छह अगस्त भारतीय फुटबॉल के लिए खुशखबरी का दिन था. भारत की अंडर-20 टीम ने स्पेन में खेले जा रहे कोटिफ कप में अर्जेंटीना की अंडर-20 टीम को 2-1 से हरा दिया. भारत और अर्जेंटीना के फुटबॉल ढांचे में कितना बड़ा फर्क है, इसे देखते हुए इस जीत की एेतिहासकिता का अंदाजा लगाया जा सकता है. इसी दिन भारतीय फुटबॉल जगत का उत्साह बढ़ाने वाली एक और खबर आई. जॉर्डन में खेले जा रही डब्ल्यूएएफएफ अंडर-16 चैंपियनशिप में भारत ने इराक को 1-0 से हरा दिया. इराक एशियन फुटबॉल के कद्दावरों में गिना जाता है. भारत की इराक पर जीत कितनी बड़ी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत ने इससे पहले किसी भी आयु वर्ग में इराक को नहीं हराया था.

फीफा के बहुचर्चित पूर्व प्रेसीडेंट सेप ब्लाटर ने कभी कहा था ‘भारत फुटबॉल का सोया महाबली है.’ माना जा सकता है कि उस समय भारत दौरे पर आए ब्लाटर ने रस्मी उत्साहवर्धन में यह बात कही हो, लेकिन आज दो आयु वर्गों में भारत की जीत उसकी फुटबॉल प्रतिभा के बारे में यह आंशिक सच्चाई भी बताती है.

क्रिकेट को धर्म मानने वाला भारत इंग्लैंड से पहले टेस्ट में हार के विश्लेषणों में डूबा हुआ था कि तभी कोटिफ कप में भारतीय टीम की उपलब्धि ने सभी को चौंका दिया. भारत में ज्यादातर लोग विश्व फुटबॉल को अर्जेंटीना और ब्राजील से ही जोड़ते हैं. भारत की किसी टीम ने माराडोना और मेसी के देश को फुटबॉल में हरा दिया, यह बात क्रिकेट प्रेमियों को भी चौंकाने वाली थी. क्रिकेट विशेषज्ञ हर्षा भोगले ने भी भारत की इस जीत पर ट्वीट किया कि भारत फुटबॉल में अंतरराष्ट्रीय स्तर की क्षमता रखता है.

लेकिन यह क्षमता मैदान पर नियमित रूप से कब दिखेगी? लखनऊ के एक पब्लिक स्कूल में फुटबॉल कोच रमेश कुमार कहते हैं, ‘भारत में फुटबॉल की लोकप्रियता की हालत यह है कि अभी लोग देश की राष्ट्रीय टीम के ही सारे खिलाड़ियों के नाम नहीं जाानते तो अंडर-20 के खिलाड़ियों को पहचानने का सवाल कहांं उठता है? लेकिन अंडर-20 टीम के खिलाड़ियों के अर्जेंटीना के हराने के बाद लोग दीपक टांगरी और अनवर अली के गोल की क्लिप देखकर चर्चा कर रहे हैं तो लगता है कि यह स्थिति बदलेगी.’

फुटबॉल के प्रशंसक दीपक कुमार इस जीत से अभिभूत नजर आते हैं. वे कहते हैं, ‘खेल की शुरुअात के पांच मिनट बाद ही दीपक टांगरी ने उस अर्जेंटीना के खिलाफ गोल कर दिया जो फुटब़ॉल की महाशक्ति माना जाता है और जिसकी अंडर-20 टीम के ज्यादातर खिलाड़ी वहां की टॉप डिवीजन मेंं खेलते हैं.’ अर्जेंटीना की इस टीम के कई खिलाड़ी वहां के सबसे अच्छे क्लब बोका जूनियर्स से खेलते हैं. बोका जूनियर्स विश्वस्तरीय क्लबों में से एक है. जाहिर है कि फुटबॉल को करीब से जानने वाले इस जीत का महत्व समझते हैं. अर्जेंटीना की टीम कोटिफ कप छह बार जीत चुकी है.

खेल पत्रकार संतोष शुक्ला इस बात के दूसरे पहलू पर बात करते हैं. वे कहते हैं, ‘बतौर दर्शक हम किसी खेल की ओर तब आकर्षित होते हैं जब वह कोई उपलब्धि हासिल करता है.’ वे उदाहरण देते हुुए कहते हैं, ‘ट्रैक एंड फील्ड स्पर्धाओं में भारतीयोंं की रुचि शायद न्यूनतम है,लेकिन अगर कोई एथलीट ओलंपिक या एशियन गेम्स में अच्छा प्रदर्शन करता है तो रातों-रात वह स्टार बन जाता है. लेकिन अफसोस कि हमारा खेल ढांचा एेसा नहीं है कि ये लगातार होता रहे. फुटबॉल में इधर कुछ अच्छी खबरें आई हैं. उम्मीद है कि इनकी निरंतरता बनी रहेगी.’

फुटबॉल प्रेमी सुनील का मानना है, ‘अंडर-20 में भारत की अर्जेंटीना पर जीत को अगर आप अंडर-16 में इराक की भारत पर जीत से जोड़कर देखेंगे तो अापको फुटबॉल का बदलता परिदृश्य नजर आएगा. अंडर-13 से लेकर अंडर-20 तक हमारे खिलाड़ी अच्छा खेल रहे हैं. साफ है कि आने वाले दो चार साल में भारत की राष्ट्रीय फुटबॉल टीम काफी सशक्त होगी.’ सुनील की बात महत्व रखती है क्योंकि इराक-ईरान जैसे देशों में भारत से काफी बेहतर फुटबॉल ढांचा है. एेसे में इराक को एक कड़े मुकबले में हरा देना बड़ी बात है. लेकिन निरंतरता का सवाल तो अपनी जगह बना रहता है.

फुटबॉल प्रशिक्षक रमेश कुमार का मानना है कि भारत के पास स्तरीय खिलाड़ी हैं लेकिन, क्या फुटबॉल प्रशासन देश में क्लब और लीग फुटबॉल को अंतराराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा लायक बनाने के प्रति प्रतिबद्ध है? वे कहते हैं, ‘लीग, प्रायोजन और फुटबॉल अकादमियों की बातें होती हैं लेकिन, हकीकत में हम अभी भी इंडियन सुपर लीग और आई-लीग में टॉप लीग कौन सी है. हम इसी झगड़े में उलझें हैं.’

खैर, ये सारी बातें अपनी जगह हैं. लेकिन भारत के पास बीते कुछ समय में फुटबॉल से कुछ अच्छी खबरें आई हैं जिन्हें भविष्य के लिहाज से अच्छा कहा जा सकता है. भारत ने अंडर-17 फीफा विश्व कप का आयोजन कर भी एक पहल की है. लेकिन इस सच्चाई से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि अभी भी भारत में खिलाड़ियों से ज्यादा फेडरेशन के आपसी झगड़ों की खबरें बनती हैं क्योंकि इनसे ज्यादातर कद्दावर राजनेता जुड़े होतेे हैं. जानकारों का मानना है कि भारत में खेल संस्कृति पनपे, इसके लिए खेल प्रशासन पेशेवर लोगोंं के हाथ में ही होना चाहिए. और फिलहाल इसकी सबसे ज्यादा जरूरत भारतीय फुटबॉल को जरूरत दिखती है.

कुछ दिनों पहले सुनील छेत्री के एक भावुक वीडियो ने भारतीय फुटबॉल में खासी चर्चा बटोरी. सुनील की अपील के बाद मुंबई फुटबॉल एरेना के खाली मैदान भर गए. लेकिन तमाम भावुकता के बाद भी वह वीडियो भारतीयों की फुटबॉल के प्रति उदासीनता को ही बताने वाला था.

लेकिन अंडर-20 मुकाबले मेंं भारत के अर्जेंटीना और अंडर-16 में इराक को हराना ऐतिहासिक उपलब्धि है. फीफा की अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में भारत पिछले तीन सालों में 172 से 93 पहुंच चुका है. टेलीविजन पर फुटबॉल मैचों की कवरेज ने एक तबके में फुटबॉल के प्रति रुचि बढाई है. इंग्लिश और प्रीमियर लीग में रुचि रखने वालों की नजरें अब भारतीय फुटबॉल की तरफ भी घूम रही हैं. तो क्या वाकई फुटबॉल का सोया महाबली जाग रहा है? सफर अभी लंबा है.