देश एक और भारत बंद का गवाह बनने जा रहा है. दलित संगठनों ने आगामी नौ अगस्त को दूसरी बार भारत बंद का आह्वान किया है. अपनी पुरानी मांगों को लेकर वे एक बार फिर दलित और आदिवासी समाज से सड़क पर उतरने की अपील कर रहे हैं. इस आंदोलन की जड़ें मुख्य रूप से सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले से जुड़ी हुई हैं जिसमें उसने कथित रूप से अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम या संक्षेप में कहें तो एससी-एसटी एक्ट को कमज़ोर कर दिया था. बंद के ज़रिए दलित संगठन इस क़ानून को सभी पुराने प्रावधानों के साथ बहाल करने की मांग करेंगे. इसके अलावा भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर ‘रावण’ और अन्य दलित युवाओं की रिहाई क साथ-साथ पिछले भारत बंद के दौरान मारे गए लोगों के परिवारों को मुआवज़ा भी बंद के प्रमुख मुद्दों में शामिल रहेंगे. हालांकि राजनीतिक व सामाजिक कारणों के चलते इस आंदोलन की कामयाबी को लेकर अभी से संदेह जताए जा रहे हैं.

‘सरकारी’ दलितों ने असमंजस में डाला

कई जानकारों का कहना है कि नौ अगस्त से पहले ही यह आंदोलन कमज़ोर होता दिख रहा है. इसके राजनीतिक कारण गिनाते हुए वे कहते हैं कि एनजीटी में जस्टिस एके गोयल की नियुक्ति पर सरकार को धमकी देकर चिराग पासवान और रामदास अठावले जैसे दलित नेताओं ने पहले ही आंदोलन को कमज़ोर कर दिया. इसी वजह से ख़ुद दलित समाज के कई लोग बंद का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि जब दो अप्रैल को भारत बंद बुलाया गया था तब पासवान व उनकी पार्टी और अन्य दलित भाजपा सांसद और मंत्री कहां थे.

भंवर मेघवंशी और दिलीप मंडल जैसे दलित विचारक और पत्रकार भी इस बंद को लेकर आश्वस्त नहीं हैं. मेघवंशी तो इसका विरोध ही कर रहे हैं. उन्होंने लिखा है, ‘पिछली बार का भारत बंद जनता का स्वतः स्फूर्त बंद था. इस बार का बंद कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं का शक्ति प्रदर्शन है. इसका ऐलान एक राजनीतिक दल के नेताजी ने किया है जिसे दूसरी पार्टी के मंत्रीपुत्र (चिराग पासवान) का समर्थन हासिल हो चुका है.’ मेघवंशी का यह भी मानना है कि मोदी सरकार से जुड़े अनुसूचित जाति वर्ग के 25 सांसदों और कुछ मंत्रियों का रामविलास पासवान के यहां जुटना, पासवान का प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखना और साथ ही चिराग पासवान का सड़कों पर उतरने की चेतावनी देना, यह सब पहले से लिखी स्क्रिप्ट का हिस्सा लगता है’.

बीते हफ़्ते गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि उनकी सरकार एससी-एसटी एक्ट को पहले की स्थिति में लाने वाला विधेयक इसी सत्र में लाएगी. रामविलास पासवान ने इस फ़ैसले को ऐतिहासिक बताते हुए मोदी सरकार की प्रशंसा की. उनके इस क़दम को इस संकेत रूप में लिया गया कि अब एलजेपी आंदोलन में भाग नहीं लेगी. जानकारों का कहना है कि एलजेपी के शामिल होने और नहीं होने की संभावना ने आंदोलन को लेकर लोगों को असमंजस में डाल दिया है.

हालांकि दलित संगठनों ने ऐलान किया है कि वे नौ अगस्त को भारत बंद करके रहेंगे. वे बंद में एलजेपी के शामिल होने को लेकर सफ़ाई भी दे रहे हैं. सत्याग्रह से बातचीत में अखिल भारतीय अंबेडकर महासभा के सदस्य अशोक भारती ने कहा, ‘बाप-बेटे (रामविलास पासवान और चिराग पासवान) अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं. वे ख़ुद ही इस आंदोलन से चिपक रहे हैं. उन्हें किसी ने नहीं बुलाया.’ अशोक भारती ने यह भी साफ़ किया कि दलित संगठन जस्टिस एके गोयल को हटाने की मांग नहीं कर रहे. भारती ने कहा कि यह रामविलास पासवान और भाजपा के दलित सांसदों की मांग है, न कि दलित संगठनों की.

संसद सत्र के अंत में ‘भारत बंद’ क्यों?

जानकारों का कहना है कि बंद की कामयाबी इस बात पर तो निर्भर करेगी ही कि अपने आंदोलन के ज़रिए दलित संगठन सरकार को कितना परेशान कर पाए लेकिन, साथ ही यह भी देखना होगा कि इसके ज़रिए वे परिणाम क्या दे पाए. उनका कहना है कि यह बंद ऐसे समय में बुलाया गया है जब एससी-एसटी एक्ट को पहले की स्थिति में लाने की ‘संसदीय’ संभावना न के बराबर बची है.

दरअसल बंद का आह्वान संसद के मॉनसून सत्र के आख़िरी दिन से एक दिन पहले किया गया है. कहा जा रहा है कि यह 16वीं लोकसभा का अंतिम संसदीय अधिवेशन है, यानी अब अगले चुनाव से पहले संसद नहीं बैठेगी. इस हफ़्ते पांच दिन संसद चलनी है. कई लोग कह रहे हैं कि अगर पहले तीन दिनों में विधेयक नहीं लाया जा सका तो चौथे दिन भारत बंद बुला कर दलित संगठन पांचवें दिन विधेयक कैसे पारित करवा पाएंगे. उनक मुताबिक बंद सत्र के आख़िरी दिन से कुछ दिन पहले बुलाया जाना चाहिए था ताकि सरकार पर विधेयक पारित कराने का दबाव ज़्यादा दिनों तक रहता. हालांकि सरकार ने वादा किया है कि वह इसी सत्र में विधेयक पारित कराना चाहती है.

इस पर अशोक भारती कहते हैं, ‘(सत्र ख़त्म होने से) एक दिन पहले बंद बुलाने की बात नहीं है. दो अप्रैल के भारत बंद के बाद हमने सरकार को चार महीने का वक़्त दिया था. इस दौरान उसने कुछ नहीं किया. वह संसद में विधेयक नहीं लाई. इसलिए हमने मोहलत ख़त्म कर बंद बुलाया है.’

आदिवासी समाज नाराज़

लेकिन इस बंद के अभी से कमज़ोर दिखने का एक और मुख्य कारण है जो काफ़ी दिलचस्प भी है. दावा किया जा रहा है कि आदिवासी समुदाय इस बार के भारत बंद से नाराज़ है. सोशल मीडिया पर आदिवासी संगठन व समाज के लोग इस भारत बंद को कुछ दलित संगठनों की साज़िश बता रहे हैं. समुदाय का कहना है कि दलित संगठनों ने नौ अगस्त को ही भारत बंद क्यों बुलाया, जबकि उस दिन विश्व आदिवासी दिवस है जो उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण दिन है. उनके मुताबिक यह पहला मौक़ा नहीं है जब आदिवासी समाज के महत्व से जुड़े दिनों और कार्यक्रमों को दबाने के लिए भारत बंद का आयोजन किया गया है.

मध्य प्रदेश समेत अन्य राज्यों में इस बार आदिवासी दिवस बड़े पैमाने पर मनाए जाने की योजना है. उसी दिन ‘भारत बंद’ भी होना है. इस पर फ़ॉरवर्ड प्रेस के हिंदी संपादक राजन कुमार जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) नाम के एक संगठन के संरक्षक हीरालाल अलावा के हवाले से लिखते हैं, ‘दलित संगठन के कुछ लोग आदिवासियों के आयोजन-कार्यक्रम वाले दिन बंद बुलाकर आदिवासियों-दलितों के बीच मतभेद पैदा करना चाहते हैं जो सरासर ग़लत है. जयस इसका खुला विरोध करता है.’

राजन मानते हैं इससे पहले दो अप्रैल का भारत बंद भी आदिवासियों की एकजुटता ख़त्म करने के लिए बुलाया गया था. उन्होंने लिखा है, ‘हीरालाल अलावा ने बताया कि पिछली बार एक अप्रैल को ‘मिशन 2018, दिल्ली घेराव’ के आंदोलन को असफल करने के लिए इन्हीं दलित संगठनों ने दो अप्रैल को भारत बंद बुलाकर आदिवासियों की एकजुटता को ख़त्म करने की कोशिश की थी. लेकिन इस बार आदिवासी समुदाय इन शातिर लोगों से सावधान है. (वह) इनकी बातों में नहीं आएगा. नौ अगस्त के भारत बंद को आदिवासी समुदाय समर्थन नहीं कर रहा है. यह निश्चित ही आदिवासियों के साथ छल है. दलित संगठनों को ऐसी हरकतों से बाज़ आना चाहिए.’

जयस की आपत्ति को लेकर हमने अशोक भारती से भी पूछा. वे भारत बंद का नेतृत्व कर रहे लोगों में से एक हैं. उनका कहना था, ‘बंद को लेकर कुछ दलित और आदिवासी विचारकों व कार्यकर्ताओं की अलग राय हो सकती है लेकिन, ज़्यादातर लोग आंदोलन के साथ हैं.’ भारती ने इस आरोप को भी ख़ारिज किया कि दलित संगठन उन्हीं दिनों भारत बंद बुलाते हैं जो आदिवासी समुदाय के लिए सामाजिक रूप से काफ़ी महत्वपूर्ण हैं.

इस बारे में सत्याग्रह ने हीरालाल अलावा से भी बात की. उन्होंने नौ अगस्त को भारत बंद बुलाए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई. अलावा ने कहा, ‘हम नहीं जानते ये बंद किन (दलित) संगठनों ने बुलाया है. (लेकिन) हम इसे आदिवासी समाज के ख़िलाफ़ षड्यंत्र मानते हैं. नौ अगस्त को हमारे समाज के कई कार्यक्रम हैं. उसी दिन भारत बंद क्यों बुलाया गया. जयस इस भारत बंद का पूरी तरह विरोध करता है.’