महज़ एक महीने से भी कम अंतराल में बनी चार ख़बरें इस तरह हैं:

1. 9 अगस्त 2018 : राज्य सभा के उपसभापति के लिए हुए चुनाव में भाजपा और उसके नेतृत्व वाले एनडीए (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) के पास इतना संख्याबल नहीं था कि वह अपने प्रत्याशी (जेडीयू के हरिवंश नारायण सिंह) को जिता सके. इसलिए वह अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (13), बीजू जनता दल (9), तेलंगाना राष्ट्र समिति (6) जैसे दलों से समर्थन की आस लगाए हुए थी. टीआरएस सहित तीनों दलों ने उसकी यह आस पूरी भी की और हरिवंश नारायण सदन के 125 सदस्यों के समर्थन से उपसभापति बन गए.

2. चार अगस्त 2018 : दिल्ली में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात हुई. बातचीत एक घंटे के आसपास चली. इसके बाद सूत्रों ने ख़बर दी कि दोनों नेताओं के बीच 2019 के लोक सभा चुनाव और उसके बाद बनने वाली संभावित परिस्थितियों के बारे में विस्तार से चर्चा हुई है. संभावनाएं ये भी टटोली गईं कि क्या लोक सभा चुनाव में दोनों पार्टियां साथ आ सकती हैं. बताते हैं कि इसमें टीआरएस की तरफ से प्रतिक्रिया काफी सकारात्मक रही है. बशर्ते केंद्र सरकार उसकी कुछ मांगें मान ले.

3. तीन अगस्त 2018 : राज्य सभा के सभापति एम वेंकैया नायडू की विभिन्न दलों के नेताओं के साथ साप्ताहिक बैठक (संसद के दौरान होती है) हुई. इसमें नायडू ने ख़ुद अपने विरोध से जुड़ा एक मसला उठाया. उन्होंने ख़बरों का हवाला देते हुए बताया कि विपक्ष की कुछ पार्टियां उनसे नाराज़ हैं और वे अपना विरोध ज़ताने के लिए उन्हें एक संयुक्त पत्र लिखने की तैयारी में हैं. इन पार्टियों को लगता है कि सदन संचालन के दौरान वे उनको तवज्ज़ो नहीं देते. यह बताकर उन्होंने मौज़ूद सदस्यों से कहा कि उन्हें कोई परेशानी हो तो यहीं खुलकर बताएं.

इस पर समाजवादी पार्टी, बीजू जनता दल (बीजेडी) के साथ टीआरएस ने सबसे पहले नायडू का समर्थन किया. उन पर भरोसा जताया. उन्हें यह भी बताया कि वे (तीनों पार्टियां) सभापति का विरोध जताने वाली किसी कवायद में न तो शामिल हैं और न होंगे. टीआरएस के राज्य सभा सदस्य डी श्रीनिवास ने तो नायडू को अलग से भी एक पत्र लिख दिया. इसमें कहा, ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ पार्टियां सभापति पर झूठे आरोप लगा रही हैं कि वे किसी पक्ष विशेष से पक्षपात करते हैं. आप पर लग रहे इस तरह के आरोपों को हम रत्ती भर भी स्वीकार नहीं करते.’

4. 20 जुलाई 2018 : केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के चार साल के कार्यकाल के दौरान उसके ख़िलाफ़ लाए गए पहले अविश्वास प्रस्ताव पर लोक सभा में मतदान हुआ. विपक्ष की हार तय थी क्योंकि उसके पास समर्थक सांसदों की ज़रूरी संख्या ही नहीं थी. फिर भी विपक्षी पार्टियां अविश्वास प्रस्ताव की कवायद के ज़रिए आपसी विश्वास मज़बूत करना चाहती थीं. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. मतदान के दौरान बीजेडी के साथ टीआरएस के सांसद भी सदन से उठकर चले गए. इस तरह अप्रत्यक्ष रूप से ही सही पर मोदी सरकार की मदद हो गई.

तो क्या इसका मतलब ये है कि टीआरएस-भाजपा नज़दीक आ रहे हैं?

महज़ इन तीन ख़बरों के आधार पर कोई मतलब निकालना शायद ज़ल्दबाज़ी हो पर ख़बरें तो इससे कुछ पुरानी भी ऐसी ही हैं. मसलन - जून के महीने में ही 10 दिन के भीतर केसीआर और उनके पुत्र केटीआर (केटी रामाराव) प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिल लिए. पहले 15 जून को केसीआर की प्रधानमंत्री की मुलाकात हुई. फिर 27 जून को केटीआर की. जबकि इसी दौरान आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू बाट ही जोहते रहे लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री से मिलने का वक़्त नहीं मिला.

नायडू की पार्टी के सांसद भी कड़प्पा इस्पात संयंत्र के मसले पर प्रधानमंत्री को ज्ञापन देना चाहते थे. लेकिन जब उनके पार्टी प्रमुख को प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से समय नहीं मिला तो उन्हें कैसे मिलता? सो सब के सब केंद्रीय इस्पात मंत्री बीरेंद्र सिंह से मिलकर लौट आए. केरल के मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन की तो तीन बार प्रधानमंत्री से मिलने की आरज़ू धरी ही रह गई. पर केसीआर इन सभी के मुकाबले ख़ुशकिस्मत निकले.

बात इससे भी आगे. जून में प्रधानमंत्री से मिलकर जब केसीआर और केटीआर तेलंगाना लौटे तो वहां से कई अलग-अलग ख़बरें आईं. एक ये कि केसीआर राज्य में समय से पहले विधानसभा चुनाव के लिए तैयार हैं. यानी मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे राज्यों के साथ. कहा तो यहां तक गया कि उन्होंने पार्टी की संभावनाओं का सर्वे कराना और जीतने वाले उम्मीदवार ढूंढना भी शुरू कर दिए हैं. दूसरी ख़बर यह थी कि लोक सभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के प्रधानमंत्री के विचार का टीआरएस और उसके प्रमुख केसीआर समर्थन करते हैं. एक अन्य ख़बर यह भी आई कि केसीआर इस बार विधानसभा के साथ लोक सभा का चुनाव लड़ने का भी मन बना रहे हैं. ताकि ख़ुद राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका निभा सकें और पुत्र केटीआर को तेलंगाना की कमान सौंप सकें.

ये तमाम ख़बरें इसी तरफ इशारा कर रही थीं कि केसीआर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच कुछ न कुछ तो ऐसा चल रहा है जाे भविष्य की राजनीति पर असर डाल सकता है. फिर ऐसे ही एक रोज टीआरएस की तरफ से ख़बर आती है कि पार्टी नेतृत्व पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से नाख़ुश है. इस नाख़ुशी की वज़ह यह बताई गई कि बनर्जी ने ख़ुद को संभावित फेडरल फ्रंट के प्रमुख के तौर पर पेश करना शुरू कर दिया है. जबकि इस तरह फ्रंट गठित करने का मूल विचार टीआरएस प्रमुख केसीआर का था. इस नाख़ुशी के साथ यह भी ज़ाहिर किया गया कि फेडरल फ्रंट में अगर कांग्रेस भी भागीदार होती है तो टीआरएस उसका हिस्सा नहीं होगी.

केसीआर बीती मई में कांग्रेस से दूर रहने की गरज़ से ही कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी की सरकार के शपथ ग्रहण में शामिल नहीं हुए थे. जबकि उस शपथ ग्रहण समारोह में विपक्षी दलों को अपनी एकता का प्रदर्शन करना था. लेकिन चूंकि कुमारस्वामी की सरकार कांग्रेस के बलबूते पर बनी थी इसलिए केसीआर ने कार्यक्रम से दूरी बना ली. वैसे केसीआर के लिए कांग्रेस से दूरी बनाना बनता भी है. तेलंगाना में कांग्रेस ही केसीआर की मुख्य चुनौती है. सो ऐसे में वे अगर भाजपा को अपने लिए ज़्यादा मुफ़ीद समझें तो कोई ज़्यादा अचरज नहीं होना चाहिए.

टीआरएस-भाजपा साथ आएंगे क्यों और आए भी तो किसे क्या फ़ायदा?

यानी दीवार पर लिखी जा रही इबारत धीरे-धीरे ही सही पर काफी हद साफ होती जा रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि टीआरएस और भाजपा सीधे या अप्रत्यक्ष तौर पर भी अगर साथ आते हैं तो किसे क्या फायदा हो सकता है? और दूसरा ये कि इनके लिए एक-दूसरे का साथ क्यों ज़रूरी है? इसमें दूसरे सवाल का ज़वाब पहले दिया जाए तो वह ये है कि भाजपा को दक्षिण में अपनी जड़ें जमाना है. कर्नाटक में उसका आधार काफी हद तक तैयार है. वह वहां विधानसभा की 104 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है. तमिलनाडु में उसे सत्ताधारी एआईएडीएमके (अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) का साथ मिल रहा है. लेकिन आंध्र-तेलंगाना ऐसे राज्य हैं जहां वह अकेली पड़ गई है. इन राज्यों में बीते चार सालों से तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) भाजपा के साथ थी. लेकिन आंध्र को विशेष राज्य का दर्ज़ा न देने से नाराज़ टीडीपी ने भाजपा का साथ छोड़ दिया. इसलिए अब उसे एक मज़बूत राजनीतिक सहयोगी की ज़रूरत है जिसके बल पर वह इन राज्यों में पैर जमा सके.

ऐसे में भाजपा के लिए टीआरएस ही मुफ़ीद विकल्प हो सकता है. हालांकि इन राज्यों में अभिनेता से नेता बने पवन कल्याण की पार्टी जनसेना भी है, लेकिन वह अभी बिल्कुल नौसिखिया है. दूसरी है वाईएसआर कांग्रेस, जो भाजपा के साथ आना भी चाहती है. उसे संसद में लगातार सहयोग भी दे रही है लेकिन उसके प्रमुख जगनमोहन रेड्‌डी का दामन दागदार है. वे आय से अधिक संपत्ति जमा करने और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए हैं. इन आरोपों में जेल में वक़्त बिताकर आए हैं. सो उनका साथ भाजपा के लिए जोख़म भरा है. ऐसे में ले-देकर टीआरएस ही बच जाती है, जिसके प्रमुख केसीआर की छवि फिलहाल प्रधानमंत्री मोदी की तरह ही एक तरक्क़ीपसंद नेता की बन चुकी है.

इसी तरह टीआरएस भी फिलहाल यह मानकर चल रही है कि तेलंगाना में अगली बार भी सरकार उसकी ही बनेगी. बल्कि केटीआर ने दावा भी किया है कि विधानसभा के चुनाव जब चाहे हो जाएं, टीआरएस को आराम से 100 सीटों पर जीत हासिल होगी. दूसरी तरफ टीआरएस यह भी लगभग मान ही रही है कि केंद्र में भी अगली सरकार नरेंद्र मोदी की ही बनने वाली है. फिर चाहे भाजपा के पूर्ण बहुमत से बने या दूसरे दलों के सहयोग से. लिहाज़ा केंद्र की मदद से वे तेलंगाना को हर मामले में आंध्र से आगे खड़ा करने के लिए भाजपा से संबंध सहज रखने को तरज़ीह दे रहे हैं. भाजपा को भी इसमें कोई परेशानी नहीं दिखती क्योंकि टीडीपी की तरह टीआरएस तेलंगाना के लिए विशेष राज्य का दर्ज़ा चाहती तो है लेकिन इस मांग पर अड़ नहीं रही है बल्कि केंद्र से वित्तीय मदद हासिल कर दूसरे रास्तों से आगे बढ़ रही है.

इस तरह ज़रूरत दोतरफा है और फ़ायदा भी. सो अब इसी फायदे की बात. इसमें टीआरएस का फायदा तो लगभग बताया ही जा चुका है. वह सब हालांकि उस स्थिति में ही होगा जब केंद्र में नरेंद्र मोदी और तेलंगाना में केसीआर 2019 में दोबारा सत्ता में लौटें. सो अब बात ये कि भाजपा को बदले में टीआरएस क्या दे सकती है? इसका ज़वाब देती ख़बरों की मानें तो तेलंगाना में भाजपा को टीआरएस ज़्यादा गुंजाइश शायद न दे क्योंकि उसे लगता है कि अभी उसके पास राज्य में जिताऊ उम्मीदवार ही नहीं हैं. अलबत्ता इतना ज़रूर हो सकता है कि राज्य में उसके मौज़ूदा पांच विधायकों के ख़िलाफ़ अपने उम्मीदवार खड़े न करे. साथ ही ऐसी एक-दो सीटों पर कमज़ोर उम्मीदवार उतारे जहां भाजपा को जीत मिल सकती है. राज्य में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तौर पर उसकी तरफ से इतनी ही मदद मिलने की संभावना है.

लेकिन केंद्र में यही टीआरएस भाजपा के लिए गेमचेंजर हो सकती है यानी खेल की दिशा बदलने वाली. ख़ास तौर पर उस स्थिति में जब भाजपा को सरकार बनाने लायक पूरा बहुमत न मिले और टीआरएस ठीक-ठाक तादाद में अपने सांसदों को जिताकर दिल्ली भेज पाए. तब उसका यह संख्या बल नरेंद्र मोदी की अगली सरकार को टेक लगाने में काफी काम आएगा. वैसे भविष्य की आने वाले कल पर छोड़ भी दें तो वर्तमान में भी टीआरएस संसद में मोदी सरकार के लिए इसी तरह की टेक लगाने का काम बखूबी कर ही रही है. जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) और नोटबंदी जैसे मोदी सरकार के फैसलों को समर्थन. अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के दौरान ग़ैर-मौज़ूदगी. कई अहम विधेयकों को पारित कराने के लिए सरकार के पक्ष में मतदान. ऐसे तमाम उदाहरण बीते दिनाें में लगातार सामने आए हैं. वही अटकलों को हवा भी दे रहे हैं.