कुछ समय पहले जब भारतीय रेलवे ने चुनिंदा ट्रेनों में हवाई जहाजों की तर्ज पर डायनेमिक यानी फ्लेक्सी किराया वसूलना शुरू किया था तो उस वक्त भी इस पर कई तरह के सवाल उठे थे. जब से यह सिस्टम लागू हुआ है तब से मोटे तौर पर दो बातें सामने आ रही हैं. पहली बात यह कि इसकी वजह से यात्रियों को राजधानी और शताब्दी जैसी ट्रेनों में पहले से काफी अधिक पैसा देना पड़ रहा है. और दूसरी यह कि इन ट्रेनों में काफी सीटें खाली जा रही हैं. उधर जिन ट्रेनों में डायनेमिक किराया नहीं वसूला जाता उनमें टिकट वेटिंग रहता है और लोग यात्रा नहीं कर पाते.

पिछले दिनों भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की एक रिपोर्ट आई थी. इस रिपोर्ट से उस बात की पुष्टि हो रही है जो आम लोग इस योजना के लागू होने के वक्त से ही महसूस कर रहे थे. सरकार ने सितंबर 2016 से सभी राजधानी, शताब्दी और दूरंतो ट्रेनों में इस योजना को लागू किया था. उस वक्त तक रेलवे को यात्री सेवाओं से जो कुल कमाई होती थी, उसमें 12 फीसदी योगदान इन तीन श्रेणी की ट्रेनों का था. इस योजना के तहत यह व्यवस्था है कि जैसे-जैसे यात्रा की तारीख नजदीक आती जाएगी और बुकिंग के लिए उपलब्ध सीटों की संख्या घटती जाएगी, किराया बढ़ता जाएगा. यह व्यवस्था हवाई जहाजों में काफी पहले से चलती है.

सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में इस पूरी योजना पर सवाल उठाया है. इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि इस योजना को लागू करने से पहले सरकार ने पहले से रेलवे में चल रहे इस तरह के प्रयोगों के नतीजों को ठीक से नहीं समझा. कुछ ट्रेनों में प्रीमियम तत्काल की सेवा काफी समय से चल रही है. इसमें भी किराया अधिक होता है. सीएजी का कहना है कि ये योजनाएं भी आंशिक तौर पर ही सफल रही हैं. जबकि इनमें किराया उतना अधिक नहीं बढ़ता जितना डायनेमिक किराये वाली योजना के तहत बढ़ता है. दूसरी बात यह कि स्लीपर श्रेणी को छोड़कर अन्य श्रेणियों में यह प्रयोग बहुत सफल नहीं रहा है. एसी श्रेणी में प्रीमियम तत्काल कोटे के अंदर बुकिंग कम होती है.

फ्लेक्सी फेयर लागू होने के बाद के अपने आॅडिट में सीएजी ने कहा है कि इस योजना के लागू होने के बाद राजधानी, शताब्दी और दूरंतो ट्रेनों में खाली जा रही सीटों की संख्या कुल सीटों की साढ़े चार फीसदी हो गई. जबकि पहले यह आंकड़ा एक फीसदी से भी नीचे - 0.66 फीसदी - था. नौ सितंबर, 2016 से 31 जुलाई, 2017 के यात्री आंकड़ों के आधार पर सीएजी ने कहा है कि इसके पहले वाले साल की समान अवधि में इन ट्रेनों में 2.47 करोड़ यात्रियों ने यात्रा की थी, लेकिन फ्लेक्सी किराया लागू होने के बाद यात्रियों की संख्या घटकर 2.40 करोड़ रह गई.

हालांकि यात्रियों की संख्या में कमी आने के बावजूद फ्लेक्सी किराये की वजह से रेलवे को 552 करोड़ रुपये ज्यादा कमाई हुई है. सीएजी का कहना है कि इससे रेलवे की कमाई तो बढ़ी लेकिन, खाली सीटें बताती हैं कि रेलवे के संसाधनों का सही इस्तेमाल नहीं हो पाया. सीएजी ने यह भी कहा है कि अगर इनका सही इस्तेमाल होता तो रेलवे की कमाई और बढ़ जाती.

सीएजी की रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि लोगों ने अधिक पैसे देकर राजधानी, शताब्दी और दूरंतो ट्रेनों के बजाय उन दूसरी एक्सप्रेस ट्रेनों में यात्रा को प्राथमिकता दी जिनमें फ्लेक्सी किराया नहीं लगता. सीएजी ने यात्रा में लगने वाले समय का तुलनात्मक अध्ययन करके यह निष्कर्ष भी निकाला है कि फ्लेक्सी किराया वाली ट्रेनों में यात्रा करना हवाई यात्रा करने से भी अधिक महंगा है.

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि यात्रियों को रेलवे की सेवाएं ऐसी नहीं लगतीं जिसके लिए उन्हें अधिक पैसा खर्च करना वाजिब लगे. यात्रियों को लगता है कि फ्लेक्सी किराये के तहत उनसे जितना अधिक पैसा लिया जा रहा है, उसके मुकाबले सेवाओं के स्तर में कोई सुधार नहीं हुआ है, इसलिए उन्हें दूसरे परिवहन माध्यमों के जरिए चलना चाहिए. सीएजी के आॅडिटरों ने जितने लोगों से बातचीत की उसमें से 61 फीसदी लोगों ने कहा कि रेलवे की सेवाओं में कोई सुधार नहीं हुआ है. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि जिन 11 महीनों का उसने अध्ययन किया है उस दौरान 78 फीसदी राजधानी ट्रेनें, 66 फीसदी दूरंतों ट्रेनें और 64 फीसदी शताब्दी ट्रेनें समय से अपने गंतव्य नहीं पहुंचीं.

इन समस्याओं को दूर करने के लिए और रेलवे में यात्रियों की संख्या बढ़ाने के लिए सीएजी ने कुछ सिफारिशें भी की हैं. अभी फ्लेक्सी किराये के तहत राजधानी, शताब्दी और दूरंतों ट्रेनों की 90 फीसदी सीटें आती हैं. सिर्फ 10 फीसदी सीटें ही सामान्य किराये पर बेची जाती हैं. सीएजी का कहना है कि कम से कम 50 फीसदी सीटें सामान्य किराये पर बुकिंग के लिए उपलब्ध होनी चाहिए. सीएजी ने यह भी सिफारिश की है कि रेलवे को इस योजना के तहत कमाई में हुई बढ़ोत्तरी के साथ इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि कैसे सीटें खाली न जाएं और रेलवे के संसाधनों का पूरा इस्तेमाल हो सके.