ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे टकराव में पिछले दिनों एक नया मोड़ आ गया. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी से मिलने की इच्छा जता दी. डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को बातचीत का यह प्रस्ताव देते हुए कहा कि वे यह मुलाकात बिना किसी शर्त के करना चाहते हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति का यह भी कहना था कि ईरान का कोई भी नेता उनसे जहां भी मुलाकात करने का इच्छुक हो, वे मिलने के लिए तैयार हैं.

भले ही अमेरिका सहित पूरी दुनिया के लिए यह बात काफी हैरान करने वाली हो. लेकिन, कूटनीति के विश्लेषक इसे डोनाल्ड ट्रंप की सोची समझी रणनीति का हिस्सा बताते हैं. इनके मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति ईरान को लेकर उसी रणनीति पर काम कर रहे हैं, जो उन्होंने उत्तर कोरिया पर इस्तेमाल की थी. यह नीति थी चौतरफा दबाव बनाकर विपक्षी को बातचीत की मेज तक आने को मजबूर कर देने की. उत्तर कोरिया पर ट्रंप की यह नीति कारगर साबित हुई है और अब वे इसी से ईरान को भी नए परमाणु समझौते के लिए राजी करना चाहते हैं.

ब्लूमबर्ग से जुड़े विदेश मामलों के विशेषज्ञ निक वेडहेम्स अपनी एक टिप्पणी में लिखते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान को बातचीत का यह प्रस्ताव वहां से आ रही खबरों को देखकर दिया है. ईरान के मौजूदा हालात की बात करें तो वहां की मुद्रा रियाल में पिछले एक साल में 80 फीसदी की गिरावट आई है जिसमें 20 फीसदी की गिरावट पिछले एक महीने में आई है. इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह अमेरिका द्वारा ईरान पर छह अगस्त से लगाए जाने वाले प्रतिबंधों को माना जा रहा है. हालत यह है कि देश में महंगाई की वजह से हर रोज कहीं न कहीं सरकार विरोधी प्रदर्शन होते हैं. ईरान से जो खबरें आ रही हैं उनके मुताबिक वहां की अधिकांश जनता चाहती है कि उनकी सरकार अमेरिका से बात कर परेशानी का हल निकाले. निक के मुताबिक ऐसे हालात में डोनाल्ड ट्रंप लगा होगा कि अब ईरान दबाव में आकर उनके प्रस्ताव पर तैयार हो सकता है.

कुछ अमेरिकी पत्रकार इतनी जल्दी यानी प्रतिबंध शुरू होने से पहले ही डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को बातचीत का प्रस्ताव देने के पीछे नवंबर में होने वाले मध्यवधि चुनाव को मानते हैं. ये लोग कहते हैं कि 2016 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रंप ने उत्तर कोरिया और ईरान दोनों को एक बड़ा मुद्दा बना दिया था. तब उन्होंने इन दोनों मुद्दों को सुलझाने का वादा भी किया था. इनके मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप आगामी मध्यवाधि चुनाव में एक बार फिर इन मुद्दों को उठाना चाहते हैं. ट्रंप को लगता है कि उत्तर कोरिया से वे बातचीत शुरू कर चुके हैं और अगर मध्यावधि चुनावों से पहले वे ईरान को भी बातचीत की मेज तक ले आते हैं तो वे इन दोनों मामलों को चुनावों में अपनी बड़ी सफलता की तरह दिखा सकेंगे.

डोनाल्ड ट्रंप के ईरान को लेकर आये इस बयान का एक कारण हाल में एक अमेरिकी मीडिया संस्थान द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण को भी माना जा रहा है. इस सर्वेक्षण में अमेरिका के अधिकांश लोगों ने ईरान से तनाव कम करने की बात कहते हुए उससे अच्छे संबंध बनाने को तरजीह दी है.

ईरान ने प्रस्ताव क्यों ठुकराया?

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को बातचीत का प्रस्ताव देना जितना चौंकाने वाला था उतनी ही हैरान करने वाली इस पर ईरानी सरकार की प्रतिक्रिया थी. राष्ट्रपति हसन रूहानी ने अमेरिकी राष्ट्रपति के प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा कि वे डोनाल्ड ट्रंप से तब तक कोई बात नहीं करेंगे जब तक अमेरिका 2015 में हुए ‘ईरान परमाणु समझौते’ में वापस नहीं लौटता.

ईरान के इस जवाब के पीछे भी कई वजहें हैं. एक ईरानी राजदूत एक अमेरिकी समाचार पत्र को बताते हैं कि ईरान की सरकार को डोनाल्ड ट्रंप पर बिलकुल भी भरोसा नहीं है. वे कहते हैं, ‘ईरान एक ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहता जो जी-7 सहित कई अहम मुद्दों पर कुछ ही घंटों बाद ही अपनी बात से पलट गया हो.’

2015 में 'ईरान परमाणु समझौता' ईरान और दुनिया की छह विश्व शक्तियों के बीच हुआ था. लेकिन, मई 2018 में डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते में खामियां बताते हुए अमेरिका को इससे अलग कर लिया | फोटो : एएफपी
2015 में 'ईरान परमाणु समझौता' ईरान और दुनिया की छह विश्व शक्तियों के बीच हुआ था. लेकिन, मई 2018 में डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते में खामियां बताते हुए अमेरिका को इससे अलग कर लिया | फोटो : एएफपी

ईरान को यह भी लगता है कि अगर उसने डोनाल्ड ट्रंप से सीधी बात की तो इससे उसकी परेशानियों में इजाफा ही होगा. उसका मानना है कि ट्रंप उसकी किसी बात को तरजीह न देकर ऐसा समझौता करने पर अड़ जायेंगे जिससे वे अपने करीबी इजरायल और सऊदी अरब को खुश कर सकें. जाहिर है कि यह स्थिति ईरान को पहले से ज्यादा मुश्किल में डाल देगी.

इसके अलावा ईरान को यह भी लगता है कि अगर वह अमेरिका के प्रस्ताव पर जरा भी सकारात्मक रुख दिखाएगा तो इससे यह संदेश जाएगा कि वह भी 2015 में हुए परमाणु समझौते को पीछे छोड़ चुका है और ट्रंप के मनमुताबिक नया समझौता करने को तैयार है. ऐसा होने के बाद वे यूरोपीय देश जो अभी पुराने समझौते पर उसके साथ खड़े हैं, अमेरिका के दबाव में नए समझौते पर काम शुरू कर देंगे.

जानकारों की मानें तो इन्हीं सब वजहों के चलते ईरान आखिर तक इस कोशिश में लगा रहेगा कि यूरोप के जरिए अमेरिका पर किसी तरह दबाव बनाकर उसे 2015 में हुए परमाणु समझौते पर ही सहमत किया जाए.

उत्तर कोरिया और ईरान में बड़ा फर्क

ईरान मामलों पर नजर रखने वाले कुछ जानकारों का मानना है कि अमेरिका के लिए ईरान को इतनी जल्दी दबाव में लाना आसान नहीं है. ये लोग कहते हैं कि उत्तर कोरिया और ईरान की परस्थितियों में बहुत ज्यादा अंतर है. ईरान आर्थिक रूप से उत्तर कोरिया से कहीं ज्यादा मजबूत है. साथ ही उत्तर कोरिया के खिलाफ प्रतिबंधों पर चीन, रूस, यूरोप और संयुक्त राष्ट्र सभी अमेरिका के साथ थे, लेकिन ईरान के मामले में ये सभी ईरान के साथ हैं.

गौर करने वाली बात यह भी है कि उत्तर कोरिया के खिलाफ प्रतिबंध बहुत ज्यादा कड़े थे जिनके चलते उत्तर कोरिया में रोजमर्रा की जरूरी चीजों के भी लाले पड़ने लगे थे. लेकिन, ईरान को लेकर यह स्थिति फिलहाल तो बनती नहीं दिखती क्योंकि तमाम प्रतिबंधों के बाद भी ईरान के कई देशों से व्यापारिक रिश्ते बने रहेंगे.

स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के थिंकटैंक से जुड़े विदेश मामलों के जानकार कॉलिन काहल एक और बात भी बताते हैं. उनके मुताबिक इस बार अमेरिका जो प्रतिबंध ईरान पर लगा रहा है, वे पहले की तरह कारगर साबित नहीं हो सकेंगे क्योंकि यूरोपीय संघ इस कोशिश में है कि उसकी कम से कम कंपनियां ही अमेरिका के डर से ईरान छोड़ने को मजबूर हों. यूरोपीय संघ अपने यहां की कंपनियों को ईरान में व्यवसाय करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन देने पर भी विचार कर रहा है. साथ ही वह इस पर भी विचार कर रहा है कि अगर ईरान में व्यापार करने वाली यूरोप की कंपनियों पर अमेरिका कार्रवाई करता है तो यूरोपीय संघ उसे उसी भाषा में जवाब दे सके.

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