मुंबई शहर को सिर्फ मराठी फिल्म इंडस्ट्री के लिए जाना जाता. अमिताभ बच्चन को शायद अपने अभिनय की छटा बिखेरने के लिए इलाहाबाद या कोलकाता छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती. शाहरुख खान अपने बचपन के शहर दिल्ली में ही ‘मन्नत’ बसाते और सलमान खान को ‘गैलेक्सी’ और बांद्रा छोड़कर किसी और शहर में आबो-दाना ढूंढ़ने निकलना पड़ता! हिंदी फिल्म इंडस्ट्री अगर मुंबई में न होती, तो एक तो यह होता कि मोहम्मद रफी के गाए कालजयी गीत ‘ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां, जरा हटके जरा बचके, ये है बॉम्बे मेरी जान’ को मजरूह सुल्तानपुरी किसी और ही शहर के लिए लिखते. गीत में बॉम्बे से ऐसी शिकायत भी नहीं करते - ‘मिलता है यहां सबकुछ, एक मिलता नहीं दिल’. कई और भी हैरतअंगेज चीजें होतीं, और बहुत कुछ जो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के मुंबई में पैदा, पनपने और विस्तार लेने से हुआ, कहीं और होना संभव न होता.

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश जैसे हिंदी-बहुल प्रदेशों में अगर बॉलीवुड कहीं बसता तो हिंदी को बेहतर तवज्जो मिलती, पटकथाएं अंग्रेजी और रोमन लिपि में लिखने का दबाव नहीं रहता, हीरो-हीरोइन हिंदी पटकथाएं अंग्रेजी की माफिक सरलता से पढ़ लेते और कैटरीना कैफ की भी हिंदी सलमान जितनी बेहतर तो हो ही जाती! तब सभी हिंदी फिल्मों के पोस्टर हिंदी में छपते, नए और अंजान कलाकारों के नाम सही हिंदी में स्क्रीन पर लिखे जाते और कल्कि केकलां को आज तक कोचलिन और कंगना रनोट को राणौत या राणावत नहीं कहा जा रहा होता. तब अंग्रेजी भाषा ‘हिंदी’ फिल्मों में वैसे ही फुट-नोट बन जाती, जैसे अभी हिंदी बनी हुई है.

अरे हां! यह भी तो होता कि न्यूमेरोलॉजी की दुकान ठप्प पड़ जाती. जो-जितने स्टार अंकज्योतिष के हिसाब से अपने नाम स्क्रीन के लिए बदलते हैं वे ऐसा नहीं कर पाते क्योंकि यह विधा अंग्रेजी में लिखे नामों में तो अतिरिक्त अक्षर लगा देती है, लेकिन हिंदी में लिखे नामों पर इसका जोर नहीं चलता साहेब! जब हिंदी फिल्मों में स्टारों के नाम हिंदी में लिखे जाते, तो अजय देवगन अपने अंग्रेजी में लिखे सरनेम से ‘ए’ कैसे निकाल पाते (Devgn), भंसाली कोहराम मचने के बाद बला टालने के लिए ‘पद्मावती’ को ‘पद्मावत’ करते वक्त उसमें एक अतिरिक्त ‘ए’ नहीं जोड़ पाते (Padmaavat) और हिमेश रेशमिया साहब अपनी फिल्म ‘कर्ज’ (2008) में चार-चार ‘जेड’ जोड़ने की हिमाकत नहीं कर पाते (Karzzzz)!

यह सब शुरू ही नहीं होता. मतलब मुंबई में कोई फिल्म इंडस्ट्री विस्तार ही नहीं लेती, अगर सात जुलाई 1896 को सिनेमा को जन्म देने वाले फ्रांसीसी लूमियर ब्रदर्स ने अपने एक आदमी को बॉम्बे के वॉटसन होटल न भेजा होता. अपनी कुछ शॉर्ट फिल्में गोरों को दिखाने के लिए. और इन्हें देखकर एक लोकल फोटोग्राफर हरिश्चंद्र सखाराम भाटवडेकर ने ब्रिटेन से एक फिल्म कैमरा आयात करने का दृढ़-निश्चय न किया होता. कई उत्साही भारतीयों से होते हुए फिर यह सिनेमा नामक विधा दादासाहब फाल्के तक न पहुंची होती और उन्होंने 1913 में जाकर सर्वप्रथम एक पूर्णत: ‘स्वदेशी’ फीचर फिल्म बनाने में कामयाबी न हासिल की होती - ‘राजा हरिश्चंद्र’.

फर्ज कीजिए, इन लूमियर भाईयों ने अगर बॉम्बे की जगह अपना आदमी भोपाल भेजा होता तो क्या होता! सन् 1819 से लेकर 1926 तक लगातार चार बेगमों के राज से गुजरे भोपाल में तब (1896) गोरों के साथ बैठकर शायद किसी मुस्लिम महिला ने इन लघु फिल्मों को देखा होता, और कई उत्साही महिलाओं से होते हुए यह विधा किसी ऐसी जुनूनी महिला के हाथों में पहुंची होती जिसने लाख संघर्षों के बाद पहली पूर्णत: ‘स्वदेशी’ फिल्म बनाने में सफलता हासिल कर ली होती!

क्या हमारा सिनेमा हैरतअंगेज अंदाज में नहीं बदला होता अगर हिंदुस्तान की पहली फिल्म को बनाने वाली कोई महिला होती? फिल्म निर्देशक से पहले फिल्म निर्देशिका शब्द चलन में आ जाता? शुरुआती फिल्मों में महिलाओं के पात्र पुरुषों को निभाने की जरूरत नहीं पड़ती? और उस पहली फिल्म निर्देशिका ने किसी हिंदू पौराणिक कथा पर फिल्म बनाने की जगह अपने आसपास की संस्कृति अनुसार मुगलों से जुड़ी कोई कहानी चुनी होती? इतना तो तय मानिए, कि ऐसा होने पर यह जरूर होता कि इतिहास बदलने को बेचैन रहने वालों के लिए आज की तारीख में एक काम और बढ़ जाता!

इसी तरह अगर शुरुआती सिनेमा बॉम्बे की जगह आगरा पहुंचा होता, हैदराबाद पहुंचा होता, दिल्ली से इसका दिल लगा होता, तो सोचकर देखिए, हमारा हिंदी सिनेमा आज कैसे और कितना बदला होता!

नेपोटिज्म भी जी का जंजाल नहीं बनता, अगर बॉलीवुड मुंबई जैसी छोटी जगह में सिमटा नहीं होता. तब वह शायद कई शहरों में फलता-फूलता. और लाखों आम युवाओं के सपने बैरंग ही उनके साथ उनके शहर वापस नहीं लौटते, और कई ‘सपनों के शहर’ में घुट-घुटकर जीने को मजबूर नहीं होते. डेमोक्रेसी की खासियत देश की तरह बॉलीवुड पर भी लागू होती, और सत्ता का केवल एक केंद्र नहीं बनता. फेडरल स्ट्रक्चर की तरह तब अवसरों का विकेंद्रीकरण होता और छोटे-छोटे शहरों में भी बड़े-बड़े फिल्ममेकर्स पनपते.

बॉलीवुड अगर एक जगह (मुंबई में) सिमटा न होता तो चार-चार पीढ़ियों का दशकों से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री पर बेहिसाब मजबूत दबदबा भी न होता, और कुछ मशहूर फिल्म परिवार मिलकर आपस में ‘घर-घर’ नहीं खेल रहे होते. अपने डीएनए में अभिनय शामिल करवाकर लाए प्रिविलेज्ड स्टार किड्स के साथ ‘बाहरी’ लोगों को उतने ही मौके मिलते और वह लोकतंत्र हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में शायद स्थापित हो जाता जिसका अब सफल बाहरी लोगों ने भी सपना देखना छोड़ दिया है. वे भी सिस्टम का चक्रव्यूह तोड़कर सफलता हासिल करने के बाद सिस्टम का ही हिस्सा बनकर नेपोटिज्म को स्वीकार कर चुके हैं.

गीतकार स्वानंद किरकिरे ने एक बार कहा था - एक साक्षात्कार के सिलसिले में हुई बातचीत के दौरान - कि विकेंद्रीकरण बहुत जल्द हमारे सिनेमा को बदलने वाला है. उससे पहले कहा - ‘कई प्रतिभाएं फिल्म इंडस्ट्री नहीं पहुंच पातीं क्योंकि मुंबई आने तक का सफर नहीं तय कर पातीं. सबसे बड़ा वही सफर होता है स्ट्रगलिंग लोगों के लिए - मुंबई में आना और यहां के परिवेश में फिट हो पाना. अंग्रेजीदां परिवेश में. जहां हिंदी में गाना लिखा जा सकता है, लेकिन हिंदी बोलकर उसे बेचा नहीं जा सकता.’

फिर भविष्यवाणी सी की कि डिजिटल की वजह से बहुत जल्द विकेंद्रीकरण होने वाला है और हम सबको इसके लिए तैयार रहना होगा. स्वानंद अनुसार फिल्म निर्माण की तकनीक जिस तेजी से बदल रही है, डिजिटल होकर सर्व-सुलभ हो रही है, जल्द ही फिल्म इंडस्ट्री सब जगह मौजूद होगी. जिस शहर में जिसको अच्छी फिल्म बनानी है वह वहां बैठकर बनाएगा क्योंकि अब लोग आईफोन पर भी फिल्म शूट कर रहे हैं.

सच ही कहा था. नवाजुद्दीन सिद्दीकी अभिनीत ‘हरामखोर’ के निर्देशक श्लोक शर्मा ने अपनी अगली फिल्म आईफोन पर ही शूट की है. ‘ज़ू’ नाम की यह फिल्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो चुकी है. उनकी तरह कई प्रतिभाएं देश के विभिन्न हिस्सों से बेहतर कंटेंट लगातार वेब पर अपलोड कर रही हैं. आज उन्हें यूट्यूब जैसा मंच मिल रहा है तो कल कई स्वतंत्र स्टेंड-अप कॉमेडियंस की तरह नेटफ्लिक्स, हॉटस्टार व अमेजॉन प्राइम वीडियो जैसा भी मिलना तय है. हो सकता है कि विकेंद्रीकरण का स्वर्ण-काल ऐसी ही कोशिशों से आए और उसके आने के बाद हमें एक और अनोखा लेख लिखने को मिले. जिसका इस लेख से ज्यादा दिलचस्प होना लगभग तय होगा – वे दिन कैसे थे जब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री मुंबई में सिमटी हुआ करती थी!

लेकिन, अभी तो यह है कि दो करोड़ से ज्यादा लोगों से दब रही मुंबई थोड़ी-सी हल्की हो जाती अगर बॉलीवुड वहां न होता. मल्टीप्लेक्स की कीमतें सारे मुल्क में लगातार नहीं बढ़तीं अगर हिंदी फिल्मों के बॉक्स-आफिस कलेक्शन का एक बहुत बड़ा हिस्सा मुंबई यानी कि वहां के मल्टीप्लेक्सों से नहीं आता. इस वजह से मल्टीप्लेक्स-युग अपने स्वर्णकाल को नहीं जी रहा होता और सिंगल स्क्रीन थियेटर एक के बाद एक बंद होने की कगार पर नहीं पहुंच रहे होते.

दाऊद इब्राहिम पर भी फिल्में कम बनतीं अगर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री मुंबई में न होती. मुंबई के गैंगस्टरों के मुकाबले गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान के भी गैंगस्टर दाऊद जितने ही नामचीन हो पाते और भारत-भर में महिमामंडित न हो पाने का रोना न रो पाते! अगर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री मुंबई में नहीं होती तो 90 के दशक में फिल्मों पर अंडरवर्ल्ड का दबदबा भी इतना ज्यादा न होता. और इस वजह से काला धन सफेद करने का सबसे अच्छा जरिया हमारी हिंदी फिल्में नहीं होतीं.

तब मुंबई में रियल एस्टेट की कीमतें थोड़ी कम आसमान छूतीं और आसमान छूती इमारतों में घर थोड़ी आसानी से मिल जाते. बॉलीवुड को यथार्थवादी कहानियां कहने के लिए छोटे शहरों, गावों तक लौटना नहीं पड़ता क्योंकि वह वहीं रहकर यथार्थ की जमीन पर गहरी जड़ें जमाने वाली कहानियां कह पाता. ऐसे स्वप्निल समय में हिंदी सिनेमा में भी कहीं से कोई सत्यजीत रे निकल कर आता, कोई ऋत्विक घटक बन पाता, क्योंकि तब ग्लैमर की चकाचौंध में सभी प्रतिभाओं का मकसद ‘सपनों के शहर’ मुंबई जाकर खुद के सपनों को भौतिकवादी सुखों में तब्दील करना न होता.

कुछ नुकसान भी होते. आर्थिक राजधानी कही जाने वाली मुंबई में अगर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री न होती तो फिल्में बनाने के लिए अथाह पैसा लगाने वाले लोग इंडस्ट्री को कम मिलते. देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों, सबसे ज्यादा व्यवसायों, सबसे बड़े शेयर बाजार वाली इस नगरी के पास ‘इनवेस्ट’ करने के लिए बहुत पैसा है और ये अथाह धन हिंदी फिल्मों को आसानी से नसीब नहीं होता अगर फिल्म इंडस्ट्री हिंदुस्तान के सबसे अमीर शहर में न बसी होती!

भाषाओं और संस्कृतियों का संगम भी मुंबई में निराला है. हिंदुस्तान के किसी भी शहर में चले जाइए - दिल्ली जैसे एक-आध शहर को छोड़कर - एक भाषा, एक संस्कृति, एक खास तरह का पहनावा, बाकी कल्चरों पर हावी मिलता है. बंगाल में बंगाली तो गुजरात में गुजराती जैसा एकल प्रभुत्व हिंदुस्तान के ज्यादातर शहरों में मिलता है. लेकिन मुंबई मुख्तलिफ भाषाओं, संस्कृतियों, विचारों के अलावा ऊंच-नीच, अमीरी-गरीबी और उसके बीच की जिंदगी को भी खुद में समेटे हुए है. इसलिए इस शहर के पास कहानियां कहने के लिए हिंदुस्तान के बाकी शहरों की तुलना में ज्यादा हैं और इसकी ताकीद हिंदी फिल्मों का इतिहास भी करता है.

स्वानंद किरकिरे भी एक निराली बात करते हैं! कहते हैं, ‘मुंबई में फिल्म इंडस्ट्री क्यूं है इसपर मैंने भी काफी विचार किया. मैं उसकी एक भौगोलिक वजह बताता हूं आपको. देखिए यहां पर सिर्फ चार महीने काम बंद रहता है. बरसात की वजह से. बाकी आठ महीने काम लगातार होता है. अगर आप, मान लीजिए दिल्ली में फिल्म इंडस्ट्री बनाएं, तो वहां चार और चार आठ महीने काम नहीं होगा. या बहुत कम होगा. बारिश का मौसम और फिर ठंड. मुंबई में न भीषण गर्मी पड़ती है न भीषण ठंड, और कम ही भीषण बारिश होती है. इसलिए भौगोलिक दृष्टि से मुंबई बहुत अनुकूल है फिल्म जैसे काम के लिए जहां लाइट का खेल है, रोशनी का खेल है.’

...और इस तरह, हजार बातों की एक बात कहकर स्वानंद ने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को वापस मुंबई का कर दिया! बता दिया कि इस शहर में लाख बुराईयां या कमियां हों लेकिन हिंदी फिल्म इंडस्ट्री का दिल तो यही शहर है. इसलिए अब फिर से गाइए, और हमेशा गाते रहिए - ‘ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां, जरा हटके जरा बचके, ये है बॉम्बे मेरी जान’. क्योंकि बॉम्बे, हम सब की है जान!