कम से कम तीन दशकों से वैज्ञानिक उधेड़बुन में लगे हुए थे कि मंगल ग्रह पर क्या अब भी किसी नदी, झील या सागर का अस्तित्व हो सकता है. वहां अतीत में कभी बही और सूख गयी नदियों की तलहटियां और घाटियां तो मिली हैं. लुप्त हो गयी झीलों और सागरों के निशान भी मिले हैं. वहां के बहुत ही विरल वायुमंडल में गैसीय रूप में पानी होने के भी संकेत हैं. पर किसी जगह तरल पानी होने का पता अभी तक नहीं चला था.

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) ने बीती 25 जुलाई को बताया कि उसके मंगलयान ‘मार्स एक्सप्रेस’ द्वारा जुटाई गई जानकारियों से मंगल ग्रह के दक्षिणी ध्रुव पर की ठोस बर्फ वाली परतों के नीचे तरल पानी की एक झील के संकेत मिले हैं. क़रीब 20 किलोमीटर बड़ी यह झील डेढ़ किलोमीटर मोटी बर्फ के नीचे दबी हुई है. 15 वर्ष पूर्व भेजे गये ‘मार्स एक्सप्रेस’ से मिले आरंभिक आंकड़ों के अथ्ययन से पहले ही पता चल गया था कि मंगल ग्रह के दोंनों ध्रुवों पर और वहां की मिट्टी की परतों के नीचे जमी हुई बर्फ होनी चाहिये.

पृथ्वी पर भी ध्रुवीय बर्फ के नीचे पानी

यह भी सोचा जा रहा था कि यदि मंगल ग्रह के ध्रुवों पर बर्फ जमी हुई है, तो हमारी पृथ्वी पर के दक्षिणी ध्रुव और ग्रीनलैंड की बर्फ के नीचे दबी झीलों की तरह वहां की बर्फ के नीचे भी कहीं तरल पानी हो सकता है. पृथ्वी पर का अनुभव यही है कि पानी का द्रवणांक (मेल्टिंग प्वाइंट) अपने ऊपर की बर्फ के भार तले घटने लगता है. पानी में यदि लवण (सॉल्ट) जैसी अशुद्धियां घुली हों, तो उनकी मात्रा के अनुपात में पानी शून्य से भी नीचे के तापमानों पर तरल बना रह सकता है. मंगल ग्रह पर विचरण कर चुके अमेरिकी रोवरों (विचरण वाहनों) को ऐसे लवण भी मिले हैं, जो तब बने होंगे, जब लाखों-करोड़ों वर्ष पहले उसकी ऊपरी सतह पर पानी बहा करता था.

पृथ्वी पर के अवलोकनों के आधार पर अटकलें तो लगाई जा रही थीं कि मंगल ग्रह के किसी ध्रुव पर की बर्फ के नीचे तरल पानी हो सकता है, पर इस की पुष्टि नहीं हो पा रही थी. इटली के बोलोना शहर मे स्थित ‘राष्ट्रीय खगोलभौतिकी शोध संस्थान’ के वैज्ञानिकों की एक टीम ने मंगल की परिक्रमा कर रहे मार्स एक्सप्रेस द्वारा भेजे गये उन आंकड़ों का तीन वर्षों तक गहन अध्ययन किया, जो ‘मार्सिस’ (मार्स एडवांस्ड राडार फॉर सबसर्फ़ेस ऐन्ड अयनॉस्फ़ियर साउन्डिंग इन्स्ट्रूमेन्ट) कहलाने वाले उसके राडार ने इकट्ठा किए थे. इस उपकरण को इतालवी अंतरिक्ष एजेंसी ‘एएसआई’ से मिले पैसों और अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ की ‘जेट प्रॉपल्सन लैबोरैट्री’ की सहायता से इटली के रोम विश्वविद्यालय ने बनाया है.

राडार तरंगों से टोह

‘मार्सिस’ किसी पक्षी के डैनों-जैसे 20-20 मीटर लंबे दो और सात मीटर लंबे एक तीसरे राडार एंटेना से लैस एक ऐसा उपकरण है, जो राडार तरंगों के माध्यम से मंगल ग्रह की ऊपरी सतह के नीचे, तरल या जम कर बर्फ बन गये पानी की टोह लेने के लिए बना है. ये एंटेना 1.3 से 5.5 मेगाहेर्त्स फ्रीक्वेंसी की ऐसी रेडियो तरंगें पैदा करते हैं, जो मंगल ग्रह की ऊपरी सतह को भेद कर 500 मीटर से लेकर पांच किलोमीटर तक की गहराई तक जा सकती हैं और वहां पानी या बर्फ के होने- न- होने का पता दे सकती हैं. ये तरंगें ऊपरी सतह के नीचे की अलग-अलग परतों से टकरा कर अलग-अलग ढंग से परावर्तित होती हैं, जिससे उन परतों की बनावटों यानी इसका पता चलता है कि वे चट्टानी हैं, बर्फीली हैं या वहां पानी है. उड़ान की दिशा में हर क्षण पांच से नौ किलोमीटर का दायरा स्कैन होता है. ‘मार्सिस’ ने जुलाई 2005 से काम करना करना शुरू किया था.

इटली के वैज्ञानिकों की टीम ने ‘मार्सिस’ के जिन आंकड़ों के अध्ययन के आधार पर मंगल ग्रह के दक्षिणी ध्रुव की बर्फ के नीचे तरल पानी की झील होने का पता लगाया है, वे आंकड़े मई 2012 से दिसंबर 2015 के बीच हुए निरीक्षणों के हैं. उस दौरान ‘मार्सिस’ मंगल ग्रह के दक्षिणी ध्रुव वाले जिस हिस्से पर से कई बार उडता हुआ गुजर रहा था, उसे ‘प्लानम ऑस्ट्राले’ नाम दिया गया है. इतालवी रेडियो-खगोलशास्त्री रोबेर्तो ओरोसेई और उनकी टीम को इन निरीक्षणों के 29 ऐसे नमूने मिले, जो ‘प्लानम ऑस्ट्राले’ के ऊपर से उड़ान के दौरान मिले पिछले सभी नमूनों से अलग थे.

एक टिकाऊ जलसंरचना

अपनी टीम की ओर से ओरोसेई ने लिखा, ‘हम इस विशेषता को मंगल ग्रह पर एक टिकाऊ जलसंरचना के तौर पर देखते हैं.’ एक वीडियो इंटरव्यू में उनका यह भी कहना था कि ‘मार्सिस’ से मिले आंकड़ों से जो तस्वीर बनती है, वह इतनी सुस्पष्ट नहीं है कि झील का सही आकार बताया जा सके. उन्होंने कहा, ‘आभास यही मिलता है कि झील का व्यास 20 किलोमीटर से अधिक नहीं है. रेडियो तरंगें उस के पानी में इस तेज़ी से विलीन हो जाती हैं कि झील की सही गहराई का अनुमान लगा सकना संभव नहीं हो पाया. यही कहा जा सकता है कि कम से कम एक मीटर गहरी तो वह है ही.’

इस खोज से जुड़े सभी वैज्ञानिक मानते हैं कि मंगल ग्रह पर मिली इस झील का पानी बहुत खारा होना चाहिये. वह डेढ़ किलोमीटर मोटी जिस ध्रुवीय बर्फ से ढकी है, वहां का तापमान शून्य से भी 70 डिग्री सेल्सियस नीचे, यानी – 70 डिग्री के बराबर है. इतने कम तापमान पर पानी सामान्यतः तुरंत जम कर ठोस बर्फ बन जाता है.

पानी की तरलता में नमक की भूमिका

तब भी यदि मंगल ग्रह के दक्षिणी ध्रुव की बर्फ के नीचे इस तापमान पर तरल पानी है, तो उसमें काफ़ी मात्रा में सोडियम क्लोराइड, कैल्शियम क्लोराइड या मैग्नेशियम-परक्लोरेट जैसे नमक घुले होने चाहिये. मैग्नेशियम-परक्लोरेट एक ऐसा नमक है, जो मंगल ग्रह की भूमि पर 2008 में मिल भी चुका है. हमारी पृथ्वी पर के दक्षिणी ध्रुव (अंटार्कटिक) की सूखी घाटियों में जहां-तहां बेहद खारे पानी के ऐसे जलाशय मिलते है, जहां इसी तरह का तापमान होता है. हमारे महासागरों के खारे पानी में घुले नमक की मात्रा 32 से 37 पीएसयू (प्रैक्टिकल सलाइनिटी यूनिट) होती है, जबकि अंटार्कटिक के पानी में वह 200 पीएसयू के बराबर है.

तरल पानी मिलने की बात सुनते ही यह अटकलबाज़ी शुरू हो जाती है कि जहां पानी है, वहां किसी न किसी प्रकार का जीवन भी होना चाहिये, चाहे वह किसी जीवाणु के रूप में ही क्यों न हो. लेकिन वैज्ञानिक अभी तक ऐसा कोई जीवाणु नहीं जानते, जो किसी परक्लोरेट से संपृक्त (सैचुरेटेड) पानी के घोल में – 70 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ज़िंदा रह सके. अगर वास्तविकता यह हुई कि मंगल ग्रह के दक्षिणी ध्रुव की बर्फ के नीचे मिली झील का पानी किसी खारेपन के बदले इसलिए तरल है कि वहां किसी भूगर्भीय गर्मी का स्रोत पानी को जमने नहीं देता, तब बात अलग है. वास्तविकता जो भी हो, उसे जानना कभी दूर भविष्य में तभी संभव हो पायेगा, जब मंगल ग्रह की ध्रुवीय बर्फ को भेद कर उसके नीचे के पानी का नमूना लेना और उसे ऊपर ला कर उसकी जांच-परख करना संभव हो सकेगा.

परिस्थितियां जीवन के अनुकूल नहीं

इतालवी खगोलभौतिकीविद ओरोसेई का यही कहना है कि मंगल ग्रह पर उन्हें जिस झील के होने का सुराग मिला है, वहां की परिस्थितियां किसी प्रकार के जीवन के कतई अनुकूल नहीं हो सकतीं. वहां न ऑक्सीजन है और न रोशनी, और पानी भी बहुत खारा है. दूसरी ओर, यह भी एक तथ्य है कि हमारी पृथ्वी के दक्षिणी धुव की बर्फ के नीचे मिली एक झील में ऐसे जीवाणु भी मिले हैं, जो बाहरी दुनिया से किसी संपर्क के बिना साढ़े तीन करोड़ वर्षों से वहां रह रहे हैं.

ऐसा ही मंगल ग्रह पर भी क्यों नहीं हो सकता? मंगल ग्रह पर अतीत में भेजे गये परिक्रमा यानों और अन्य उपकरणों की खोजबीन से यह लगभग तय माना जाता है कि वहां दूर अतीत में, कभी न कभी, किसी न किसी प्रकार के जीवन का भी अस्तित्व रहा है. इसे दिखाने वाली सबसे पिछली खोज वहां भेजे गये अमेरिकी रोवर (विचरण वाहन) ‘क्यूरियॉसिटी’ ने की थी. उसने तीन अरब वर्ष पुराने पत्थरों में ऐसे कई रासायनिक यौगिक पाये थे, जो जीवन की उत्पत्ति की शुरुआती ईंटे कहलाते हैं.

जो भी हो, फ़िलहाल इतना ही कहा जा सकता है कि मंगल ग्रह पर तरल पानी होने के लक्षण अब काफ़ी प्रबल हो गए लगते हैं. वहां वाकई तरल पानी है या नहीं, इसकी ठोस और सीधी पुष्टि अभी होनी बाक़ी है. इसी तरह यह पुष्टि होनी भी अभी बाक़ी है कि वहां अभी या कभी जीवन था. जो लोग वहां कभी जीवन रहे होने की अटकल लगाते हैं, उन्हें अपनी बात के पक्ष में एक तर्क और ज़रूर मिल गया है.