तमिलनाडु के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के नेता दिवंगत एम करुणानिधि का चेन्नई के मरीना बीच पर अंतिम संस्कार हो चुका है. पहले तमिनलाडु सरकार ने इससे इनकार कर दिया था. लेकिन बुधवार को मद्रास हाई कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया था कि दक्षिण भारत की राजनीति के इस दिग्गज को मरीना बीच पर ही दफ़नाया जाएगा. इसी फ़ैसले को लेकर सोशल मीडिया पर एक दावा काफ़ी शेयर किया जा रहा है.

‘गर्व से कहो भारतीय हो’ नाम के फ़ेसबुक पेज पर पोस्ट की गई एक तस्वीर में कहा गया है, ‘मद्रास हाई कोर्ट कल रात भर खुला रहा. वह भी इस सुनवाई के लिए कि करुणानिधि की समाधि कहां बने. यहां आम आदमी के पैर घिस जाते हैं न्याय पाने के लिए. कुछ केसों में तो सुनवाई का नंबर आने तक आदमी मर तक जाता है, और आप कहते हैं कि क़ानून सबके लिए समान है.’

फ़ेसबुक पर वायरल हो चुकी इस पोस्ट को अब तक 42,000 से ज़्यादा बार शेयर किया जा चुका है. करुणानिधि के अंतिम संस्कार को लेकर जो फ़ैसला आया उसकी टाइमिंग कुछ ऐसी रही कि लोग इस दावे पर यक़ीन कर रहे हैं. हालांकि सच्चाई कुछ और है.

इंडियन एक्सप्रेस ने करुणानिधि के निधन के बाद लगातार लाइव कवरेज की थी. हमने उसे चेक किया. वेबसाइट की टाइमलाइन के मुताबिक़ मंगलवार रात आठ बजे के आसपास ख़बर आई कि तमिलनाडु की सरकार ने करुणानिधि को मरीना बीच पर दफ़नाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है. इसके बाद सवा नौ बजे की अपडेट में बताया गया कि राज्य सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ डीएमके के वकील मद्रास हाई कोर्ट पहुंच गए. तय हुआ कि रात 10.30 बजे आपात सुनवाई होगी. फिर 10.30 बजे ख़बर आई कि मद्रास हाई कोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश हुलुवाड़ी जी रमेश ने (मंगलवार को ही) सुनवाई करने को मंज़ूरी दे दी है.

इसके बाद 11.16 मिनट पर बताया गया कि थोड़ी ही देर में सुनवाई शुरू होगी. इसके बाद रात 12 बजे के बाद भी, यानी बुधवार शुरू होने तक सुनवाई से जुड़े अपडेट्स आते रहे. लेकिन देर रात 1.14 बजे के अपडेट में बताया गया कि सुनवाई सुबह आठ बजे तक के लिए टाल दी गई है. यानी यह दावा कि करुणानिधि के लिए कोर्ट रात भर खुला रहा सही नहीं है. यह भी ध्यान रखने की ज़रूरत है कि सुनवाई मुख्य न्यायाधीश के निवास पर हुई, न कि कोर्ट में क्योंकि वह बंद था. रात को सुनवाई स्थगित करने बाद सुबह 11 बजे से थोड़ा पहले कोर्ट ने अपना फ़ैसला दिया था.

स्क्रीनशॉट : इंडियन एक्सप्रेस
स्क्रीनशॉट : इंडियन एक्सप्रेस

हालांकि यह बात सही है कि आम आदमी को इंसाफ़ पाने के लिए काफ़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, और कई बार सुनवाई हुए बिना ही व्यक्ति की मौत हो जाती है. लेकिन जानकारों के मुताबिक इसके लिए न्यायालयों की मंशा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता.

भारत में न्यायाधीशों के पद काफ़ी संख्या में ख़ाली पड़े हैं. इस वजह से उपलब्ध न्यायाधीशों पर काफ़ी ज़्यादा बोझ पड़ता है और कोर्ट के चक्कर लगा रहे आम लोग भी परेशान होते हैं. लेकिन यह भी सच है कि आम आदमी की मुश्किलें थोड़ी कम करने के लिए अदालतें अतिरिक्त काम कर रही हैं. हाल में ऐसी कई ख़बरें आई हैं. उदाहरण के लिए बीते अप्रैल की एक ख़बर के मुताबिक़ महाराष्ट्र के बॉम्बे हाई कोर्ट में देर रात तक सुनवाइयां होती हैं, जबकि कोर्ट बंद होने का समय शाम पांच बजे है. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा ने सभी हाई कोर्टों को पत्र लिख कर कहा था कि वे सामान्य दिनों (सोमवार से शुक्रवार) के अलावा शनिवार को भी अतिरिक्त अदालतें लगाएं और लंबित मामलों को निपटाएं. उनके इस आग्रह पर देश के कई हाई कोर्टों ने अतिरिक्त काम कर मामले निपटाए हैं. यानी यह दावा भी सीधे-सीधे नहीं किया जा सकता है कि अदालतें आम आदमी के लिए अलग से कुछ नहीं करतीं.