द्रविड़ राजनीति के आखिरी महायोद्धा एम करुणानिधि के निधन के बाद तमिलनाडु में एक युग का अंत हो गया. अन्नादुरई और एमजीआर के बाद जयललिता और करुणानिधि ने तमिल सियासत में ऐसा दबदबा कायम रखा कि दिल्ली से चलने वाली राष्ट्रीय पार्टियां चेन्नई में नाम मात्र के लिए ही दिखती रहीं. लेकिन 2019 के चुनावों में एक बड़ा फर्क यह होगा कि तमिलनाडु में न जयललिता दिखेंगी और न करुणानिधि के भाषण सुनाई देंगे.

उत्तर प्रदेश (80), महाराष्ट्र(48), पश्चिम बंगाल (42) और बिहार (40) के बाद तमिलनाडु में ही सबसे ज्यादा 39 लोकसभा सीटें हैं. इस राज्य की एक बड़ी चौंकाने वाली खासियत और है. यह हर बार एकतरफा मतदान करता है. अब तक जयललिता की पार्टी अगर चुनाव जीतती थी तो करुणानिधि की पार्टी एकदम शून्य पर पहुंच जाती थी. 2014 के चुनाव में भी बिल्कुल ऐसा ही हुआ. जयललिता की पार्टी को 39 में से 37 सीटें मिली और करुणानिधि की पार्टी का खाता भी नहीं खुला. इसी दम पर लोकसभा में एआएडीएमके तीसरे नंबर की पार्टी बनी और लोकसभा के डिप्टी स्पीकर इसी पार्टी से चुने गए.

2019 में भी तमिलनाडु की 39 सीटों का बड़ा महत्व है और इसलिए करुणानिधि के उत्तराधिकारी और उनके बेटे एमके स्टालिन की भूमिका अब बहुत बड़ी होने वाली है. दक्षिण की खबर पर नज़र रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार से करुणानिधि के निधन के बाद तमिल सियासत पर कुछ अहम जानकारी मिली: तमिलनाडु में इस वक्त ऐसा माहौल बनता जा रहा है कि दिल्ली में बैठे करीब-करीब सभी नेता यह मानते हैं कि 2019 में डीएमके क्लीन स्वीप करेगी. मैदान में फिल्म स्टार रजनीकांत और कमल हासन भी होंगे और जयललिता के गुजर जाने के बाद बटीं एआईएडीएमके के दोनों खेमे भी. लेकिन बाजी डीएमके के ही हाथ लगेगी.

करुणानिधि ने अपने जीवनकाल में ही स्टालिन की सारी समस्याएं दूर कर दी थीं. उनके सबसे बड़े विरोधी थे उनके अपने सगे भाई एमके अलागिरी. लेकिन करुणानिधि ने उन्हें मनमोहन सरकार में केंद्रीय मंत्री बनवा दिया और चेन्नई की सियासत का जिम्मा स्टालिन को सौंप दिया. इसके बाद करुणानिधि सरकार में स्टालिन उपमुख्यमंत्री भी बन गए. लेकिन अलागिरी को दिल्ली कभी रास नहीं आई और तमिलनाडु में स्टालिन की बढ़ती ताकत को वे कभी बर्दाश्त नहीं कर पाए. नतीजा यह हुआ कि पिता करुणानिधि ने अपने ही बेटे को पार्टी से बेदखल कर दिया. और तो और परिवार में भी उनकी हैसियत कम हो गई.

करुणानिधि की तीसरी पत्नी की बेटी हैं कनिमोरी जिन्हें करुणानिधि ने दिल्ली की पार्टियों और चेन्नई के बीच पुल बनाने का काम दे दिया था. डीएमके में अब तक यह माना जाता है कि अगर पार्टी को बहुमत मिला तो स्टालिन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बनेंगे और कनिमोरी दिल्ली में कैबिनेट मंत्री बनेंगी. सुनी-सुनाई है कि कनिमोरी के संबंध कांग्रेस के नेताओं से बेहद अच्छे हैं और टूजी घोटाले के वक्त भाजपा नेताओं की तरफ से हुए हमलों को वे अभी तक भूली नहीं हैं. इसलिए वे 2019 में कांग्रेस के साथ ही गठबंधन करने के पक्ष में हैं. लेकिन भाजपा के बड़े नेताओं से अंदर की कुछ और ही खबर सुनने को मिलती है.

भाजपा का शीर्ष नेतृत्व सीधे-सीधे स्टालिन से संपर्क बनाकर रखना चाहता है. करुणानिधि के जीवनकाल में ही पार्टी के कई नेताओं की स्टालिन से अकेले में मुलाकात हो चुकी है. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी करुणानिधि से मिलने चेन्नई गए थे और स्टालिन से उनकी बातचीत अच्छी बताई जाती है. स्टालिन 65 साल के हैं और सियासत में उनका अनुभव भी कम नहीं हैं. उनकी करुणानिधि जैसी क्रांतिकारी भाषण शैली भले ही ना हो लेकिन संगठन शक्ति के मामले में स्टालिन का फिलहाल कोई सानी नहीं. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता जो आजकल बड़े पद पर तैनात हैं, उन्होंने कुछ दिन पहले पत्रकारों से मुलाकात की थी. बातों-बातों में उन्होंने बताया कि 2019 की सियासत उत्तर से नहीं दक्षिण से तय होने वाली है. उसी वक्त उन्होंने कहा था कि 2019 के चुनाव में सबसे अहम भूमिका डीएमके नेता स्टालिन की होने वाली है.

नेताजी के इस दावे के पीछे उनका तर्क यह था कि देश में इस वक्त सिर्फ एक ही ऐसी पार्टी बची है जिसका कैडर लेफ्ट से भी ज्यादा प्रतिबद्ध है. उस कैडर की कमान करुणानिधि ने अपने बेटे स्टालिन को सौंप दी थी. उनके निधन के बाद स्टालिन ने अपने समर्थकों से अपील की और उन्हें प्रदेश में शांति बनाए रखने के लिए कहा. यह स्टालिन की ही आवाज़ थी जिसे डीएमके के कैडर ने सुना. स्टालिन के पास करुणानिधि जैसी ताकतवर कलमकारी भले ही न हो लेकिन भावनात्मक अपील में वे अपने पिता से पीछे नहीं हैं. जब पिता की विदाई का वक्त आया तो उन्होंने बड़े भावुक अंदाज़ में कुछ बातें लिखीं - ज़िंदगी भर आपको अपना लीडर माना, हमेशा आपको लीडर कहकर ही बुलाया. लेकिन क्या एक बार अपने लीडर को अप्पा यानी पापा कहकर बुला सकता हूं.

दक्षिण में पले-बढ़े लेकिन अब भाजपा की कोर टीम में शामिल एक नेता को अभी से स्टालिन के बेहद करीब माना जाता है. उन नेता से जब पूछा गया कि तमिलनाडु की राजनीति अब किस करवट लेगी. उनका सीधा-सपाट सा जवाब था - करुणानिधि के जाने के बाद तमिलनाडु में स्टालिन का ही सिक्का चलेगा और 2019 में 39 सीटों में से 35 से ज्यादा सीटें डीएमके को मिल सकती है. वे नेता यह भी कहते हैं कि उत्तर की खबर रखने वाले मीडिया को इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि ममता बनर्जी हों या अखिलेश यादव या मायावती या शरद पवार या नीतीश कुमार, इनमें से कोई भी नेता उतनी सीटें नहीं जीत पाएगा जितनी अकेले डीएमके के पास होंगी.

स्टालिन के पक्ष में एक बात और जाती है. पंडित नेहरू के वक्त करुणानिधि पहली बार विधायक बने और अंत तक विधायक रहे. लेकिन करुणानिधि को हमेशा एक मजबूत प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा. पहले कांग्रेस के कामराज थे, फिर एमजीआर और उनके बाद जयललिता से उनका सामना हुआ. लेकिन स्टालिन के सामने अभी मैदान खाली है. अन्नाद्रमुक के दोनों खेमों के पास जयललिता की विरासत तो है लेकिन विश्वसनीय चेहरा नहीं है. रजनीकांत और कमल हासन तमिल सियासत को प्रयोगशाला के तौर पर ही देख रहे हैं और फिलहाल इनमें से किसी भी एक के लिए एमजीआर या एनटीआर बनना नामुमकिन सा लगता है.

इसलिए स्टालिन की राह आसान है. राहुल गांधी भी स्टालिन से दोस्ती का दम भरते हैं और नरेंद्र मोदी भी उन्हें कभी अकेला न छोड़ने की हिम्मत देने चेन्नई पहुंचे थे. बहुत मुमकिन है कि 2019 का असली किंगमेकर उत्तर के नेता नहीं दक्षिण के स्टालिन हों.