नमामि गंगे कार्यक्रम मोदी सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजनाओं में से एक है. सत्ताधारी भाजपा के लिए यह परियोजना इसलिए और अहम हो जाती है कि इससे कथिततौर पर हिंदू वोट बैंक का एक बड़ा हिस्सा रिझाया जा सकता है. लेकिन तमाम दावों-वादों के बाद भी ऐसा लगता नहीं कि सरकार इस दिशा में गंभीर कोशिश कर रही है और इसका सबसे पहला और बड़ा सबूत है इस कार्यक्रम से जुड़े आंकड़े.

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि तीन साल बीतने के बाद भी सरकार और इसकी संस्थाएं कार्यक्रम के लिए आवंटित रकम का एक बड़ा हिस्सा खर्च नहीं कर पाई हैं. 27 जुलाई को राज्य सभा में केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह ने जो जानकारी दी है, उसके आधार पर यह बात सीधे-सीधे कही जा सकती है. उन्होंने बताया है कि साल 2014 से 30 जून, 2018 तक नमामि गंगे कार्यक्रम के लिए 5,523.22 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं. लेकिन, इसमें से अब तक 3,867.48 करोड़ रुपये का ही काम हुआ है.

सरकारी आंकड़ों के ही मुताबिक साल 2014-15 से लेकर 2016-17 (तीन साल) तक इस कार्यक्रम के लिए कुल 3,633 करोड़ रुपये जारी किए गए थे. लेकिन, इस दौरान इनमें से केवल 1,836.4 करोड़ रुपये यानी करीब आधी रकम ही गंगा की साफ-सफाई पर खर्च की गई. दूसरी ओर, नमामि गंगे को लेकर सरकार की तीन साल की सुस्ती 2017-18 में अचानक टूटती हुई दिखी. बीते वित्तीय वर्ष में इसके लिए 1,423.22 करोड़ रुपये जारी किए गए थे, लेकिन सरकार ने इससे ज्यादा 1,625.11 करोड़ रुपये खर्च कर डाले!

वहीं अगर गंगा को साफ करने के लिए बनाई गई अलग-अलग परियोजनाओं की बात करें तो यहां भी सरकार की सुस्ती साफ नजर आती है. संसद में सरकार द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक 2014 के बाद से इस काम के लिए कुल 165 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी. लेकिन, इनमें से अब तक 1,163 करोड़ रुपये की केवल 34 परियोजनाएं ही पूरी की जा सकी हैं. इसके अलावा 95 परियोजनाओं पर काम चल रहा है. वहीं 68 पर अभी काम शुरू होना बाकी है. नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) की दिसंबर, 2017 की प्रदर्शन रिपोर्ट भी इस मोर्चे पर सरकार की पोल खोलती दिखती है. इसके मुताबिक उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में सात महीने पहले तक गंगा किनारे बसे जिलों में कचरा निपटान के लिए कोई काम शुरू नहीं हो पाया था.

दूसरी ओर, नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा की पत्रिका नमामि गंगे के नवंबर महीने में प्रकाशित आंकड़ों की मानें तो 2014 से लेकर अक्टूबर, 2017 तक कुल 95 परियोजनाओं में से केवल 18 ही पूरी की जा सकी थीं. साथ ही, 36 परियोजनाओं के लिए निविदा जारी करने की प्रक्रिया ही चल रही थी. यह बहुत ही अजीबो-गरीब बात है लेकिन ऊपर के पैराग्राफ से तुलना करें तो हमें यहां आंकड़ों में अंतर भी देखने को मिलता है. वहीं इस साल केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2018-19 के बजट भाषण में देश को बताया था कि 187 परियोजनाओं में से 16,713 करोड़ रुपये की 47 परियोजनाएं पूरी की जा चुकी है. साथ ही, गंगा किनारे बसे सभी 4465 गांवों (गंगा ग्राम) को खुले में शौच मुक्त किया जा चुका है. वित्तमंत्री के भाषण से मिली जानकारी भी आंकड़ों में अंतर होने की बात कहती है.

साभार : नमामि गंगे पत्रिका
साभार : नमामि गंगे पत्रिका

जेटली ने जिन लक्ष्यों को हासिल करने का दावा अपने भाषण में किया था, कैग की प्रदर्शन रिपोर्ट में इस लक्ष्य को हासिल न किए जाने की बात कही गई है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि परियोजनाओं की मंजूरी में देरी, आवंटित रकम को खर्च न कर पाने और अन्य कमियों की वजह से इसके मकसद को हासिल करने में देरी हो रही है. कैग ने इस कार्यक्रम की रिपोर्ट तैयार करने के लिए करीब 8,000 करोड़ रुपये की 87 परियोजनाओं को चुना था, जिनमें से केवल 13 परियोजनाएं ही पूरी की जा सकी थीं. इसके अलावा यह रिपोर्ट बताती है कि गंगा ग्रामों को खुले में शौच से मुक्त करने के लिए आवंटित 951.11 करोड़ रुपये में से आधे से भी कम यानी 450.15 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए हैं.

इसी सिलसिले में अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में गंगा की साफ-सफाई की बात करें तो शहर प्रतिदिन 3,000 लाख लीटर सीवेज पैदा करता है. लेकिन तीन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के जरिये इसका केवल एक-तिहाई हिस्सा (केवल 1020 लाख लीटर) ही साफ हो पाता है. यानी करीब 2000 लाख लीटर सीवेज रोजाना गंगा में समा जाता है. सरकारी अनुमान है कि 2030 तक वाराणसी प्रतिदिन 3900 लाख लीटर सीवेज पैदा करने लग जाएगा. हालांकि, सरकार ने भरोसा दिया है कि तब तक 4120 लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों को तैयार कर लिया जाएगा.

बीते साल जुलाई में गंगा की सफाई को लेकर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) ने एक सख्त टिप्पणी की थी. प्राधिकरण ने कहा था कि नमामि गंगे कार्यक्रम के दो साल (मई, 2015 में इसकी शुरुआत की गई थी) पूरे होने के बाद भी क्या हासिल हुआ है, यह साफ दिखाई नहीं देता. एनजीटी का आगे कहना था कि पैसा खर्च करने और ध्यान देने के बाद भी नदी और अधिक प्रदूषित हो गई है. इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट भी गंगा की सफाई को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों को वक्त-वक्त पर फटकार लगाता रहा है.

देश में 2,525 किलोमीटर लंबी गंगा नदी के किनारे कुल आबादी का करीब 40 फीसदी रहता है. साथ ही, इसका जीवन भी काफी हद तक गंगा पर निर्भर है. लेकिन आज इस नदी की यह हालत हो चुकी है कि बीते महीने एनजीटी को कहना पड़ा कि उत्तराखण्ड के हरिद्वार और उत्तर प्रदेश के उन्नाव के बीच गंगा जल आचमन के लायक भी नहीं है. यह टिप्पणी भी गंगा की साफ-सफाई को प्राथमिकता बताने वाली केंद्र सरकार के इस दिशा में कामकाज पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है.