दिल्ली के सोनिया विहार इलाके में लैंडफिल (कचरा भराव क्षेत्र) बनाए जाने के प्रस्ताव पर वहां स्थानीय लोगों के विरोध को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को कड़ी फटकार लगाई है. अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि आम आदमी के रिहाइशी इलाके के बजाय सरकार दिल्ली के उपराज्यपाल के आधिकारिक निवास के आगे कूड़ा क्यों नहीं फेंक देती.

द टाइम्स आॅफ इंडिया के मुताबिक दिल्ली में लैंडफिल और कचरा निस्तारण के मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता की खंडपीठ ने कहा कि कूड़े के निस्तारण को लेकर दिल्ली की स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ती जा रही है. अदालत ने कहा कि राजधानी की सड़कों पर कचरा बिखरा हुआ है और इस समस्या के समाधान के लिए गंभीर प्रयास नहीं किए जा रहे. शीर्ष अदालत ने दिल्ली सरकार की तरफ से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद से पूछा कि क्या इन हालात में दिल्ली रहने लायक बचेगी.

इस पर दिल्ली सरकार का पक्ष रखते हुए पिंकी आनंद ने अदालत को बताया कि इस समस्या के समाधान में कुछ समय लगेगा और इसे रातों-रात नहीं हल किया जा सकता. उन्होंने कहा कि उत्तरी ओर दक्षिणी नगर निगम कचरे से बिजली बनाने के नए संयंत्र लगाने की दिशा में काम कर रहे हैं जिनके अगले सा​ल दिसंबर तक शुरू होने की उम्मीद है.

सोनिया विहार में लैंडफिल के मुद्दे पर अदालत ने कहा कि इस प्रस्ताव से पहले स्थानीय लोगों को विश्वास में लिया जाना चाहिए था. अदालत ने यह भी कहा कि यह 1975 के आपातकाल वाला दौर नहीं है जहां आम जनता के मत को नजरअंदाज किया जाए. उसका कहना था कि सोनिया विहार कैसा इलाका है ये अदालत नहीं जानती, लेकिन सरकार की किसी योजना से लोगों की जीवन-शैली और उनका रहन-सहन प्रभावित हो यह स्वीकार्य नहीं है. इसके साथ ही दोनों जजों ने दिल्ली सरकार को घर-घर के स्तर पर ठोस और दोबारा इस्तेमाल में लाए जा सकने वाले कचरे को अलग-अलग तरीके से इकट्ठा किए जाने के संबंध में बनाई योजनाओं की रिपोर्ट सौंपने को भी कहा है.