प्रमोशन में आरक्षण को लेकर केंद्र सरकार ने गेंद सुप्रीम कोर्ट के पाले में डाल दी है. शुक्रवार को शीर्ष अदालत में उसने कहा कि हर साल होने वाले प्रमोशनों में एससी-एसटी तबके को 23 फीसदी आरक्षण देना जरूरी है. अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का कहना था कि दलितों और आदिवासियों को प्रमोशन में आरक्षण न दिया जाए तो एफरमेटिव एक्शन की कवायद भ्रम ही साबित होगी. उनके मुताबिक ये तबका बीते एक हजार से ज्यादा सालों से प्रताड़ना झेल रहा है.

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च अदालत से ये भी कहा है कि इस मामले में 2006 के नागराज केस में आए फैसले पर पुनर्विचार की तत्काल जरूरत है. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एससी-एसटी को प्रमोशन में आरक्षण तभी मिले जब उनका कम प्रतिनिधित्व और पिछड़ापन साबित करने वाले आंकड़े मौजूद हों. इस पर केंद्र ने दलील दी कि एससी-एसटी पहले से ही पिछड़े हैं, इसलिए प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए अलग से किसी डेटा की जरूरत नहीं है.