‘अगर आप पटकथा लेखक बनना चाहते हैं तो इसका एक मतलब यह भी है कि आप किसी जहाज के सह-पायलट बनना चाहते हैं.’ 

— मार्शल ब्रिकमैन, अमेरिका के जाने-माने पटकथा लेखक

‘आप पटकथा लिखना चाहते हैं तो वह लिखें जिसे आप अच्छी तरह जानते हैं. समझते हैं. जिसकी आप फिक्र करते हैं’

— शेन कनॉटन, आयरिश पटकथा लेखक

‘लेखन की कला ज़िंदगी को अर्थ देती है. इसलिए पटकथा लेखन की विधा को हल्के में नहीं लेना चाहिए. यह एक गंभीर विषय है.’ 

— अमेरिका के वरिष्ठ कहानीकार और पटकथा लेखक

जब आप तमिल राजनीति के ‘कलैनार’ (कला का विद्वान) को संपूर्णता से समझना चाहते हैं तो दुनिया के कुछ जाने-माने पटकथा लेखकों के ऐसे विचार आपकी मदद कर सकते हैं. वे भी पटकथा लेखक ही थे. अच्छी तरह समझते थे कि यह विधा ही उनकी ज़िंदगी को नए अर्थ देने वाली है. इसीलिए उन्होंने इसे हल्के में लिया भी नहीं. हमेशा वही लिखा जिसकी उन्हें फ़िक़्र थी. जिस विषय से वे अच्छी तरह वाक़िफ़ थे. इसके साथ ही वे यह भी उतने ही बेहतर तरीके से जानते थे कि पटकथा लेखक के तौर पर वे अगर आज किसी विमान के सह-पायलट हैं तो कल उसी के पायलट भी बन सकते हैं. और उनकी यह सोच-समझ रत्ती भर भी गलत साबित नहीं हुई.

यह एम करुणानिधि थे. मुथुवेल करुणानिधि, पूरा नाम. मंगलवार की शाम उनके जीवन की पटकथा पर विराम लग गया. लेकिन इससे पहले वे जो लिख गए, उस इबारत का आने वाली कई सदियों तक मिटना मुश्किल है. फिर चाहे वह तमिल फिल्में और रंगमंच हों या फिर द्रविड़ राजनीति. हर क्षेत्र में उन्होंने इस खूबी से पटकथा लिखी कि सह-पायलट से पायलट की सीट पर आने में उन्हें ज़्यादा वक़्त नहीं लगा.

1940-50 के दशक की बात है. युवा करुणानिधि उस ज़माने में सीएन अन्नादुरई के साथ तमिल रंगमंच और फिल्मों के लिए पटकथा लिखते थे. ईवी रामासामी ‘पेरियार’ के ‘आत्मसम्मान आंदोलन’ में भी दोनों साथ थे, जिसे आम बोलचाल की भाषा में ‘द्रविड़ियन मूवमेंट’ (निचली जातियों को तमिलनाडु में द्रविड़ कहा जाता था जिनके आत्मसम्मान को स्थापित करने के लिए यह आंदोलन हुआ था) भी कहा जाता है. सन् 1944 में स्थापित पेरियार की पार्टी ‘द्रविड़ार कड़गम’ (डीके) की अगुवाई में यह आंदोलन चलाया गया था.

इसी बीच 1949 में पेरियार और अन्नादुरई के रास्ते अलग हो गए. यहां याद रखना होगा कि अन्नादुरई यानी तमिल राजनीति के पायलट. आज तमिल राजनीति जिस स्वरूप में है उसके आकार लेने की शुरूआत अन्नादुरई से ही हुई, ऐसा माना जाता है. सो ऐसे इन अन्नादुरई ने पेरियार के भतीजे ईवीके संपत, उस दौर के जाने-माने फिल्म अभिनेता केआर रामास्वामी और करुणानिधि जैसे अपने कुछ विश्वस्त सहयोगियों को साथ ले ‘द्रविड़ार कड़गम’ से अलग होकर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’ (डीएमके) की स्थापना कर ली. स्वाभाविक तौर पर इस नई पार्टी के मुखिया अन्नादुरई ही थे लेकिन, कोषाध्यक्ष जैसा जो दूसरा अहम पद था, वह करुणानिधि के खाते में गया.

फिर तीन साल बाद ही एक और अहम घटना हुई. सन् 1952 में एक फिल्म रिलीज़ हुई ‘पराशक्ति’, जिसकी पटकथा करुणानिधि ने लिखी थी. संवाद भी. इसमें यूं तो जाने-माने अभिनेता शिवाजी गणेशन ने मुख्य भूमिका निभाई थी लेकिन इसने तमिल सिनेमा के साथ राजनीति की मुख्यधारा में भी करुणानिधि को ला खड़ा किया. फिल्म में द्रविड़ जातियों पर ऊंचे तबके के अत्याचारों से लेकर भाषायी वर्चस्व की लड़ाई, भ्रष्टाचार और विस्थापित तमिलों के दर्द तक हर मुद्दे पर इसमें बात की गई थी. वह भी ऐसे प्रभावशाली अंदाज़ में कि सालों बाद भी लोग इन मसलों पर शिवाजी गणेशन के मुंह से निकले करुणानिधि के संवाद भुला नहीं पाए. यह कलैनार के बड़े सफर की शुरूआत थी.

अपनी ‘पराशक्ति’ और ‘राजकुमारी’ जैसी दर्ज़नों फिल्मों के जरिए इस वक़्त तक करुणानिधि वह मुक़ाम हासिल कर चुके थे कि कहते हैं तमिल सिनेमा के पर्दे पर सबसे पहले उनका नाम ही नज़र आया करता था. कुछ ऐसे, ‘स्टोरी एंड डायलॉग बाइ कलैनार, एम करुणानिधि.’ इसके बाद फिल्म से जुड़े अन्य लोगों और उसकी स्टारकास्ट का नाम आता था. यहां एक दिलचस्प तथ्य ये भी है कि करुणानिधि को उन मरुदुर गोपालन (एमजी) रामचंद्रन को तमिल सिनेमा में लॉन्च करने का श्रेय भी जाता है जो पहले उनके निकट सहयोगी रहे पर आगे चलकर उनके प्रतिद्वंद्वी बन गए. करुणानिधि की लिखी ‘राजकुमारी’ फिल्म से एमजीआर ने अपने फिल्मी करियर की शुरूआत की थी.

राजनीति में पायलट सीट

जैसा कि शुरुआत में जिक्र हुआ है, कलैनार अच्छी तरह जानते थे उन्हें सह-पायलट से पायलट की सीट पर कैसे पहुंचना है. अपनी ख़ुद की पटकथा को कब-कौन सी दिशा देनी है. फिल्मों के किस्से लिखते-लिखते राजनीति की किंवदंती कैसे बनना है. इसीलिए उन्होंने उस वक़्त जब पैर जम रहे थे, कभी अपने संरक्षक और मार्गदर्शक अन्नादुरई के सामने अपनी महत्वाकांक्षा को आड़े नहीं आने दिया. बल्कि उनके कहे पर ही ज़्यादातर चलते नज़र आए.

इसकी एक मिसाल है. बात 1967-68 की है. अन्नादुरई की डीएमके 1967 के राज्य विधानसभा चुनाव में 234 में से 138 सीटें जीतकर सरकार बना चुकी थी . मुख्यमंत्री अन्नादुरई की सरकार में करुणानिधि लोक निर्माण विभाग के मंत्री बनाए गए थे. उन्होंने कुछ समय पहले ही रजति अम्मल से तीसरी शादी की थी. एक बेटी भी हो चुकी थी.

सत्ताधारी पार्टी में अगली पीढ़ी के उभरते नेता से जुड़े विवाद का सियासी लाभ उठाने से भला विपक्षी कांग्रेस कैसे पीछे रहती. उसने विधानसभा में मसला उठा दिया. करुणानिधि से पूछा गया, ‘ये रजति कौन हैं?’ सवाल दागे जाते ही सदन में भारी हंगामा हुआ. कुछ देर के लिए करुणानिधि असहज़ हुए. फिर अन्नादुरई से मशविरा किया और उसे मानकर सदन में ही शांति से ऐलान किया. ‘वह (रजति) मेरी बेटी कनिमोझी की मां है.’ कांग्रेस को उम्मीद नहीं थी कि चुपचाप से की इस शादी को करुणानिधि ऐसे स्वीकार कर लेंगे. सो वह भौंचक थी और करुणानिधि आश्वस्त, अपने परिवार के भविष्य के लिहाज़ से भी. यहां भी क्योंकि वे अच्छे से जानते थे कि परिवार की पटकथा को कैसे किस दिशा में मोड़ना है. और वह उन्होंने अपने सभी बच्चों को उनका पूरा हक़ देकर कर के भी दिखाया.

संदर्भ एकदम निजी है पर यहां ज़रूरी भी कि करुणानिधि की तीन शादियां हुई थीं. उनकी पहली पत्नी पद्मावती का कम उम्र में निधन हो गया था. इस शादी से उनके एक पुत्र हुए - एमके मुथु. इनके बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि करुणानिधि इन्हें फिल्म जगत में एमजीआर के जैसा बनाना चाहते थे. इसलिए ये फिल्मों में सक्रिय भी रहे लेकिन बात बनी नहीं. अब अपना कारोबार संभालते हैं. दूसरी पत्नी दयालु अम्मल से करुणानिधि के तीन बेटे हुए. बड़े- एमके अलागिरि, जो केंद्र में मंत्री रहे और अभी राजनीति में ही सक्रिय हैं. दूसरे नंबर के एमके स्टालिन, जो चेन्नई के मेयर रहे और फिलहाल डीएमके के कार्यकारी प्रमुख हैं. तीसरे - एमके तमिलरासू, जो फिल्म निर्माता और कारोबारी हैं. दयालु अम्मल से उनकी एक बेटी भी है - एमके सेल्वी. बताया जाता है कि उन्हें राजनीति वगैरह में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं है. तीसरी पत्नी रजति से करुणानिधि की छठी संतान हुई-एम कनिमोझी. वे फिलहाल डीएमके से राज्यसभा सदस्य हैं.

इस तरह अब तक फिल्म, परिवार और राजनीति में लगातार संतुलन बिठाकर चल रहे करुणानिधि के जीवन में दूसरा बड़ा अवसर तब आया जब डीएमके सरकार बनने के दो साल बाद 1969 में अन्नादुरई का निधन हो गया. इसके बाद बिना किसी बड़ी खींचतान या विवाद के सरकार और पार्टी की कमान करुणानिधि के हाथ में आ गई. वे पहली बार राज्य के मुख्यमंत्री बने और पार्टी प्रमुख भी. इसमें से मुख्यमंत्री का पद तो उन्हें बीच-बीच में छोड़ना पड़ा क्योंकि इसका फैसला जनता करती है. उसने उन्हें 1969 के बाद चार अन्य अलग-अलग मौकों पर सत्ता पर काबिज़ किया और उतारा भी. लेकिन पार्टी प्रमुख का पद करुणानिधि ने आख़िरी सांस तक नहीं छोड़ा. उन्होंने हाल ही में डीएमके प्रमुख के रूप में 49 साल पूरे किए थे और बतौर पार्टी अध्यक्ष 50वें वर्ष में प्रवेश करने वाले पहले राजनेता भी बने थे.

मुख्यमंत्री के तौर पर भी पहली बार से ही करुणानिधि ने अपने कौशल और कुशाग्रता का भरपूर इस्तेमाल किया. सरकार के मुखिया का पद संभालने के तौर पर उन्होंने सबसे पहले उस नींव को और मज़बूत करना शुरू किया जिस पर उन्होंने अब तक का अपना पूरा ताना-बाना बुना था. वे द्रविड़ आंदोलन से निकले नेता थे इसलिए मुख्यमंत्री बनते ही उन्होंने सबसे पहले ‘आत्म-सम्मान विवाह’ (सेल्फ रिस्पेक्ट मैरिज) को कानूनी रूप दिया. यह सजातीय-अंतरजातीय प्रेम विवाह होते थे जिनमें ब्राह्मणों से वैवाहिक कर्मकांड नहीं कराए जाते थे. इसके साथ ही उन्होंने हिंदी पर तमिल भाषा को प्राथमिकता देने को भी लगातार प्रोत्साहित किया क्योंकि ग़ैरहिंदी अांदोलन भी उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि में उतने ही असरदार तरीके से धंसा हुआ था.

इसके बाद उन्होंने सियासत में अपनी रचनात्मकता का मिश्रण उड़ेला. कहा जाता है कि भारतीय राजनीति में संभवत: पहली बार गरीबों को मुफ़्त में खाद्यान्न (चावल आदि) वग़ैरह देने की शुरूआत अगर किसी ने की थी तो वे करुणानिधि थे. इसका नतीज़ा यह हुआ कि डीएमके लगातार दूसरी बार 1971 में सत्ता पर काबिज़ हुई और करुणानिधि फिर मुख्यमंत्री बने. अबकी बार ज़्यादा मज़बूती से. हालांकि इस मज़बूती के साथ कुछ विवाद भी चस्पा होते गए. भ्रष्टाचार के. भाई-भतीजावाद के. मूल विचारधारा से पार्टी को भटकाने के. इनके चलते करुणानिधि के सबसे पसंदीदा अभिनेता और राजनेता के तौर पर पार्टी में अब तक कोषाध्यक्ष का पद संभाल रहे एमजीआर ने साल भर बाद ही उनसे दूरी बना ली. अपनी अलग पार्टी- अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (बाद में इसके आगे अखिल भारतीय जोड़ा गया) बनाकर.

प्रतिद्वंद्वियों से निपटने की कलैनार की कला भी दूसरों से अलग ही थी

हालांकि इस सबका करुणानिधि पर न कोई असर पड़ना था, न पड़ा ही. अलबत्ता एमजीआर और फिर जयललिता के तौर पर उनके प्रबल प्रतिद्वंद्वी ज़रूर तमिलनाडु की राजनीति में तैयार हो गए. लेकिन इन प्रतिद्वंद्वियों से निपटने की कलैनार की कला भी दूसरों से अलहदा थी. इसके भी उदाहरण हैं. मसलन- एमजीआर के अलग होने और लगातार आरोप लगाने के बाद भी वे उन्हें हमेशा अपना ‘प्रिय मित्र’ (एमजीआर की फिल्मों की सफलता का श्रेय करुणानिधि की लेखनी को भी बराबरी से दिया जाता है) कहकर बुलाते रहे. मन में कुछ दाग रहा भी होगा तो सार्वजनिक तौर पर कभी उसे जाहिर नहीं होने दिया. फिर जब एमजीआर की उत्तराधिकारी जयललिता 1991 में मुख्यमंत्री बनीं तो उनसे भी करुणानिधि की प्रतिद्वंद्विता चलती रही लेकिन उनके अपने तरीके से. मसलन- जयललिता पर आय से अधिक संपत्ति जुटाने के जो आरोप लगे और जिनकी वज़ह से उन्हें जेल जाना पड़ा, मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी, उस सबके पीछे दिमाग करुणानिधि का माना जाता रहा.

इस सबसे एकबारगी तो जयललिता अपना आपा खो बैठीं. साल 2001 की बात है. जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके (अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) दूसरी बार सत्ता में आई थी. जयललिता फिर मुख्यमंत्री बनी थीं. लेकिन वे बदले की भावना के चलते पद की गरिमा का ख्याल नहीं रख पाईं. रातों-रात उन्होंने करुणानिधि को उनके घर से खींचकर बाहर निकलवाया और जेल में डलवा दिया. भ्रष्टाचार के आरोप तो उन पर भी थे ही. पर इन आरोपों के बजाय ज़्यादा असर दिखाया करुणानिधि के साथ हुए इस ‘दुर्व्यवहार’ ने. साथ ही करुणानिधि के व्यवहार ने भी जिन्होंने इस बदसलूकी के बावज़ूद अपनी प्रतिक्रिया को जहां तक हो सका, संयमित रखा. इसका नतीज़ा यह हुआ कि करुणानिधि के प्रति प्रदेश ही नहीं पूरे देश में सहानुभूति पैदा हुई, जिसने उन्हें 2006 में पांचवीं बार राज्य का मुख्यमंत्री बनवाने में योगदान भी दिया.

ऐसे बड़े कलैनार थे करुणानिधि, जिन्हें अपने कला-कौशल पर इतना भरोसा था कि जीवन के आखिरी पड़ाव में भी उन्होंने उम्मीद नहीं छोड़ी थी. राज्य के नागपट्‌टनम जिले के थिरुक्कुवलाई में तीन जून 1924 को जन्मे करुणानिधि साल 2016 तक 93 साल के हो चुके थे. गिरती सेहत के कारण व्हीलचेयर पर आ चुके थे. सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी कम ही देखे जा रहे थे. फिर भी राज्य के विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी की अगुवाई कर रहे थे. तभी मीडिया के कुछ लोगों ने उनसे पूछ लिया, ‘आपकी पार्टी जीती ताे मुख्यमंत्री कौन होगा?’ सवाल सुनते ही उनका सीधा-सपाट ज़वाब था, ‘ज़ाहिर तौर पर मैं ही बनूंगा. डीएमके जीती तो मैं छठी बार राज्य के मुख्यमंत्री का पद संभालूंगा.’ उनकी यह इच्छा हालांकि पूरी नहीं हुई. पर कलैनार के जीवन में शायद ही ऐसा कुछ रहा हो जिसका मलाल लेकर वे इस दुनिया से विदा हुए हों.