उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश रहे एके गोयल को राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी के अध्यक्ष पद से हटाने की मांग केंद्र सरकार के कुछ मंत्री कर रहे हैं. इनमें सबसे मुखर नरेंद्र मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री के तौर पर काम कर रहे रामविलास पासवान हैं. उनकी पार्टी - लोक जनशक्ति पार्टी - और बेटा - चिराग पासवान - भी ऐसी मांग करने वालों में शामिल हैं.

मोदी सरकार में राज्य मंत्री की हैसियत से काम कर रहे उपेंद्र कुशवाहा और उनकी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी भी यह मांग कर रही है. ऐसे ही रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया के नेता और मोदी सरकार में राज्यमंत्री रामदास अठावले को भी गोयल का एनजीटी अध्यक्ष रहना ठीक नहीं लग रहा है. यही स्थिति भारतीय जनता पार्टी के सांसद उदित राज की भी है.

इन सभी नेताओं को यह लगता है कि गोयल को एनजीटी अध्यक्ष बनाकर केंद्र सरकार ने गलती की है. इन्हें ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि गोयल उच्चतम न्यायालय की उस पीठ का हिस्सा थे जिसने बीती 20 मार्च को एससी-एसटी एक्ट यानी ‘अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989’ में कुछ बदलाव कर दिये थे.

इसी बात पर गोयल से ये तीनों नेता नाराज हैं. हालांकि एससी-एसटी एक्ट में बदलाव का निर्णय सिर्फ जस्टिस गोयल का नहीं था. जिस पीठ ने यह निर्णय दिया उसमें जस्टिस यूयू ललित उनके साथ थे. इसके अलावा उच्चतम न्यायालय की किसी भी पीठ से आने वाला निर्णय किसी न्यायाधीश विशेष का नहीं होता. इसे हमेशा देश की सबसे बड़ी अदालत का फैसला ही माना जाता है. अगर इस फैसले से किसी को कोई परेशानी हो तो वह उच्चतम न्यायालय में ही इसे चुनौती दे सकता है. इस मामले में भी केंद्र सरकार की एक पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. लेकिन रामविलास पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और रामदास अठावले ने इस पर आने वाले फैसले का इंतजार करने के बजाय पिछला फैसला देने वाले न्यायाधीश की नई नियुक्ति को ही राजनीतिक रंग दे दिया.

संविधान और कानून के जो जानकार हैं, वे इन मंत्रियों की जस्टिस गोयल को हटाने की मांग को इस वजह से भी गलत मान रहे हैं कि ये तीनों उसी सरकार का हिस्सा हैं जिसने एनजीटी अध्यक्ष की नियुक्ति की है. एनजीटी कानून, 2010 की धारा-6 में एनजीटी अध्यक्ष की नियुक्ति प्रक्रिया का उल्लेख है. इसमें स्पष्ट लिखा है कि एनजीटी अध्यक्ष की नियुक्ति केंद्र सरकार भारत के मुख्य न्यायाधीश से विचार-विमर्श करके करेगी.

इसका मतलब यह हुआ कि गोयल की नियुक्ति उसी सरकार या और स्पष्ट होकर कहें तो उसी मंत्री समूह ने की है जिसके अंग पासवान, कुशवाहा और अठावले हैं. कानून के जानकारों का मानना है कि जस्टिस गोयल को हटाने की मांग करके ये तीनों मंत्री संवैधानिक मर्यादा के खिलाफ जा रहे हैं. किसी भी मंत्री को अपनी सरकार के निर्णय के खिलाफ राय व्यक्त करने का अधिकार नहीं है. अगर किसी को ऐसा करना है तो वह मंत्री समूह से इस्तीफा देकर ही ऐसा कर सकता है. लेकिन ये तीनों मंत्री पद पर रहते हुए ही अपनी ही सरकार के निर्णय पर सवाल उठाकर उसे पलटने की मांग कर रहे हैं.

अपने कई मंत्रियों और दलित संगठनों के दबाव में केंद्रीय कैबिनेट ने एससी-एसटी एक्ट को उसके पहले वाले स्वरूम में पहुंचाने के लिए जरूरी एक संशोधन विधेयक को मंजूरी दे दी है. ऐसा करना कितना सही है, कितना गलत, इसे लेकर अलग-अलग व्याख्याएं हो सकती है. लेकिन यह सरकार के अधिकार क्षेत्र का काम है. वैसे ही जैसे ऐसे किसी भी विधेयक के विभिन्न प्रावधानों की संवैधानिकता जांचने का काम उच्चतम न्यायालय का है.

कुछ कानूनी जानकारों को केंद्रीय मंत्रियों का रवैया उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय पर दबाव बनाने की रणनीति भी लग रही है. इन लोगों का कहना है कि ऐसा करके ये मंत्री न्यायपालिका को चेतावनी दे रहे हैं कि अगर अनुकूल निर्णय नहीं आया तो सेवानिवृत्ति के बाद होने वाली उनकी नियुक्तियों को भी प्रभावित किया जा सकता है.

भले ही रामविलास पासवान यह कह रहे हों कि गोयल को एनजीटी अध्यक्ष बनाने से दलितों के बीच ‘सही संदेश’ नहीं जा रहा है लेकिन कानूनी और संवैधानिक जानकारों की मानें तो जिस तरह से इस मसले का राजनीतिकरण कुशवाहा, अठावले और उन्होंने कर दिया है, उससे किसी भी वर्ग में ‘सही संदेश’ नहीं जा रहा है.