नोएडा के एक आम ठेलेवाले से पकौड़ा टाइकून तक का सफर पूरा कर चुके रामभरोसे अब एक जीती-जागती किंवदंती बन चुके थे. सिर्फ छह साल में पकौड़ा इकॉनमी ने भारत को इस तरह बदला कि देशवासियों के लिए टैक्स देने की ज़रूरत खत्म हो गई. उल्टे बेरोजगारी भत्ता इतना मिलने लगा कि अगर कोई नौजवान चाहे तो वह जिंदगी भर बिना कुछ किये म्यूज़िक सुनना या पेंटिंग बनाना अफोर्ड कर सकता है. लेकिन बेरोजगारी भत्ता लेने वाले नौजवान बहुत कम हैं. पकौड़ा इंडस्ट्री और उसके प्रभाव से पैदा हुई ढेर सारी दूसरी संभावनाओं ने उनके लिए विकल्पों के अंबार लगा दिये हैं, फिर भला वे बेरोजगार क्यों रहें? 2018 तक वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स यानी खुशहाली के अंतरराष्ट्रीय सूचकांक में भारत 156वें नंबर पर था, अब आठवें नंबर पर हैं. सिर्फ चंद यूरोपीय देश ही भारत से आगे हैं.

भारत के कई शहरो में बड़े-बड़े पकौड़ा थीम पार्क भी खुल गये हैं. ये पार्क आकार और टेक्नोलॉजी के मामले में डिज्नीलैंड से भी मीलों आगे हैं. पार्क ऐसे हैं कि वहां पहुंचते ही इंसान खुद को पकौड़ा मानने लगता है. जॉय राइड पर जानेवाला व्यक्ति सबसे पहले एक विशालकाय बेसन कुंड में गिरता है. बेसन में कई तरह की आर्युवेदिक जड़ी-बूटियां मिली होती हैं, जो त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद हैं. व्यक्ति बेसनके घोल में तैर रहा होता है, तभी एक बड़ा चम्मचनुमा क्रेन आता है और घोल में गिरे लोगो को एक-एक करके उठाता है. ये सभी लोग एक दैत्याकार कड़ाहे में फेंक दिये जाते हैं. बाहर से देखने में ऐसा लगता है कि कड़ाहे में गर्मागर्म तेल खौल रहा है. कड़ाहे में फेंके जाने वाले लोगों के मुंह से चीख निकलती है. दर्शक मान लेते हैं कि अंदर फेंके गये लोग अच्छी तरह फ्राई हो रहे हैं. लेकिन दरअसल ये एक तरह काऑप्टिकल इल्यूज़न यानी दृष्टि भ्रम है. भीतर गये लोग परम आनंद में हैं, क्योंकि कड़ाह में गर्मी नहीं शीतलता है. वे लाइफ जैकेट पहने मजे से तैर रहे हैं. जब ये लोग बाहर निकाले जाते हैं तब धुलकर एकदम साफ-शफ्काक हो चुके होते हैं. फिर उन्हे चाय के साथ अलग-अलग फ्लेवर वाले गर्मागर्म पकौड़े सर्व किये जाते हैं.

पिछले साल हुए ग्लोबल इंटरनेट सर्वे में वडनगर के पकौड़ा थीम पार्क को विश्व का सबसे क्रिएटिव पार्क करार दिया गया था. इंग्लैंड के मशहूर इंडस्ट्रियलिस्ट रिचर्ड ब्रैनसन ने इस थीम पार्क की विजिटर बुक में लिखा है— हिंदू मिथॉलजी में यह मान्यता है कि दुष्टात्माओं को खौलते तेल में पकाया जाता है. मुझे वडनगर के पकौड़ा थीम पार्क में फ्राई होकर होकर बहुत मज़ा आया. इन भारतीयों का नर्क ऐसा है तो फिर स्वर्ग कैसा होगा? अब तो यहां का नर्क भी स्वर्ग है.

सचमुच स्वर्ग बन चुका है यह देश और ‘स्वर्गवासियों’ के बीच प्रधानमंत्री की लोकप्रियता उफान पर है. पांच साल की उपलब्धियां इतनी कि गिनने वाला थक जाये. जिन गांवों तक पहुंचने के लिए गाड़ी से उतरकर पांच किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है, वे गांव भी सोलर एनर्जी से प्रकाशमान हैं. फाइव-जी नेटवर्क इन गांवों में बिना रुकावट काम करते हैं और सबसे बड़ी बात— प्रजातंत्र पकौड़ा लिमिटेड के आउटलेट हर गांव में हैं. सिर्फ पकौड़ा ही नहीं साइंस एंड टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भी बहुत तरक्की हो चुकी है. अब ऐसे ऐप बन चुके हैं कि कोई अगर खुले मेनहोल में गिरे तो घर वालों को फौरन पता चल जाये. ऑपरेशन थियेटर में मरीज की बायीं टांग की जगह अगर डॉक्टर गलती से दायीं टांग में चीरा लगा दे तो अलार्म ज़ोर-ज़ोर से बजने लगे. विकास के ऐसे सैकड़ो उदाहरण हैं.

इन सबसे बड़ी यह थी कि देश की जनता का माइंड सेट अब पूरी तरह पॉजिटिव हो चुका है. इसके दो बड़े सबूत हैं. पहला यह कि समाज में अब कोई पॉलिटिक्स की बात नहीं करता. पूरा देश खा-पीकर मस्त है. दूसरा बड़ा सबूत यह है कि विपक्ष का ह्रदय परिवर्तन हो चुका है. लोकसभा का टर्म पूरा होने को है लेकिन विपक्ष इस देश में चुनाव के लिए तैयार ही नहीं है. नेता प्रतिपक्ष ने दलील दी है कि देश समृद्धि की वजह से पकौड़े की तरह फूलकर कुप्पा है और ये सब प्रधानमंत्री जी की वजह से हुआ है. फिर चुनाव किसलिए? पीएम एक संविधान संशोधन लाकर अपना कार्यकाल कम से कम दस साल बढ़वा लें, विपक्ष पार्लियामेंट में इस संशोधन का पुरजोर समर्थन करेगा. प्रधानमंत्री ने महसूस किया कि लोकतंत्र खतरे में है. भला चुनाव के बिना लोकतंत्र कहां? प्रधानमंत्री इस बात पर अड़ गये कि चुनाव तो होकर रहेगा. उधर अपोजीशन लीडर ने धमकी दे दी कि अगर आप दोबारा चुनाव शब्द भी अपनी जुबान पर लाये तो हमआपके घर के बाहर अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ जाएंगे. एक विपक्षी सांसद ने लोकसभा में प्राइवेटमेंबर बिल लाने की कोशिश की, जिसमें मौजूदा सरकार का कार्यकाल अनिश्चितकाल के लिए बढ़ाये जाने का प्रस्ताव था. लेकिन सरकारी पक्ष के सांसदों ने बिल पेश होने से पहले ही उसे छीनकर फाड़ दिया. उसके बाद दोनो पक्षों के बीच मार-कुटाई हो गई. सत्ता पक्ष कह रहा था कि हम लोकतंत्र बचाना चाहते हैं, विरोधी पार्टी कह रही थी कि हम भी लोकतंत्र बचाना चाहते हैं क्योंकि प्रधानमंत्री ही असली लोकतंत्र हैं.

मामला उलझता देखकर पीएम अपने चाणक्य की शरण में गये. पार्टी अध्यक्ष ने हंसते हुए कहा— पकौड़े का मुद्धा भुनाने के लिए कहां तो वे लोग अपना नाम बदलकर यूनाइटेड पकौड़ा एलायंस रखने को तैयार थे, अब चुनाव लड़ने को राजी नहीं है. उन्हे भय है कि अगर खाता भी नहीं खुला तो क्या होगा. आप उन्हें लड़ने के लिए राजी करवाइये हम उन्हे 20-30 सीटे ऐसे ही दे देंगे. प्रधानमंत्री प्रस्ताव लेकर विपक्ष के पास गये. विपक्षी नेता ने कहा कि हम हार से नहीं डर रहे हैं, सवाल सिद्धांतों का है. जब आप इस इस देश के सर्वमान्य नेता हैं तो फिर चुनाव क्यों हो? आखिरकार बड़ी मुश्किल से पीएम ने लोकतंत्र की दुहाई देकर विपक्ष को चुनाव लड़ने के लिए मनाया. तारीखों के ऐलान के बाद चुनाव प्रचार शुरू हो गया. भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह पहला मौका था, जब विपक्षी नेता भी सरकार का खुलकर प्रचार कर रहे थे. विपक्षी नेता कह रहे थे कि हमारी बदकिस्मती कि ये हमे आज़ादी के फौरन बाद नहीं मिले. अगर नेहरू के बदले यही देश के प्रधानमंत्री होते तो देश की स्थिति कुछ और होती. तब आज ना तो लोकतंत्र की ज़रूरत होती और ना विकास की क्योंकि दोनो उपलब्धियां उसी वक्त प्राप्त कर ली गई होतीं.

प्रधानमंत्री जी ने भी चुनाव प्रचार में बड़ा दिल दिखाया. उन्होने कहा कि ये लोग विपक्ष में हैं लेकिन इन्हें हल्के में मत लीजिये. राष्ट्रप्रेम की भावना इनमें बहुत ज्यादा है, भले ही वो मेरे मुकाबले एक प्रतिशत भी ना हों. इनकी बात सुनिये और ठीक लगे तो इन्हें वोट ज़रूर दीजिये. लोकसभा के पिछले चुनाव में दोनो गठबंधनो ने मतदाताओं को जमकर पकौड़े खिलाये थे. उस समय पकौड़ा क्रांति की शुरुआत थी, उसका प्रतीकात्मक महत्व था. साथ ही पकौड़े खिलाने से तकनीकी तौर पर किसी कोड ऑफ कंडक्ट का उल्लंघन नहीं होता था. इस बार इन बातों की ज़रूरत नहीं है. चमकता-दमकता स्वर्ग से सुंदर देश जनता के सामने है.

पहले राउंड की वोटिंग पूरी हो गई. चुनावी गहमा-गहमी के बीच लोग यह भूल गये थे कि राष्ट्र ऋषि रामभरोसे जी कहां हैं और क्या कर रहे हैं? बीच-बीच में अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसियां कभी उनके साइप्रस, कभी मोरक्को और कभी ट्यूनीशिया में होने की ख़बरें देती रहती थीं. एक ख़बर यह भी आई थी कि उत्तर कोरियाई तानशाह किम जोंग ने ट्वटीट किया है कि वह भी अपने देश में भारत जैसी पकौड़ा क्रांति चाहता है. जोंग ने लिखा था— अगर हमें पकौड़े बनाना आता, तो हम न्यूक्लियर मिसाइले क्यों बनाते? रामभरोसे जी ने उत्तर दिया- बिना प्रजातंत्र के अच्छे पकौड़े नहीं बनते. तुम प्रजातंत्र ले आओ, उत्तर कोरिया में पकौड़ा क्रांति मैं ले आउंगा. दुनिया भर, खासकर तीसरी दुनिया के कई बड़े नेताओं ने रामभरोसे के ट्वीट को रीट्वीट किया था. अमेरिका की खूफिया एजेंसी सीआईए का कहना है कि सेंसरशिप के बावजूद रामभरोसे का ट्वीट चोरी-छिपे उत्तर कोरिया के लोगों के बीच शेयर किये जा रहे हैं और ताज्जुब नहीं अगर अगले दो-चार महीने में जनता डिक्टेटरशिप के खिलाफ सड़क पर आ जाये.

इन सबके बावजूद रामभरोसे से जुड़ी ख़बरें भारतीय मीडिया में उस तरह से कवर नहीं हो रही थीं, जैसे पहले होती थीं. किसी को पता भी नहीं चला कि कि रामभरोसे सूडान, मिस्र, इराक और ईरान होते हुए कब अफगानिस्तान जा पहुंचे हैं. अफगानिस्तान में रामभरोसे का अभूतपूर्व स्वागत हुआ. अफगान राष्ट्रपति ने रामभरोसे को बर्र-ए-सगीर यानी उप-महाद्वीप का सबसे कीमती नगीना बताया. रामभरोसे काबुल में नहीं रुके. वे कंधार, गजनी और हेरात जैसे शहरों में गये. बामियान में उन्होने खंडित बौद्ध प्रतिमाओं के सामने पकौड़े तले. टूटी हुई प्रतिमा की शक्ल वाले पकौड़े, खंडित होकर भी पकौड़ों की शक्ल में मुस्कुराते बुद्ध! न्यूज़ एजेंसी एएफी ने तस्वीरें रिलीज़ कीं और यह लिखा कि पकौड़ा क्रांति का एक कलात्मक पक्ष भी है, जिसे दुनिया अब तक नज़रअंदाज़ करती आई है. चुनाव में व्यस्त भारतीय मीडिया ने इस ख़बर पर भी ध्यान नहीं दिया. मीडिया को क्या पता था कि उन्हे रामभरोसे से जुड़ी एक ऐसी ख़बर चलानी पड़ेगी जिसकी उन्होने सपने में भी कल्पना नहीं की थी.