बीते महीने लोक सभा अध्यक्षा सुमित्रा महाजन ने उज्ज्वला योजना की पांच करोड़वीं पात्र एक महिला को गैस कनेक्शन सौंपा. इसी के साथ मोदी सरकार की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए तय किए गए प्राथमिक लक्ष्य को आठ महीने पहले हासिल कर लिया गया. एक मई, 2016 को शुरू की गई इस योजना के तहत पांच करोड़ गरीब परिवारों (बीपीएल) को इसका फायदा पहुंचाने का लक्ष्य तय किया गया था. अब इस लक्ष्य को बढ़ाकर आठ करोड़ कर दिया गया है. इसके लिए 2020 तक की समय-सीमा तय की गई है.

उज्ज्वला उन योजनाओं में शामिल है जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी निजी जिंदगी से जोड़ते हैं. वे अपने भाषणों में बताते रहे हैं कि उनकी मां चूल्हे में खाना बनाती थीं जिसकी वजह से उन्हें स्वास्थ्य सहित अन्य परेशानियों का सामना करना पड़ता था. माना जा रहा है कि इस योजना के जरिये वे गरीब वर्ग की महिलाओं पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इस कोशिश में वे काफी हद तक सफल भी रहे हैं. इसकी पुष्टि बीते साल हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में हुई थी जिसमें इस योजना की लाभार्थी मतदाताओं ने भाजपा को समर्थन देने की बात कही थी.

उज्ज्वला योजना के तहत पात्र परिवार को मुफ्त गैस कनेक्शन देने की सुविधा है. हालांकि, सामान्य ग्राहकों को जो गैस सब्सिडी दी जाती है, उससे इस योजना के लाभार्थियों को छह सिलेंडर भरवाने तक वंचित रखा जाता है. इस लिहाज से देखा जाए तो भले ही सरकार मुफ्त कनेक्शन देने की बात कहती रही हो लेकिन, इसके लाभार्थियों को सब्सिडी गंवाकर इस कनेक्शन की कीमत (लगभग 1600 रु) चुकानी पड़ती है. यह प्रावधान इस योजना की बड़ी खामी के रूप में सामने आया है.

बिहार में किशनगंज जिले की तुलसिया पंचायत की 40 वर्षीय मुन्नी बेगम बताती हैं कि उन्होंने इस साल जनवरी में गैस कनेक्शन लिया था, लेकिन अब तक केवल एक ही सिलेंडर का इस्तेमाल किया है. दूसरा अभी भी चल रहा है. यानी सात महीनों में उन्होंने केवल दो बार ही सिलेंडर भरवाया है. इसकी वजह पूछने पर वे बताती हैं, ‘घर में दो लोग (पति और बेटा) कमाने वाले हैं, जो दिल्ली-पंजाब काम करते हैं. दोनों मिलाकर जितना पैसा भेजते हैं, उससे ही पूरा घर चलाना होता है. अब उससे घर चलाए या गैस भरवाएं.’

मुन्नी बेगम के घर स्थित पारंपरिक चूल्हा और गैस चूल्हा
मुन्नी बेगम के घर स्थित पारंपरिक चूल्हा और गैस चूल्हा

मुन्नी बेगम से यह पूछने पर कि एक सिलेंडर (14.2 किलो) इतने दिन कैसे चल जाता है, वे बताती हैं, ‘आम तौर पर खाना जलावन वाले चूल्हे पर ही बनता है. लेकिन, किसी खास मौके जब कोई मेहमान आते हैं या कभी-कभी जल्दबाजी में चाय बनाना होता है तो गैस चूल्हे का इस्तेमाल करते हैं.’ उनकी 20 वर्षीय बेटी नुसरत बताती हैं, ‘हम लोगों को साल भर का जालौन (जलावन) मुफ्त में ही मिल जाता है. ऐसे में सिलेंडर भरवाने में 900 रुपये कौन खर्च करे.’

हम उनसे पूछते हैं कि यह मुफ्त जलावन कहां से आता है. नुसरत बताती हैं कि वे मक्के के खेत से मक्के के पौधों के अवशेष को एक ही बार साल भर के लिए जमा कर लेते हैं. इसके अलावा अन्य फसलों जैसे- धान,गेहूं आदि के अवशेष भी खाना बनाने के काम आते हैं. उनकी इस बात की पुष्टि पूरे गांव में सड़क किनारे और बेकार पड़ी जमीनों पर मचान बनाकर रखे हुए जलावन के ढेरों से होती है. बरसात के मौसम में भीगने से बचाने के लिए इन्हें प्लास्टिक से ढक दिया जाता है.

यह भी उज्ज्वला योजना की राह की एक बड़ी चुनौती है. दरअसल ग्रामीण भारत में आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब भी एलपीजी को खाना बनाने का मुख्य ईंधन नहीं मानता. लोग पहले घर में पड़ी लकड़ियों और उपलों का इस्तेमाल करते हैं जो मुफ्त में उपलब्ध होते हैं. उधर, गैस सिलेंडर के लिए पैसा देना पड़ता है.

उधर, खुद सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग का कहना है कि देश के 28.6 फीसदी परिवार ही खाना पकाने के लिए रसोई गैस का इस्तेमाल करते हैं. वहीं, 49 फीसदी परिवार लकड़ी से खाना पकाते हैं. नौ फीसदी परिवार रसोई में फसलों के अवशेष, जिसकी बात ऊपर नुसरत ने की है, का इस्तेमाल करते हैं. इसके अलावा आठ फीसदी उपलों और तीन फीसदी परिवार केरोसिन तेल पर खाना बनाते हैं.

सड़क किनारे और बेकार पड़ी जमीन पर जलावन का ढेर
सड़क किनारे और बेकार पड़ी जमीन पर जलावन का ढेर

उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों की मुश्किलें और भी हैं. तुलसिया की ही रहने वाली करीब 35 साल की कौसरी बेगम बताती हैं, ‘परिवार बड़ा होने की वजह से भी गैस चूल्हे पर खाना नहीं बना सकते क्योंकि इसके लिए बड़े बर्तनों का इस्तेमाल करना पड़ता है. और जो चूल्हा कनेक्शन लेते वक्त दिया जाता है, वो काफी छोटा होता है.’ उनके लिए भी सिलेंडर पर होने वाला खर्च समस्या है. वे कहती हैं, ‘सब टाइम खाना गैस चूल्हा पर ही बनाएंगे तो एक सिलेंडर 15 से 20 दिन में खत्म हो जाएगा. सिलेंडर भरवाने के लिए कितना पैसा खर्च करेंगे! घर में और भी खर्चा है.’

कौसरी बेगम को करीब डेढ़ साल पहले गैस कनेक्शन मिला था लेकिन, अब तक उन्होंने तीन बार ही सिलेंडर भरवाया है. यानी औसतन छह महीने में एक बार. उनके पति खेतिहर मजदूर हैं और फिलहाल धान की रोपाई करने के लिए पंजाब में हैं.

कौसरी बेगम और मुन्नी बेगम की बातों की पुष्टि खुद सरकारी आंकड़ों से होती है. बीती एक अगस्त को एक सवाल के जवाब में केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बताया कि उज्ज्वला योजना के लाभार्थी एक साल में औसतन 3.5 सिलिंडर गैस का ही इस्तेमाल करते हैं. इसके अलावा 80 फीसदी लाभार्थी दूसरे सिलेंडर के लिए गैस एजेंसी के पास साल भर बाद पहुंचे हैं. ये आंकड़े इस योजना के मकसद को ही पलीता लगाते हुए दिख रहे हैं.

वहीं, सत्याग्रह को मिली जानकारी के मुताबिक हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) ने उज्ज्वला योजना के 1,07,089 लाभार्थियों का गैस कनेक्शन बंद कर दिया है. दूसरी ओर, इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने कहा है कि इस योजना के तहत लाभार्थियों के कनेक्शन बंद करने का कोई प्रावधान नहीं है. सत्याग्रह को यह जानकारी उत्तर प्रदेश के नोएडा में रहने वाले गर्वित बंसल द्वारा सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत पूछे गए एक सवाल पर दोनों कंपनियों के जवाब से मिली है.

आरटीआई के तहत इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लि. और एचपीसीएल का जवाब
आरटीआई के तहत इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लि. और एचपीसीएल का जवाब

दूसरी तरफ, उज्ज्वला योजना के तहत पांच करोड़ बीपीएल परिवारों की महिलाओं के नाम पर भले ही गैस कनेक्शन दिया गया हो, लेकिन अभी भी कई पात्र महिलाओं को इसका फायदा नहीं मिल पाया है. इनमें अरविमा बेगम भी शामिल हैं. वे बताती हैं कि उन्होंने दो साल तक मुफ्त गैस कनेक्शन मिलने का इंतजार किया. लेकिन, उन्हें इसका फायदा नहीं मिल पाया. अरविमा बताती हैं, ‘आस-पास सब को बिना पैसे का कनेक्शन मिल गया, लेकिन जब सरकार की तरफ से यह हमको नहीं मिला तो दो महीने पहले किसी तरह पैसा जोड़कर खुद ही ले लिया.’ उनके मुताबिक वे गैस पर खाना बनाना चाहती हैं, लेकिन बार-बार सिलेंडर भरवाने के लिए उनके पास पैसे नहीं होते. इसके अलावा वे बताती हैं कि उनके घर से करीब पांच किलोमीटर दूर गैस एजेंसी की दुकान से सिलेंडर लाने के लिए किसी व्यक्ति को 100 रुपये अलग से देने होते हैं. उनके भी पति घर का खर्च चलाने के लिए दिल्ली और पंजाब में काम करते हैं.

अरविमा बेगम का रसोई घर
अरविमा बेगम का रसोई घर

प्रधानमंत्री ने दावा किया है कि उनकी सरकार ने 10 करोड़ लोगों को गैस कनेक्शन की सुविधा दी है और इससे पहले की सरकारों के लिए इसका कुल आंकड़ा केवल 13 करोड़ था. यह सच है कि मोदी सरकार के कार्यकाल में रसोई गैस कनेक्शन जारी करने की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. लेकिन इसके इस्तेमाल में कोई खास प्रगति होती नहीं दिखती.

एलपीजी कनेक्शन और एलपीजी गैस सिलिंडर की बिक्री | साभार : Scroll.in
एलपीजी कनेक्शन और एलपीजी गैस सिलिंडर की बिक्री | साभार : Scroll.in

इन बातों से साफ है कि मोदी सरकार लाभार्थियों की संख्या पांच करोड़ पार करने के बाद भी पूरी तरह सफल होती नहीं दिखती है. यानी गैस कनेक्शन लेने के बाद भी गरीब परिवार की महिलाओं को चूल्हे के धुएं से पूरी तरह मुक्ति नहीं मिल पाई है. इस बारे में नीतिगत मामलों के जानकारों का कहना है कि सरकार को केवल लाभार्थियों की संख्या बढ़ाने पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए बल्कि, यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ग्राहक खाना बनाने के लिए रसोई गैस का ही इस्तेमाल करें. इसके लिए इस योजना के लाभार्थियों से बातचीत कर उनकी समस्याओं का समाधान करने की कोशिश की जानी चाहिए. ऐसा न होने पर मुन्नी बेगम जैसी लाभार्थियों की रसोई में रखा हुआ गैस सिलिंडर किसी कोने में चूल्हे के धुएं से रंगा दिख सकता है.