राहुल गांधी अपनी नई टीम का गठन कर चुके हैं, कांग्रेस की कार्यसमिति के सदस्यों को नामित किया जा चुका है. लेकिन राहुल की टीम में कांग्रेस अध्यक्ष के सबसे करीब कौन हैं, यह पहेली 24 अकबर रोड में कायम है. सोनिया गांधी के जमाने में कांग्रेस नेताओं के बीच यह बात आम थी कि संगठन के काम में जनार्दन द्विवेदी सीधे सोनिया के संपर्क में होते थे और बाकी सियासी कामों के लिए अहमद पटेल सोनिया गांधी से संपर्क सूत्र थे. लेकिन किस नेता के जरिए राहुल गांधी तक पहुंचा जा सकता है यह अब भी कांग्रेस पार्टी के ज्यादातर सांसदों और नेताओं को समझ नहीं आया है.

24 अकबर रोड की सियासत सालों से देखने और करने वाले एक कांग्रेसी बताते हैं कि ‘राहुल की टीम में एक अहमद पटेल की कमी साफ दिखती है. सोनिया के वक्त में अहमद भाई की बात का वजन होता था. अगर उन्होंने कुछ कहा है तो इसका मतलब होता था कि ये बात दस जनपथ की मुहर के साथ आई है. लेकिन अब ऐसा कोई नेता नहीं है जिस पर राहुल गांधी का जबरदस्त भरोसा हो.’

इस समय राजस्थान से आए अशोक गहलोत कांग्रेस के संगठन का काम देखते हैं और हरियाणा से आए रणदीप सूरजेवाला मीडिया के संपर्क में रहते हैं. लेकिन कांग्रेस के कुछ नेताओं से बात करने पर पता चलता कि सोनिया की तुलना में राहुल खुद भी कार्यकर्ताओं से ज्यादा मिलते हैं. कभी-कभार बैठकों का दौर देर रात तक चलता है. कांग्रेस की परंपरागत व्यवस्थाओं, जैसे कांग्रेस कार्यसमिति, कांग्रेस संसदीय दल, कांग्रेस के पदाधिकारियों के अलावा भी राहुल ने अपनी एक अलग टीम बनाई है. इसके आधे से ज्यादा सदस्यों के नाम कांग्रेस के मंझोले नेता नहीं जानते. बड़े नेता उनका नाम जानते हैं लेकिन उन्हें चेहरे से नहीं पहचानते.

सुनी-सुनाई है कि राहुल गांधी ने 2019 के लिए बिलकुल अलग तरीके से तैयारी शुरू की है. अब तक कांग्रेस अपने नेताओं पर निर्भर रहा करती थी. अनुभवी पुराने नेताओं के नेतृत्व में युवा नेताओं की टीम को आगे बढ़ाया जाता था और यही टीम चुनाव लड़ती और लड़ाती थी. लेकिन मोदी-अमित शाह की जोड़ी से लड़ने के लिए राहुल गांधी ने भी कांग्रेस की सोच बदली है. ऊपर से कांग्रेस वैसी ही दिखती है जैसे सोनिया के वक्त में थी. लेकिन अंदर से पूरा सिस्टम बदल गया है. सुनी-सुनाई ही है कि अब कांग्रेस में उसकी कार्यसमिति से ज्यादा ताकतवर राहुल गांधी का वॉर रूम है. इसकी कमान संभालती हैं राहुल की छोटी बहन प्रियंका गांधी. जैसे प्रियंका की सोच में सियासत कूट-कूटकर भरी हुई है लेकिन वे प्रत्यक्ष तौर पर सियासत में नहीं हैं, ठीक उसी तरह प्रियंका की टीम भी है.

राहुल गांधी के वॉर रूम में ज्यादातर ऐसे ही सदस्यों को रखा गया है जो खुद 2019 के चुनाव के उम्मीदवार नहीं है. वे सियासत की बारीकी को समझते हैं लेकिन नये जमाने के हिसाब से. राहुल गांधी के हालिया भाषण में जो तेवर और बदलाव देखने को मिले हैं, कुछ हद तक इन्हीं की देन थे. बड़ी मुश्किल से बात करने को राजी हुए राहुल की टीम के एक सदस्य बताते हैं कि राहुल गांधी ने बहुत सोच-समझकर और सलाह-मशविरे के बाद ही नरेंद्र मोदी को गले लगाने का फैसला किया था.

2019 के चुनाव प्रचार के लिए राहुल की टीम अलग-अलग आइडियाज पर काम कर रही है. इन्हीं में से एक काम था 2019 के प्रचार के लिए ‘कैंपेन की पिच’ तैयार करना. यानी कि इस बार राहुल गांधी ऐसा क्या कहेंगे जो पहले किसी ने नहीं कहा. राहुल की टीम ने बहुत सोच-समझकर यह आइडिया निकाला कि वे इस बार सिर्फ कहेंगे नहीं कुछ ऐसा करेंगे जिससे उनकी बात मतदाताओं के दिमाग में चस्पा हो जाए.

राहुल गांधी 2019 का चुनाव इस मुद्दे पर लड़ना चाहते हैं कि कांग्रेस किसी से नफरत नहीं करती. न हिंदू से न मुसलमान से. यह बात अगर सिर्फ भाषण में कही जाती तो उसका असर नहीं होता. इसलिए उनकी टीम ने इसे कुछ इस अंदाज़ में बदला, राहुल को किसी से नफरत नहीं है. नरेंद्र मोदी से भी नहीं. जब राहुल देश के करीबी 100 पत्रकारों से मिले तो उनसे यह सवाल भी पूछा गया कि आखिर उन्होंने मोदी को गले क्यों लगाया. जवाब में राहुल ने भी स्पष्ट कहा कि वे मोदी को गले लगाकर यह बताना चाहते थे कि वे न तो उनसे डरते हैं और न ही दूर भागते हैं.

सुनी-सुनाई है कि राहुल गांधी इस तरह के बेहद खास फैसले अपनी बहन प्रियंका गांधी की सलाह से लेते हैं. राहुल भाषण के बीच में मोदी के पास जाकर उन्हें गले लगाएंगे यह बात कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं को नहीं पता थी. सिर्फ प्रियंका गांधी और उनकी टीम ही इसके बारे में जानती थी. जब कुछ पत्रकारों ने राहुल से पूछा कि वे प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में आने के लिए क्यों नहीं कहते? इस सवाल के जवाब में राहुल ने अपने बहन की जमकर तारीफ की और कहा कि वे प्रियंका को हर दूसरे दिन यह बात कहते हैं लेकिन अभी उन्हें लगता है कि वे जो कर रही हैं वह ज्यादा अहम है.

गांधी परिवार को लंबे अरसे से जानने वाले एक बुजुर्ग कांग्रेसी नेता ने बड़े मार्के की बात कही. वे बाले, ‘राहुल ने अपनी सियासी पारी के शुरुआती सालों में जो गलतियां की वे राहुल की नहीं उनके सलाहकारों की गलतियां थीं. इसका खामियाजा वे आज तक भर रहे हैं. इसलिए राहुल गांधी ने इस बार अपनी बहन को ही अपना प्रमुख सलाहकार बनाया है. वे सियासत को बहुत अच्छे से समझती तो हैं लेकिन खुद सियासत नहीं करती.’

कुछ समस्याएं ऐसी भी होती हैं जिन्हें भाई-बहन मिलकर भी नहीं सुलझा पाते. उस मुश्किल वक्त में राहुल की मदद उनकी मां सोनिया गांधी करती हैं. कांग्रेस के अंदर की खबर रखने वाले एक सूत्र की मानें तो कांग्रेस में अब राहुल को कोई दिक्कत नहीं है. कमोबेश सभी ने मान लिया है कि अब पार्टी में राहुल की ही चलेगी और वे ही 2019 में पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं. लेकिन मोदी का विरोध करने वाली विपक्षी पार्टियों के नेताओं को अब भी राहुल के नाम पर परहेज है. इनमें कुछ ऐसे हैं जो खुद प्रधानमंत्री बनने की इच्छा लिए सालों से बैठे हैं. उन्हें ऐसा लगता है कि अगर राहुल को इस बार प्रधानमंत्री का उम्मीदवार मान लिया तो फिर प्रधानमंत्री बनना तो दूर उसका सपना भी छोड़ना पड़ेगा. ऐसे नेताओं से जब-जब राहुल को दिक्कत होती है तो सोनिया गांधी का एक फोन कॉल उनकी मदद कर देता है.

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता उत्तर प्रदेश के सियासी उलटफेर की खबर देते हुए कहते हैं कि जब अखिलेश यादव ने यह मन बना लिया कि वे 2019 का चुनाव राहुल गांधी के नेतृत्व में नहीं लड़ेंगे तो सोनिया ने सीधे मायावती से संपर्क किया. मायावती इसके बाद से अखिलेश के बजाय कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाने पर विचार कर रही हैं. कर्नाटक में भी जब बात फंसी तो सीधे सोनिया ने एचडी देवेगौड़ा और उनके जरिए कुमारस्वामी तक मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव पहुंचाया था.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब-जब राहुल से अलग एक नया मोर्चा बनाने की कोशिश करती हैं तो सोनिया ममता को मना लेती हैं. कांग्रेस के एक सांसद कहते हैं कि नरेंद्र मोदी की एक बात एकदम सच है इस बार जंग गांधी परिवार बनाम मोदी सरकार ही है.