इस पुस्तक के अध्याय मेरे ‘विश्वासघात’ का एक अंश :

‘आज करीब ढाई दशक बाद यादों की टेप को रिवाइंड करता हूं तो मैं स्वयं को एक साथ कई किरदार निभाते हुए पाता हूं : मैं अनाड़ी प्रेमी हूं, मैं अस्थिर व चंचल आशिक हूं, मैं प्रेमी भी हूं और लखनपाल का शिकारी भी हूं, मैं ‘सुविधानुसार क्रान्तिकारी’ हूं और ‘सुविधानुसार प्रेमी’. विवाह के लिए अधीर, सर्वश्रेष्ठ साथी के चुनाव की लालसा, एक साथ कई विकल्पों को पाले हुए, और इंद्रियों का खिलंदड़पन अलग से!

यह कहना कठिन है कि निजी नैतिक स्खलनता को आज जितनी शिद्दत के साथ मैं महसूस करता हूं, क्या इसे मैंने तब इतनी ही सघनता से महसूस किया होगा? नैतिक स्खलनों का एहसास मुझे अवश्य था, लेकिन इनसे मुझे घृणा या वितृष्णा थी. यह कहना बेईमानी होगी...कभी मैं इन्हें सहजता से लेता, कभी मासूमियत से, कभी अर्ध-अपराधबोध के साथ. पर सच्चाई यह थी कि मैं स्खलनों से स्वेच्छापूर्वक या संकल्पबद्धता के साथ कभी ‘पलायन’ नहीं कर सका...विनाश के बचाव के लिए मेरे जीवन में ‘इस्केप रूट्स’ हमेशा रहे हैं.’


आत्मकथा : मैं बोनसाई अपने समय का

लेखक : रामशरण जोशी

प्रकाशक : राजकमल

कीमत : 399 रुपये


हममें से हर किसी का जीवन विविधताओं से भरे किसी महाआख्यान से कम नहीं है. लेकिन हममें से ज्यादातर के पास उस भोगे हुए यथार्थ को फिर से जीने, उसका विश्लेषण करते हुए उसे लिखने की न तो ललक होती है, न हौसला और शायद वह जरूरी हुनर भी नहीं होता. इस काम की चुनौती इस तथ्य से भी जाहिर होती है कि तमाम भाषाओं के कई कलमकारों ने एक से बढ़कर एक रचनाएं पाठकों को दीं लेकिन वे कभी अपनी आत्मकथा नहीं लिख पाए. वहीं दूसरी तरफ जिसने भी ईमानदारी के करीब जाकर अपनी आत्मकथा लिखी या आत्मस्वीकृतियां दर्ज कीं, उनके साहस ने अक्सर ही पाठकों को चमत्कृत किया है. ऐसा ही साहस अपने दौर के मशहूर पत्रकार रामशरण जोशी ने अपनी आत्मकथा ‘मैं बोनसाई अपने समय का’ में दिखाया है. यह आत्मकथा अपने समय के और खुद उनके स्याह और सफेद को काफी रोचक और ईमानदार तरीके से हमारे सामने लाती है.

समाज के ज्यादातर लोग एक ही जीवन में कई किरदारों को एक साथ जीते हैं. रामशरण जोशी ने भी मानसिक और भौतिक स्तर पर एक ही समय में कई किरदारों को बहुत ही सशक्त तरीके से जिया है. शोधकर्ता, पत्रकार, वामपंथी क्रांतिकारी, सामाजिक विश्लेषक और लेखक. इन किरदारों के साथ-साथ और जिन भूमिकाओं को भी उन्होंने जीवन में निभाया, उन सबने उनके जीवन को समृद्ध करने में अहम योगदान दिया है.

रामशरण जोशी अलवर जिले के एक छोटे से गांव ‘बसवा’ से उखड़कर जयपुर की कच्ची बस्ती में पहुंचे थे. वहां दलित और सवर्णों की जिंदगी का जो फर्क उन्हें बचपन में ही दिखा, उसका वे काफी व्यंग्यात्मक तरीके से वर्णन करते हुए लिखते हैं –

‘एक रोज़ मोहल्ले में ख़बर मिली कि शिक्षामंत्री भंगियों (वाल्मीकियों) की बस्ती में आ रहे हैं...हम बालकों से कहा जाता है, ‘यह बस्ती नरक है. नरकवासियों से दूर रहना चाहिए नहीं तो भगवान जी नाराज़ हो जाएंगे...मैं शाम को इस नरकबस्ती में पहुंच गया हूं. पहली बार मेरे साथ मेरी बस्ती के अन्य बालक भी हैं...हम बच्चे शोर मचा रहे हैं. नरकबस्ती के बच्चे हम लोगों को कौतुक भरी नज़रों से घूर रहे हैं. हम दोनों एक-दूसरे के लिए अजनबी बने हुए हैं. हो सकता है वे हम लोगों को स्वर्गवासी मान रहे हों! स्वर्गवासी तो स्वर्गवासी होता ही होता है न! वह चंद पलों में भूत भी बन सकता है...लेकिन इस बस्ती के वासियों को तो नरकवासी ही रहना है, जीते हुए भी, मरने के बाद भी!’

यह आत्मकथा अंत तक जाते-जाते बहुत सारे रंगों और भूमिकाओं से भरा एक भव्य चित्र हमारे सामने लाती है. पुरुषों के पास अक्सर ही यह सुविधा होती है कि वे अपने ‘बहु-स्त्रीगमन’ के अनुभवों को बताने के बाद भी खलनायक नहीं बनते. या फिर उनकी उस स्तर की छवि तो कतई नहीं बनती जैसी इस मामले में एक स्त्री की बन सकती है. यहां लेखक ने भी अपने जीवन में आई स्त्रियों के बारे में बेबाकी और काफी हद तक तटस्थता के साथ चर्चा की है.

रामशरण जी अपने जीवन में आई स्त्रियों के बारे में बात करते हुए सदियों से चली आ रही उस सोच को भी कटघरे में खड़ा करते हैं, जिसमें सिर्फ स्त्री को सुंदर कहा जाता है और हर बार उसी का महिमामंडन करके उन्हें रिझाया जाता है. ‘स्त्री-सौंदर्य’ के बरक्स वे ‘पुरुष-सौंदर्य’ की दावेदारी पेश करते हुए कहते हैं –

‘मैं स्वयं को सुंदर मानता रहा हूं. स्वयं को आकर्षक समझता हूं. मैं मानता रहा हूं कि स्त्री को मेरे व्यक्तित्व की प्रशंसा करनी चाहिए. पुरुष की सुंदरता का अपना एक विशिष्ट अस्तित्व है. स्त्री की सुंदरता का ही अस्तित्व नहीं होता. पुरुष की सुंदरता, किसी भी अर्थ में स्त्री की सुंदरता से कमतर नहीं होती. यह सही है कि दोनों की अपनी-अपनी ‘अपीलें’ हैं. लेकिन स्त्री यह अपेक्षा रखे कि पुरुष हमेशा उसकी सुंदरता पर ही रीझता रहे, यह सरासर गलत है. स्त्री को भी चाहिए कि वह पुरुष की सुंदरता की समान रूप से प्रशंसा करे. वह इसका प्रदर्शन करे. इसलिए स्त्री की प्रशंसा के मामले में मैंने हमेशा कृपणता का ही प्रदर्शन किया है.’

यह आत्मकथा राजस्थान के एक छोटे से गांव से शुरू होकर देश के कई हिस्सों से गुजरते हुए कनाडा और अमेरिका आदि दुनिया के कई मुल्कों तक का रोमांचक सफर तय करती है. इस आत्मकथा से गुजरते हुए पाठक देश के अलग-अलग कालखंडों की जीवंत झलक पाते हुए आगे बढ़ते हैं. यहां दिल्ली की सड़कों पर रात को रौशन करते वेश्याओं के बच्चे हैं, पहली बार छोटे शहर से दिल्ली तक बेटिकट सफर करते लोगों की धुकधुकी है, बस्तर में पहुंचे हुए वामपंथी क्रांतिकारियों का खानाबदोश जीवन है, हिन्दी की साहित्यिक जमात की ‘अनैतिक नैतिकता’ का पाखंड है और राजनीतिक गलियारों की धमक भी है. रामशरण जोशी इस आत्मकथा में बतौर पत्रकार अपने बेहद रोमांचक सफर को साफगोई से दर्ज करते हैं, और साथ ही पत्रकारों की दुनिया के सच को भी बेबाकी से बयान करते हैं. एक जगह वे लिखते हैं –

‘भोपाल में पूर्णकालिक पत्रकार बनने के पश्चात प्रेस की ताक़त को मैंने पहली बार जाना है, पत्रकार का ग्लैमर, सत्ता गलियारों में उसकी चहलकदमी, राज्यपाल व मुख्यमंत्री, मंत्रियों और नौकरशाहों से लाभ-अर्जन. भोपाल में ही मालूम हुआ कि सरकार ने सम्पादकों, संवाददाताओं, प्रेस मालिकों को ढेर सारी सुविधाएं दे रखी हैं. कई वरिष्ठ पत्रकारों को हवेलीनुमा मकान, बंगले आवंटित किए गए हैं. विशेष कोटे से स्कूटर दिए जाते हैं. पत्रकार पोस्टिंग-ट्रांसफर कराते हैं. बेनामी उद्योग-धंधे चलाते हैं. चीनी की राशनिंग है, लेकिन प्रत्येक मान्यता प्राप्त पत्रकार को पांच से दस किलो चीनी प्रतिमास दी जाती है. मैं भी हर महीने पांच किलो चीनी लेकर ब्रिटिश काउंसिल के लाइब्रेरी के मुखिया बहल को दे देता हूं. वैसे मेरे पत्रकार बंधु इन सुविधाओं को भी बेच खाते हैं!

दूसरा पक्ष यह भी है कि औसत पत्रकारों की पगार उपहास की दावेदार है! ज़्यादातर पत्रकार तपस्या का जीवन गुजारते हैं...भोपाल की पत्रकारिता पर ऊंची जाति की अमरबेल (ब्राम्हण, वैश्य, कायस्थ, राजपूत) फैली हुई है.’

इस पूरी आत्मकथा में एक पत्रकार की पैनी दृष्टि महसूस होती है. यह आत्मकथा सामाजिक, राजनीतिक, साहित्यिक समाज, पत्रकारिता और वामपंथी क्रांतिकारियों के जीवन का एक पुख्ता ब्लू प्रिंट देती है. वहीं इसकी एक खासियत यह भी है कि यहां एक आम पुरुष की स्त्री के साथ संबंधों, चाहतों, कुंठाओं, सवालों, उलझनों, द्वंदों, नैतिकता के दबावों, पुरुषोचित चतुराइयों और पेचीदगियों का भी ईमानदारी और गहराई से भरा एक बयान मिलता है. ‘मैं सुविधानुसार क्रान्तिकारी हूं और सुविधानुसार प्रेमी’ अपने इस बयान के द्वारा रामशरण जोशी ने अपने ‘नैतिक स्खलन’ को स्वीकार किया है. सफेद या स्याह सच को स्वीकार करना यदि महानता है, तो उन्होंने यह महानता अपनी आत्मकथा में भरपूर दिखाई है.

साधारण और महानता के टैग से परे यह आत्मकथा जीवन का विश्लेष्णात्मक पुनर्पाठ करती है. यह जीवन की तरह ही रोचक, चुटीली, कड़वी, द्वंदों, संघर्षों और प्रेम के अलग-अलग रंगों और स्वादों से भरपूर है.