पेट साफ न होना कुछ लोगों के लिए एक राष्ट्रीय समस्या से कम नहीं होता. ‘पेट साफ नहीं होता तो दिनभर डकारें आती हैं, डॉक्टर साब’ से लगाकर ‘कब्ज़ियत इतनी ज्यादा है कि दिनभर पेट फूला रहता है’ तक के विभिन्न संवाद रोज ही डॉक्टर के क्लीनिक में बोले-सुने जाते हैं. हमारे देश में बहुत सारी डॉक्टरी तो कब्ज़ियत के सहारे ही चल रही है. शेष दस्तों पर टिकी है. लोगों का पेट ठीक रहने लगे तो डॉक्टरों के पेट पर लात पड़ जाए, पर ऐसा होता नहीं. ईश्वर की डॉक्टरों पर बड़ी कृपा है.

कब्ज़ियत या कॉन्स्टिपेशन के बारे में आम राय है कि यही तमाम बीमारियों की जड़ है. पर लोग यह भी कहते हैं कि इसका आप कुछ नहीं कर सकते, यह तो होता ही रहता है. तभी तो कब्ज़ियत की शिकायत को डॉक्टर लोग भी बहुत लिफ्ट नहीं देते. जुलाब की गोली या शीशी देकर, ज्यादा सलाद खाओ, खूब पानी पियो आदि उपदेश देते हुए वे मरीजों को वापस कर देते हैं.

फिर कब्ज़ियत वाला मरीज मारा-मारा फिरता है. कोई उसे सीरियसली नहीं लेता. बल्कि उसी पर दोष मढ़ दिया जाता है कि खाने पर कंट्रोल करते नहीं और कब्ज़ियत का रोना रोते फिरते हो. हमारे मित्र चौहान साब (डॉक्टर हैं) तो ऐसे मरीजों को दुत्कार तक देते हैं कि यार चीज तुम्हारे पेट में ही पड़ी है न, तो पड़ी रहने दो. कब तक पड़ी रहेगी साली? निकल आएगी एक दिन. परेशान क्यूं होते हो. फ्लश का पानी बचा रहे हो, कम खा रहे हो, पेट फूलने के कारण तने-तने घूमते स्मार्ट भी लगते हो और क्या चाहिए?

बहरहाल मैं ऐसी ही बेमुराद और बेमुरव्वत कब्ज़ियत के विषय में आज कुछ बुनियादी बातें आपको बताऊंगा. इसी बहाने से यदि पेट के बारे में आप तनिक वैज्ञानिक तथ्य जान जाएंगे तो बढ़िया ही रहेगा. यहां हम कब्ज़ियत के बारे में कुछ तथ्य आपको बताते हैं. इनसे कब्ज़ियत जैसी आम परंतु रहस्यमयी तकलीफ को आप ज्यादा बेहतर ढंग से समझ लेंगे तो फालतू की जांचों, बार-बार डॉक्टरी कंसल्टेशन और लेग्जेटिव मिसयूज (जुलाब के दुरुपयोग) से बच सकेंगे.

पहल तथ्य :

मेडिकल साइंस अभी तक तय नहीं कर पाया है कि कितनी बार पाखाना जाने को नॉर्मल कहा जाएगा. कोई कितनी बार हाजत की दिशा में जाता है यह उसकी मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा पारिवारिक सोच और बचपन से लेकर आज तक की ट्रेनिंग का नतीजा होता है. जो दो बार जाते हैं, वे यदि किसी दिन एक बार ही जाएं तो चिंता में पड़ जाते हैं कि हमें कब्ज़ियत हो रही है क्या?

परिवार में मां-बाप की आदत रोज सुबह पांच बजे टॉयलेट जाने की थी और बच्चा यदि नौ बजे तक नहीं गया तो उसे कब्ज़ियत का शिकार घोषित किया जा सकता है. ऐसे में घर में यदि कोई मेहमान या बहू ऐसी पधार जाए जिसकी नॉर्मली दो दिन में एक बार ही पाखाना जाने की आदत हो तो सारा परिवार उसे कब्ज़ियत का बीमार मान लेगा. पर ऐसा नहीं है. सप्ताह में कम से कम तीन बार तक भी यदि कोई पाखाना जाता है तो इसे मेडिकली नॉर्मल माना जाता है.

दूसरा तथ्य :

दो नंबर की एक्टिविटी के बारे में दूसरा तथ्य यह है कि मात्र कम बार पाखाना जाने को ही कब्ज़ियत नहीं कहा जाता. इलाज की दरकार के लिए मेडिकली हम कॉन्स्टिपेशन उसी स्थिति को कहते हैं जब करने में देर लगे, जोर लगाना पड़े, मल सख्त हो, गोलियों जैसा गोल-गोल हो और हो जाने के बाद ‘पेट पूरा साफ नहीं हुआ’ की भावना बनी रहे और जब यह चीज प्राय: रोज-रोज हो तभी वह कब्ज़ियत की बीमारी है. कभी-कभार हो जाए तो यह अपने आप ही ठीक हो जाने वाली चीज है. तो सख्त होना, कठिनाई से होना और जोर लगाने की आवश्यकता होना तथा ये चीजें रोज-रोज होना कब्ज़ियत है.

तीसरा तथ्य :

कब्ज़ियत प्राय: खाने में सलाद आदि फाइबर, पानी व अन्य द्रव कम लेने से, भागदौड़ के कारण टॉयलेट में कम टाइम देने से होती है. ऑफिस को लेट हो रहे हैं, टॉयलेट से निकलकर बच्चों का टिफिन तुरंत तैयार करना है, आदि चिंताओं में मुब्तिला शख्स वहां बैठते ही उठने की फिराक में रहता है. पाखाना होने का सारा सिस्टम ही ईश्वर ने आपके रिलैक्स होने से जोड़ रखा है.

हो नहीं रही और आप घड़ी पर नजर रखकर उसे धमका रहे हैं कि तू तुरंत नहीं निकली तो ठीक नहीं होगा. ऐसे में आपकी प्यूबोरेक्टेलिस नामक मांसपेशी और गुदाद्वार का स्फिक्टर और भी सिकुड़कर (स्पाज्म में जाकर) आती हुई को भी नहीं आने देती. तो समय दें, रिलैक्स हों. तब शायद आपको कब्ज़ियत ही न हो. दस से पंद्रह मिनट तक इत्मीनान से वहां बैठें और ‘कैंसिल ट्रेन का फ्लेटफॉर्म पर इंतजार’ टाइप सोच रखें. आखिर ये ट्रेनें भी कभी-न-कभी आती ही हैं! कहने का सीधा मतलब है कि टॉयलेट में समय दें.

चौथा तथ्य :

यदि जीवनभर तो बढ़िया करते रहे और अब अचानक पिछले दो-तीन माह से तगड़ी कब्ज़ियत है तो इसे नजरअंदाज न करें. विशेषतौर पर यदि इसके साथ ही भूख भी खत्म हो जाए, वजन गिरने लगे या मल में खून दिखे तब तो एकदम सतर्क हो जाएं. यदि यह कुछ न हो तो भी अचानक आ गई कब्ज़ियत के लिए डॉक्टरी जांच अवश्य करा लें. आंतों में कैंसर का ट्यूमर या रुकावट होना, कोई क्रॉनिक इन्फ्लेमेटरी बीमारी आदि के कारण भी ऐसा हो सकता है. इस तरह की कब्ज़ियत को गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए.