहद से हम वाकिफ नहीं हैं. लेकिन इससे जुड़ा एक दिलचस्प इतिहास है, जिसकी गंगोत्री जापानी फिल्म ‘राशोमोन’ है.

मास्टरपीस ‘राशोमोन’ जब 1950 में जापान में रिलीज हुई थी तो जापानी समीक्षकों को उसमें कुछ खास नजर नहीं आया था. जिस छोटे से जापानी फिल्म स्टूडियो ने इसमें पैसा लगाया था उसके मालिक को फिल्म इतनी नापसंद आई थी कि उसने क्रेडिट्स में से अपना नाम हटा लिया. लेकिन जब 1951 में सबसे पहले वेनिस फिल्म फेस्टिवल और फिर अमेरिका में यह रिलीज हुई तो पश्चिम के दर्शक और निर्देशक अवाक रह गए.

यह पहली बार था कि जापानी सिनेमा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरी छाप छोड़ रहा था और अकीरा कुरोसावा की फिल्मों से पहली बार वेस्ट मिल रहा था. बाद में चलकर तो कुरोसावा की कई फिल्मों को पश्चिम में पसंद और रीमेक किया गया (‘सेवन समुराई’, ‘द हिडन फोर्ट्रेस’, ‘स्ट्रे डॉग’), उनकी फिल्मों से प्रभावित होकर महान अमेरिकी फिल्मकारों तक ने कहानियां लिखीं (जॉर्ज लुकस की ‘स्टार वॉर्स’), उनकी सिनेमाई तकनीकों और नेरेटिव टूल्स को बेहिसाब फिल्मों ने उपयोग किया, और सिनेमा की पढ़ाई कराने वाले अंतरराष्ट्रीय संस्थानों ने उनकी फिल्में दिखा-दिखाकर नौजवानों को फिल्ममेकिंग के गुर सिखाए. ऑस्कर्स ने उन्हें 1990 में ऑनरेरी ऑस्कर से सम्मानित भी किया.

लेकिन ‘राशोमोन’ के वक्त पहली बार पश्चिम और उसकी ही तरह वैश्विक सिनेमा पर दबदबा रखने वाले हॉलीवुड ने कहानी कहने का वो अंदाज देखा, जिसे बाद में चलकर एक महान सिनेमाई तकनीक ‘राशोमोन इफेक्ट’ के नाम से जाना गया. यहां उन्हें सिर्फ जापानी कलाकारों के अभिनय और पीरियड फिल्म के माध्यम से एक गुजरे जापानी जमाने की संस्कृति से रूबरू होने का मौका नहीं मिला था. बल्कि वे एक मौलिक व हैरान करने वाली सिनेमेटोग्राफी, ब्लैक एंड व्हाइट इमेजों पर धूप-छांव का अद्भुत खेल और केवल तीन मुख्य जगहों पर घटित होने वाली ऐसी कहानी जिसके डीएनए में ही विरोधाभास मौजूद था, से भी अभिभूत हो रहे थे. हॉलीवुड और वेस्ट ने इससे पहले फ्लैशबैक-युक्त कहानियों का ऐसा अंदाज-ए-बयां नहीं देखा था. 1952 में ‘राशोमोन’ को ऑनरेरी ऑस्कर से भी नवाजा गया जिसे बाद में चलकर ऑस्कर फॉर बेस्ट फॉरन लेंग्वेज फिल्म के नाम से जाना जाने लगा.

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डेढ घंटे की ‘राशोमोन’ में पास ही के जंगलों में एक समुराई की हत्या हो जाती है और घटनास्थल पर मौजूद उसकी पत्नी, एक जंगली डाकू, एक लकड़हारा और समुराई खुद आत्मा बनकर न्यायालय में गवाही देने आते हैं. चारों एक ही घटना के चार अलग-अलग और विरोधाभासी व खुद को सही दिखाने वाले विवरण पेश करते हैं और सत्य अंत तक ठगा खड़ा रहता है. किसी को पता नहीं चल पाता – आज तक भी! – कि समुराई को किसने और किस हथियार से मारा. लेकिन इसलिए नहीं कि दर्शक फिल्म समझने में नाकाम रहते हैं, बल्कि इसलिए कि यह फिल्म बनाने के पीछे अकीरा कुरोसावा का मकसद ‘अंतिम सच’ दिखाना था ही नहीं. सच की तलाश था ही नहीं. मकसद सच के अलग-अलग संस्करण पेश करना था.

अपने इस फलसफे को मजबूत मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने कहानी में हर फितरत के पात्र रखे. कपटी बदमाश पात्र रखा (जंगली डाकू ताजोमारू), मासूम नजर आने वाली फिल्म की एकमात्र महिला को नायिका बनाया जिसने कि कई महिला पात्र एक साथ निभाए (पत्नी), खुद को सच्चा दिखाने वाले एक आम आदमी को गवाह बनाया जिसका कि घटना और हत्या से कोई लेना-देना नहीं था (लकड़हारा), और जो समुराई मारा गया उसे तक आत्मा बनाकर वापस बुलाया ताकि अंतिम सच का पलड़ा भारी रह सके. लेकिन कुरोसावा का कमाल देखिए, फिल्म खत्म होने के बाद आप उसकी बात पर भी यकीन करने में हिचकते हैं जिसकी खुद हत्या हुई थी, और उस तटस्थ से लगते लकड़हारे पर भी शक करते हैं जिसने सबसे पहले लाश को जंगल में देखा था!

यही ‘राशोमोन’ इफेक्ट है, जिसे दुनियाभर के सिनेमा की अनगिनत फिल्में 1950 के बाद से ही अपने-अपने हिसाब से इस्तेमाल करती आई हैं और कल भी करती रहेंगी. इसी सिनेमाई तकनीक ने दुनियाभर के सिनेमा को सच के कई विरोधाभासी या झूठे संस्करण दिखाने वाली कहानियों को बयां करने का शऊर दिया था, उन्हें कैसे मुख्तलिफ अंदाज में कहना है यह सिखाया था, और ऐसी सिनेमाई कहानियां इस दर्जे की कलात्मक भी हो सकती हैं, यह भी वेस्ट को पहली बार बताया था.

अपने मूल और शुद्ध रूप में वैसे तो इस महान सिनेमाई तकनीक का काम किसी भी फिल्म में सच के अलग-अलग नजरिए पेश भर करना है. मुख्तलिफ पात्रों की मदद लेकर विरोधाभासी, खुद का स्वार्थ साधने वाले ऐसे वर्जन दिखाना है जिसे लोग सच मानें और फिल्म को ऐसे ही सूक्ष्म विरोधाभास देकर खत्म कर देना है. अंतिम सच की तलाश नहीं करनी है. लेकिन बदलते वक्त के साथ फिल्मों ने राशोमोन इफेक्ट को सच की जीत दर्शाने वाले हथियार के तौर पर भी इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. सच लगते कई सारे अंतर्विरोधी वर्जन दिखाने के बाद फिल्म के मुख्य पात्र अंतिम सच तक पहुंचने लगे. एक वर्जन सही होने लगा और बाकी सारे झूठे हैं, यह आसानी से फिल्म के अंत में स्थापित होता गया.

हाल के वर्षों में डेविड फिंचर ने अपनी आलातरीन अमेरिकी फिल्म ‘गॉन गर्ल’ (2015) में इस तकनीक को दो संस्करणों के साथ उपयोग किया था. एक कम प्रसिद्ध लेकिन दिमाग के परखच्चे उड़ा देने वाली (सच में!) साइंस-फिक्शन फिल्म ‘प्रीडेस्टिनेशन’ (2014) ने टाइम-ट्रेवल थीम में इसे अलग अंदाज में पिरोया था. 2016 में आई कोरियाई मनोवैज्ञानिक थ्रिलर फिल्म ‘द हैंडमेडन’ ने भी दिमाग की खपच्चियां उड़ाने के अलावा राशोमोन इफेक्ट का बेहद उम्दा इस्तेमाल प्रेम की आसक्ति दिखाने में किया था. 1995 में केविन स्पेसी की बेमिसाल सस्पेंस व मिस्ट्री फिल्म ‘द यूजवल सस्पेक्ट्स’ ने तो इस तकनीक को इतने अलहदे अंदाज में उपयोग किया कि आगे चलकर बनने वाली कई सस्पेंस/मिस्ट्री/थ्रिलर जॉनरों की फिल्मों ने स्पेसी की इसी फिल्म को गीता-कुरान मान लिया.

हिंदी में ‘युवा’ और ‘दृश्यम’ इस तकनीक के प्रभाव में रहीं और उनके अलावा 2015 में आई बेहद उम्दा ‘तलवार’ ने भी जोर-शोर से प्रचारित कर राशोमोन इफेक्ट का उपयोग आरुषि हत्याकांड की उलझी कहानी दिखाने के लिए किया. लेकिन एक घटना के तीन संस्करण दिखाने के बावजूद एक संस्करण अंतिम सच का था और शुद्धतावादियों ने इस बात पर उंगलियां भी उठाईं कि फिल्म के लेखक विशाल भारद्वाज ने असली राशोमोन इफेक्ट का उपयोग नहीं किया है. लेकिन राशोमोन इफेक्ट वक्त के साथ इतने सारे बदलाव खुद में समेट चुका है, सिनेमा के साथ खुद भी इतना आगे बढ़ चुका है, कि कम ही फिल्में आज के वक्त में उसके शुद्ध रूप को इस्तेमाल करती हैं.

यह समझना वैसे भूल होगी कि ‘राशोमोन’ को विश्व की महानतम फिल्मों में एक सिनेमा तकनीक को ईजाद करने की वजह से गिना जाता है. ‘राशोमोन’ सिनेमा की हर महानतम फिल्मों वाली सूची में शामिल मिलती है क्योंकि आज भी इस मनोरंजक फिल्म को देखने पर आप नुक्ताचीन नहीं हो सकते, और आज से पहले भी कोई हो नहीं पाया था. चाहे बरसात के दृश्य हों, खुले में लगे धूप-छांव युक्त न्यायालय के सीन हो, या फिर चेहरे के टाइट क्लोज-अप शॉट्स. फिल्म का शिल्प इतना मजबूत था कि ज्यादातर फ्रेम पेंटिंग सरीखे मालूम होते हैं. एडीटिंग इतनी कुशल कि कारीगरियों से लैस आजकल के कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर्स और कुशाग्र एडीटरों को सबक सिखा जाएं. जंगल में फिल्माए गए मुश्किल दृश्य और वहीं हुई तलवारबाजी इसके उदाहरण हैं.

कैमरावर्क भी इतना अद्भुत कि कहते हैं कि जब वेस्ट के निर्देशकों ने पहली बार फिल्म देखी तो शॉट लेने के नायाब तरीके देखकर हैरत में पड़ गए. ‘राशोमोन’ मुख्यत: तीन जगहों पर घटती है – खुला न्यायालय, टूटा-फूटा राशोमोन गेट और जंगल. इसमें से जंगल में फिल्माए गए दृश्यों के लिए कोई सेट नहीं लगाया गया था बल्कि कुरोसावा ने प्राकृतिक रोशनी में इन्हें जंगल में ही शूट किया. ऊबड़-खाबड़ जंगल, पेड़ और झाड़ियां होने के बावजूद जिस तरह कैमरा इन सबके बीच चलायमान बना रहा और दृश्यों को काटा गया वो देखने लायक खूबसूरती है. जूम-इन होने से लेकर अलग तरीके से किरदार से दूर जाने तक और कैमरे को दिलचस्प अंदाज में ऊपर से नीचे व दाएं से बाएं पैन करने तक में कुरोसावा के सिनेमेटोग्राफर ने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.

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फिल्म की शुरुआत में ही एक लंबा सीन सिर्फ लकड़हारे के जंगल में तेज रफ्तार से चलते चले जाने का है. सीन लगभग साइलेंट है क्योंकि कुरोसावा को मूक फिल्में बेहद पसंद थीं और उनकी ये पसंद ‘राशोमोन’ के निर्णायक दृश्यों में संवाद की जगह साइलेंस के उम्दा उपयोग से भी समझी जा सकती है. खैर, जंगल जाते उस सीन में कैमरा हर दिशा से इतने शानदार शॉट्स लेता है कि दो-ढाई मिनट तक स्क्रीन पर कुछ खास न होना अखरता नहीं, क्योंकि कैमरावर्क आपको विस्मित कर रहा होता है.

पुराने वक्त में सिनेमेटोग्राफर सीधे सूरज को भी शूट नहीं करते थे क्योंकि उन्हें डर रहता था कि कहीं कैमरे का लैंस मैग्नीफाइंग ग्लास की तरह काम करके कैमरा जला न दे. और साथ ही उस पर आंख टिकाए बैठे कैमरामैन को आंख न गंवानी पड़े. लेकिन ‘राशोमोन’ के सिनेमेटोग्राफर ने यह प्रतिबंधित काम भी किया था और वे दृश्य देखकर भी पश्चिम हैरान हुआ था. फिर तलवारबाजी के कई सीक्वेंस के दौरान बीच में आते पेड़, ऊंची-नीची जमीन, रोशनी का कम-ज्यादा होना जैसी मुश्किलात इतने सधे हाथों से संभाली गईं कि यकीन करना मुश्किल है कि हम अभी तक आज से 68 साल पुरानी किसी फिल्म की तकनीकी गुणवत्ता का गुणगान कर रहे थे.

अजर-अमर फिल्मों का यही है. वे कभी पुरानी नहीं पड़तीं. क्लासिक की क्लास बनी रहती है. अंतिम सत्य यही है!

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