चुनाव लोकतान्त्रिक प्रणाली का एक अहम हिस्सा होता है. इसमें जनता अपनी इच्छा और उम्मीद को ध्यान में रखते हुए किसी पार्टी या उम्मीदवार का चयन करती है. इसके साथ-साथ चुनाव एक ऐसे यन्त्र की तरह भी होता है जिससे देश और समाज की आबोहवा को मापने में मदद मिलती है. भारत में संवैधानिक तौर पर चुनाव हर पांच साल के अन्तराल पर निहित हैं और जनता इनमें डाले गये वोटों के जरिये नयी या पुरानी ऐसी सरकार को चुनती है जो उसकी भावनाओं के करीब हो.

अगर अगला लोक सभा चुनाव अपने निर्धारित समय पर हुआ तो उसमें अब सिर्फ 10 महीने का समय बचा है. तो क्यों न यह देखने की कोशिश की जाये कि पहले के चुनावों से इसके लिए क्या संकेत देखने को मिलते हैं. इस श्रृंखला की पिछली कड़ी में इस लेखक ने पिछले चुनावों से जुड़े आंकड़ों के आधार पर कांग्रेस पार्टी की चुनावी संभावनाओं का विश्लेषण किया था. इस लेख में उसी तरह का विश्लेषण केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के लिए करने की कोशिश की गयी है.

2014 का चुनाव परिणाम कई मायनों में अप्रत्याशित था जिसके कई तरह के विश्लेषण किए जाते रहे हैं. उन सभी विश्लेषणों में भाजपा की जीत के दो कारण जरुर गिनाए जाते रहे हैं. पहला कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन-2 सरकार की नाकामियां और दूसरा नरेंद्र मोदी की लहर. मोदी लहर सिर्फ लोकसभा चुनाव तक ही सीमित नहीं रही बल्कि वह एक के बाद एक, कई राज्यों में भाजपा की सरकार बनाने में भी सफल रही. उसी का परिणाम है कि कई विश्लेषकों को लगता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए बहुमत लाना बहुत ही आसान होगा.

लेकिन क्या पिछले चुनावों में बीजेपी को मिले वोटों के विश्लेषण से भी ऐसा ही कुछ संकेत मिलता है?

नीचे के ग्राफ में 1952 से लेकर 2014 के चुनाव तक बीजेपी के मतों में हुए बदलाव को दिखाया गया है. 1980 में भाजपा के गठन से पहले वह जनसंघ या भारतीय जनसंघ हुआ करती थी. 1977 के चुनाव में भारतीय जनसंघ ने अन्य कई पार्टियों के साथ मिलकर जनता पार्टी के तौर पर चुनाव लड़ा था और 1980 में उसने चुनाव में चुनाव में हिस्सा नहीं लिया था. इसलिए ग्राफ में 1977, 1980 तथा 1984 के आंकड़े शून्य हैं.

भारतीय जनता पार्टी, भारतीय जनसंघ या जनसंघ के मतों में बदलाव, 1957-2014

स्रोत : भारतीय चुनाव आयोग और त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा, सभी आंकड़े प्रतिशत में
स्रोत : भारतीय चुनाव आयोग और त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डाटा, सभी आंकड़े प्रतिशत में

1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ था और पहली बार वह 1984 का चुनाव लड़ी थी. 1984 से 1998 के चुनाव तक हर बार भाजपा के वोटों में पिछले चुनाव की तुलना में इजाफा हुआ. लेकिन 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की पहली सरकार बनने के बाद यह स्थिति उलट गई. इसके बाद के तीन चुनावों में भाजपा के मत प्रतिशत में लगातार गिरावट देखी गई. यहां तक कि 1999 में सत्ता में आने के बाद भी उसके वोट कम ही हुए थे. इसके अलावा 1952 से अभी तक हुए 16 लोकसभा चुनावों में सिर्फ चार बार ही पिछली बार के मुकाबले सतारूढ़ पार्टी के मत प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई है. और चारों मर्तबा ऐसा सिर्फ कांग्रेस के साथ ही हुआ है. भाजपा अभी तक कभी भी केंद्र में सत्ता में आने के बाद पिछली बार की तुलना में अपने मतों में इजाफा करने में सफल नहीं रही है.

ऐसे में सवाल यह है कि भाजपा 2019 के चुनाव में अपने पुराने रिकॉर्ड को बदल पायेगी. 2014 के चुनाव में भाजपा को भारी बहुमत मिला था. इस अप्रत्याशित जनसमर्थन का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 2014 में भाजपा को पिछले चुनाव के मुकाबले लगभग 12 प्रतिशत ज्यादा मत मिले थे. भारतीय लोकसभा चुनावों के इतिहास में किसी एक पार्टी के वोट प्रतिशत में कभी इतनी बढ़ोतरी नहीं हुई थी.

2014 के चुनाव की एक खास बात यह भी है कि इस दौरान 2009 की तुलना में करीब 12 करोड़ अधिक मतदाता थे. और इस चुनाव में पहले के मुकाबले करीब 14 करोड़ अधिक लोगों ने मतदान किया था. इस चुनाव में 2009 के मुकाबले भाजपा को लगभग नौ करोड़ ज्यादा मतदाताओं ने वोट किया था.

2014 से पहले के किसी भी चुनाव में न तो कभी इतने ज्यादा मतदाता जुड़े, न ही इतनी अधिक संख्या में मतदाता वोट करने आये और न ही किसी पार्टी को किसी एक चुनाव में पिछले चुनाव की तुलना में इतने अधिक वोट मिले. यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि 2014 के ही चुनाव में कांग्रेस को करीब 11 करोड़ मतदाताओं ने समर्थन दिया था जोकि भाजपा बढ़े हुए मतों (9 करोड़) से थोड़ा ही ज्यादा था.

इसके अलावा 2014 के चुनाव में कई राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान आदि राज्यों में 90 प्रतिशत से ज्यादा सीटें भाजपा ने जीती थीं जिसको दोहराना उसके लिए 2019 में उतना आसान नहीं होगा.

भाजपा के लिए 2019 के चुनाव में एक और बड़ी चुनौती है विपक्ष का एक मजबूत गठबंधन बनाने की दिशा में आगे बढ़ना. उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का गठबंधन पहले ही उपचुनाव में बीजेपी को इसका नजारा दिखा चुका है. कांग्रेस भी अब राज्य-स्तरीय पार्टियों, जैसे महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा, कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) और अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन बनाने की दिशा में आगे बढ़ चुकी है. अगर इस प्रकार से विपक्ष 2019 में एक मजबूत गठबंधन बनाने में सफल रही तो 2019 का चुनाव कई मायनों में बेहद रोचक होने वाला है.