विनायक दामोदर सावरकर ने जब स्वेच्छा से अन्न-जल का त्याग कर अपनी जान दी थी, तो उसे उन्होंने ‘आत्मार्पण’ का नाम दिया था. अपने इस फैसले से लगभग डेढ़ साल पहले जुलाई, 1964 में एक मराठी मासिक ‘सह्याद्रि’ में उन्होंने इस पर एक लेख भी लिखा था, जिसका शीर्षक था- ‘आत्महत्या आणि आत्मार्पण’. इस लेख में उन्होंने आत्महत्या और आत्मार्पण का भेद बताते हुए अतीत के कई उदाहरण दिए थे, जिनमें प्रसिद्ध मीमांसक और बौद्ध विद्वान कुमारिल भट्ट, चैतन्य महाप्रभु, संत ज्ञानेश्वर, समर्थ रामदास, संत एकनाथ, संत तुकाराम आदि द्वारा स्वेच्छा से अग्नि समाधि, जल समाधि या उपवास कर अपना आत्मार्पण करने का उल्लेख किया था. सावरकर द्वारा ‘आत्मार्पण’ किए जाने के लगभग 16 वर्ष बाद संत विनोबा ने भी इसी प्रकार अन्न-जल का त्यागकर अपनी मृत्यु को स्वेच्छा से ग्रहण किया था. विनोबा की मृत्यु को भी ‘प्रायोपवेश’ और ‘संथारा’ कहा गया.

प्रायोपवेश यानी अन्न-जल का परित्याग कर स्वेच्छा से अपनी जान देना. जैन दर्शन में इसे ‘संथारा’ और ‘सल्लेखना’ भी कहा जाता है. इस प्रथा के अनुसार जब किसी व्यक्ति को लगता है कि रोग या बुढ़ापा इत्यादि के चलते अब उसकी मृत्यु निकट है, तो वह धीरे-धीरे अपना आहार कम करता जाता है और बाद में पूरी तरह बंद करके मृत्यु को अपनाता है. इस दौरान उसे कई नियमों का पालन करना पड़ता है जैसे - उसके मन में जीने की लेशमात्र भी इच्छा नहीं रहनी चाहिए, भूख या पीड़ा की वजह से वह जल्दी मरने की इच्छा न रखे, उसे अपने दोस्तों या परिजनों के प्रति कोई मोह न जागे, वह अपने सुख के दिनों को याद न करे और आगे भी किसी प्रकार के भोग-विलास की इच्छा न रखे.

माना जाता है कि सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने केवल 42 साल की अवस्था में श्रवणबेलगोला में इसी सल्लेखना के जरिए अपनी मृत्यु का वरण किया था. पिछले कुछ समय से संथारा को भी एक प्रकार की ‘आत्महत्या’ करार देकर इसकी आलोचना की जाती रही है. कुछ लोग इसे धार्मिक अंधविश्वास से भी जोड़ते रहे हैं. जबकि इसके समर्थन में यह तर्क दिया जाता रहा है कि जिस व्यक्ति ने स्वस्थ अवस्था में समाज की भरपूर सेवा करते हुए अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर लिया है और अब वह आईसीयू में वेंटिलेटर पर पड़ा-पड़ा अपनी मौत का इंतजार कर रहा है, तो इससे अच्छा है कि वह स्वेच्छा से बिना किसी दबाव में अपनी जान देना चाहे तो उसे ऐसा करने देना चाहिए.

यह तो हुई भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की बात. लेकिन आत्महत्या और इससे जुड़े धार्मिक अंधविश्वासों का दुनियाभर में एक लंबा इतिहास रहा है. इसके अलावा समय-समय पर दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक भी अपने-अपने नज़रिए से इसे समझने की कोशिश करते रहे हैं. लोग आत्महत्या क्यों करते हैं? आत्महत्या नैतिक या मानवीय रूप से कितनी उचित या अनुचित है? आत्महत्या क्या मनुष्य की व्यक्तिगत आज़ादी होनी चाहिए? क्या यह वास्तव में जीवन और संसार के दुःखों से मुक्ति का विकल्प है? क्या विशेष धार्मिक मान्यता वाले समूहों द्वारा सामूहिक रूप से आत्महत्या करना उनकी धार्मिक स्वतंत्रता मानी जानी चाहिए? क्या ऐसी आत्महत्याओं के लिए उकसाने वाले धर्मगुरुओं को इसकी इजाजत दी जा सकती है? क्या आत्महत्या की प्रवृत्ति एक मनोरोग नहीं है, जिसका उपचार होना चाहिए? आत्महत्या की प्रवृत्ति क्यों बढ़ रही है? शिक्षित और समृद्ध समाजों में भी खासकर युवाओं में इसकी अधिकता क्यों देखी जा रही है? ये सब कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनपर विचार होता रहा है और आगे भी किया जाना चाहिए.

ईसा से लगभग 100 वर्ष पूर्व यूनान में हुए दार्शनिक सिसरो ने ईसा से लगभग 300 वर्ष पूर्व हुए एक दार्शनिक हीगेसियस का जिक्र किया है. हीगेसियस के दर्शन पर बुद्ध के विचारों का प्रभाव माना जाता है. लेकिन जीवन के दुःखों के चित्रण में उसने इतनी अति कर दी कि उसके प्रभाव में आने वाले लोगों को जीवन से पूर्ण विरक्ति हो जाती थी. हीगेसियस की वक्तृता इतनी प्रभावशाली थी कि उसके संपर्क में आने वाला प्रायः आत्महत्या कर लेता था. अंत में स्थिति ऐसी बन गई कि अलेक्ज़ांद्रिया का शासक टॉलेमी उसे अपने राज्य से बाहर निकालने पर मजबूर हो गया. बाद में, आधुनिक समय में भी कई प्रसिद्ध दार्शनिकों ने आत्महत्या के पक्ष और विपक्ष में अपने विचार दिए.

यूनान के प्रथम इतिहासकार माने जाने वाले हेरोडोटस ने ईसा से करीब 450 ईसवी पूर्व कहा था, ‘जब जीवन बोझ की तरह हो जाता है, तो मृत्यु ही मनुष्य के लिए एक सहज आश्रय बन जाता है.’ जर्मन दार्शनिक शोपनहार ने हेरोडोटस के कथन को उचित मानते हुए यह कहा कि सर्वोच्च नैतिक स्वतंत्रता तो तभी हासिल हुई कही जाएगी जब मनुष्य को अपनी जान लेने की इच्छा पूरी करने की स्वतंत्रता होगी. शोपनहार का कहना था कि मूल बात है अपनी जीने और मरने की इच्छा की स्वतंत्रता. हमारे जीने की इच्छा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, लेकिन परिस्थितियां चूंकि बहुत ही कठिन और शक्तिशाली होती हैं और मनुष्य इतना शक्तिशाली नहीं होता कि हमेशा उससे जीत ही जाए.

इसी तरह चीन के समाज में आत्महत्या को स्वीकारने की संस्कृति पैदा होने के लिए कुछ हद तक कन्फ्यूशियस के सिद्धांतों को भी जिम्मेदार माना जाता है, जिन्होंने कहा था कि कुछ सदाचरणों में विफल रहना मृत्यु से भी बुरा है. आत्महत्या के समर्थकों में सबसे कारुणिक कहानी ऑस्ट्रियाई लेखक ज्यां एमेरी की है. एमेरी दर्शनशास्त्र के छात्र रहे थे और बाद में उन्हें नाजी यातना शिविर में कई वर्ष यातनाएं झेलनी पड़ीं. बाद में एमेरी ने 1976 में एक किताब लिखी जिसका नाम था- ‘ऑन सुसाइड : ए डिस्कोर्स ऑन वॉलंटरी डेथ’. इस पुस्तक में एमेरी ने ‘आत्महत्या’ की जोरदार वकालत की थी और इसे ही आज़ादी की सर्वोच्च अवस्था बताई थी. दो साल बाद यानी 1978 में एमेरी ने खुद भी आत्महत्या करके ही अपनी जान दी.

लेकिन आत्महत्या को स्वतंत्रता का जामा पहनाने की कोशिशों का दार्शनिक जगत में ही पर्याप्त विरोध भी हुआ है. प्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक अल्बैर कामू ने तो इतना तक कह दिया कि दर्शनशास्त्र में गंभीर चिंतन के लायक यदि वास्तव में कोई प्रश्न है, तो वह ‘आत्महत्या’ ही है. मनुष्य जीवन जीने लायक है या नहीं, यही दर्शनशास्त्र का मौलिक प्रश्न है और बाकी सारे प्रश्न इसी से निकलते हैं. कामू ने कहा था कि अपने जीवन में अर्थ और मकसद ढूंढ़ते हुए जब हमारी परिस्थिति ऐसी बन जाती है, जब न तो हमें ईश्वर के अस्तित्व होने या न होने का ठीक-ठीक जवाब मिल पाता है और न जीवन में अर्थ और मकसद की हमारी खोज ही पूरी हो पाती है, तो वह असहायता, वह निरर्थकता और निरुपायता ही हमें आत्महत्या के लिए प्रेरित करती है.

अन्य अस्तित्ववादी दार्शनिकों की तरह कामू भी जीवन की इस निरर्थकता के बावजूद मनुष्य को जिंदा रहने के लिए प्रेरित करते हैं. वे कहते हैं कि जो मनुष्य जीवन की इस अर्थहीनता को जान लेता है, वह लक्ष्यहीन, योजनाहीन, भविष्यहीन और आशाहीन जीवन जीता है और इसलिए हर प्रकार के अनुशासन या बंधन से मुक्त होकर स्वतंत्र जीवन जीता है. एक अन्य अस्तित्ववादी दार्शनिक ज्यां-पाल सार्त्र जीवन की निरर्थकता और शून्यता का समाधान इस रूप में देते हैं कि मनुष्य अपने आप में इतना चैतन्य है कि वह इसमें अर्थ और उद्देश्य भरकर इसे सार्थक बनाने के लिए स्वयं जिम्मेदार है और सक्षम है. इनके अलावा जॉन स्टुअर्ट मिल और इमैन्युअल कांट जैसे प्रसिद्ध दार्शनिकों ने भी आत्महत्या को अनैतिक और अमानवीय करार दिया था.

पिछले दिनों दिल्ली के बुराड़ी में एक ही परिवार के सभी 11 सदस्यों ने एक साथ आत्महत्या कर ली. अभी तक की जांच में सामने आया है कि वे किसी ‘बड़ तपस्या’ का अभ्यास कर रहे थे और ‘मोक्ष प्राप्ति’ के प्रयास में उन सबने एक साथ स्वेच्छा से फांसी लगा ली. अभी तक वह शख्स पकड़ में नहीं आया है जिसने उन्हें इसके लिए प्रेरित किया होगा. भारत के लिए यह भले ही एक अनोखी घटना हो, लेकिन दुनियाभर में ऐसी विचित्र उपासना-पद्धति वाले समूह होते रहे हैं जिन्होंने अपने सैकड़ों अनुयायियों को एक साथ आत्महत्या के लिए प्रेरित कर ऐसी दुर्घटनाओं को अंजाम दिया है.

नवंबर, 1978 में एक अमेरिकी पंथ ‘पीपुल्स टेम्पल’ के 909 अनुयायियों ने अपने गुरु जिम जोन्स के कहने पर साइनाइड जहर से युक्त पेय पीकर अपनी जान दे दी थी. इन मरनेवालों में 304 बच्चे भी थे. इसी तरह 1994-97 के दौरान क्यूबेक के ‘सोलर टेम्पल’ समुदाय से जुड़े 74 सदस्यों ने सामूहिक आत्महत्याएं कीं. 1974 में अमेरिका के कैलिफोर्निया में ‘हैवेन्स गेट’ (स्वर्ग का दरवाजा) नाम के समूह के 39 सदस्यों ने सामूहिक आत्महत्या कर ली. 2007 में बांग्लादेश के मेमनसिंह में एक ही परिवार के नौ सदस्यों ने ‘एडम्स कल्ट’ नाम का समूह बनाकर आत्महत्या कर ली. उनके घर से प्राप्त डायरी में लिखा मिला कि वे मृत्यु के बाद एडम और ईव के तरह का पवित्र जीवन जीना चाहते हैं. ऐसी ही अनेकों घटनाएं दुनियाभर में होती रही हैं, जिनमें आत्महत्या करने वाले समूह यह मानकर चलते हैं कि मृत्यु के बाद वे एक बेहतर संसार या बेहतर जीवन को प्राप्त करेंगे.

भारत में वर्ष 2014 के दौरान किए गए आत्महत्या के आंकड़ों का कारणों के आधार पर वर्गीकरण करने पर पाया गया कि सबसे अधिक आत्महत्याएं पारिवारिक कलह और वैवाहिक संबंधों में आई समस्याओं की वजह से की जाती हैं. इसके अलावा ऋणग्रस्तता, दहेज, परीक्षा में विफलता, प्रेम-संबंध में विफलता, शर्मिंदगी, लंबी और असाध्य बीमारी, मानसिक रोग, गरीबी, बेरोजगारी, नशीली दवाओं का व्यसन इत्यादि प्रमुख कारण देखने में आए हैं. लेकिन यदि मनोवैज्ञानिक नज़रिए से देखा जाए, तो आत्महत्या चाहे व्यक्तिगत हो या सामूहिक, उसमें प्रवृत्तिगत दृष्टि से कोई खास अंतर नहीं होता.

यदि मनुष्य आत्महत्या हेतु प्रेरित करने वाले स्वघोषित पंथों की ओर आकर्षित भी होता है, तो हर सदस्य इनमें से किसी न किसी तरह की समस्या का शिकार अपने-अपने व्यक्तिगत जीवन में हुआ रहता है. जीवन की कटु वास्तविकताओं से पलायन या छुटकारे की चाह उसे इसके लिए प्रेरित करती है. हमारे जीवन और कार्य-व्यापार का स्वरूप इतना मशीनी हो चला है कि मनुष्य बड़ी पूंजी या राज्य-सत्ता के इस्तेमाल में आने वाला केवल एक साधन भर बनता जा रहा है. पारिवारिक, वैवाहिक, व्यावसायिक और अन्य विफलताएं और दुःख कहीं-न-कहीं इसी से जाकर जुड़ते हैं. प्रकृति से मनुष्य का विलगाव होता जा रहा है और जीवन की वास्तविक सुंदरता का स्थान बाह्य बनावटी और सजावटी दिखावे ने ले लिया है. समाज का एक हिस्सा जहां न्यूनतम बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी नहीं कर पा रहा है, वहीं समाज का दूसरा हिस्सा अधिकाधिक उपभोग के बावजूद ऊब और उकताहट का शिकार होता जा रहा है.

इन सभी कारणों से अलग यदि हम पूरी मानव सभ्यता के स्तर पर देखें तो लगता है कि हम सभी धीरे-धीरे एक सामूहिक आत्महत्या की ओर बढ़ रहे हैं. जिन नदियों के किनारे सभ्याताएं विकसित हुईं, वे नदियां धीरे-धीरे मृतप्राय अवस्था को प्राप्त होती जा रही हैं. जिस विज्ञान ने मनुष्य को प्रकृति के गूढ़ रहस्यों के समझने की कुंजी प्रदान की और मनुष्य-मनुष्य को इतना नजदीक ले आया, वही विज्ञान आज परमाण्विक अस्त्रों के रूप में पूरी मानव सभ्यता को चुटकी बजाते समाप्त करने की क्षमता रखता है. दुनिया का ज्यादातर हिस्सा किसी न किसी रूप में गृहयुद्ध की चपेट में है या उसके द्वार पर खड़ा है. आत्मघाती दस्ते या सुसाइड बॉम्बर्स जब चाहे जहां चाहे विस्फोट कर अपने ही साथी-मनुष्यों को बेतहाशा मारते जा रहे हैं. ये सब सामूहिक आत्महत्याएं नहीं हैं, तो क्या हैं? जिस वैज्ञानिक समाज को मानवीय एकता की दिशा में बढ़ना चाहिए था, वह क्षणिक राजनीतिक स्वार्थ के लिए आपस में ही सांप्रदायिक उन्माद पैदा कर लड़ने-मारने की दिशा में बढ़ रहा है. ये सामूहिक या सामाजिक आत्महत्या नहीं है, तो और क्या है?

आत्महत्या को ठीक से समझने के लिए मनुष्य जीवन की सुंदरता और स्वाभाविक मृत्यु के प्रति निर्भयता के महत्व को समझने की जरूरत होगी. ऐसे में संत कबीर याद आते हैं. कबीर ने जीवन और मृत्यु के ऊपर अनगिनत साखी और शबद कहे हैं. वे कहते हैं कि अनिश्चित लेकिन अवश्यंभावी मृत्यु का सतत चिंतन मनुष्य को सत्कर्म के लिए प्रेरित करता है और मृत्यु के भय को समाप्त भी करता है. इसलिए उसे हमेशा अपनी मृत्यु की ओर लगातार देखते रहना चाहिए. देहधारी होनेमात्र की वजह से या एक सामाजिक-पारिवारिक प्राणी होनेमात्र की वजह से जो दुःख उसे मिलते हैं उनसे दुःखी होने या पलायन करने के बजाय उन दुखों को अपने ज्ञान से समझकर उसे सहन करना चाहिए या सप्रयास उससे उबरना चाहिए.

वे कहते हैं-

देह धरे का दंड है, सब काहू को होय।
ज्ञानी भुगते ज्ञान से, मूरख भुगते रोय।।

अपनी अनिश्चित लेकिन अवश्यंभावी मृत्यु की ओर टकटकी लगाकर देखते हुए कबीर मुस्कुराते हैं और कहते हैं-

जा मरने से जग डरे मेरे मन आनंद।

कब मरहूँ कब पावहूँ पूरन परमानंद।।

लेकिन वह परमानंद अस्वाभाविक, पलायनवादी, अंधविश्वासपूर्ण और कायरतापूर्ण आत्महत्या से नहीं, बल्कि एक सहज, सुंदर और स्वाभाविक मृत्यु को सदैव महसूस करते रहने और जीवन को अपने कर्मों से सार्थक बनाते हुए पूर्णता तक पहुंचने पर ही हासिल हो सकता है.

आज मनोचिकित्सा विज्ञान ने यह सिद्ध किया है कि दिमाग में रासायनिक असंतुलन की वजह से मन में आत्महत्या के विचार आने लगते हैं. आज ऐसी औषधियां मौजूद हैं जिनके सेवन से ऐसे विचार आने बंद हो जाते हैं. ऐसी औषधियां भी हैं जिनके सेवन के साइड-इफेक्ट के रूप में आत्महत्या के विचार आने भी शुरू हो जाते हैं. लेकिन वे भी इसे नहीं नकारते कि हमारे दिमागी रासायनिक असंतुलन का संबंध हमारी अनुवांशिकता, हमारी पारिवारिक परवरिश, हमारे सामाजिक परिवेश, हमारी सामुदायिक सुरक्षा, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य, हमारी जीवन-शैली, हमारे आहार तथा व्यसन और हमारी भावनात्मक परिपक्वता या अपरिपक्वता इत्यादि से भी हो सकता है. प्राकृतिक जगत और मानव समाज का विज्ञान तो दरअसल एक ही है. उसे रासायनिक, भौतिक, जैविक और सामाजिक विज्ञान इत्यादि के रूप में बांटा जाना तो केवल सहूलियत की दृष्टि से हुआ है. आत्महत्या व्यक्तिगत हो या सामूहिक, उसकी रासायनिकी, भौतिकी और जैविकी के साथ-साथ उसकी सामाजिकी और आध्यात्मिकी को समझना भी शायद उतना ही आवश्यक है.